इस महिला ने सियासत की बिसात पर मुगलों को मोहरों की तरह किया था इस्‍तेमाल

इस महिला ने सियासत की बिसात पर मुगलों को मोहरों की तरह किया था इस्‍तेमाल
मुगल बादशाह जहांगीर की 20वीं बेगम नूरजहां ने अपनी इकलौती बेटी के पति को बादशाह बनवाने के लिए बड़ा सियासी खेल खेला था.

31 मई का इतिहास: बादशाह अकबर के बेटे जहांगीर की 20वीं बेगम नूरजहां ने अपनी इकलौती बेटी 'लाडली बेगम' को मल्लिका-ए-हिन्‍दुस्‍तान बनाने के लिए भाइयों को ही आपस में लड़वा दिया था. इतिहासकारों के मुताबिक, 31 मई 1577 को जन्‍मी नूरजहां ने 16 साल तक जहांगीर के नाम पर हिन्‍दुस्‍तान पर राज किया.

  • Share this:
मुगल बादशाह अकबर (Emperor Akbar) के बेटे जहांगीर की 20वीं बेगम मेहरुन्निसा उर्फ नूरजहां (Noorjahan) खूबसूरत होने के साथ ही बहुत काबिल महिला भी थी. नूरजहां की काबिलियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने 16 साल तक जहांगीर (Jahangir) के नाम पर हिंदुस्तान की गद्दी संभाली. वह पहली मुगल बेगम थी, जिसके नाम से सिक्के गढ़वाए गए और शाही फरमान जारी हुए. इतिहासकार लिखते हैं कि वह वह बहुत ही साहसी महिला थी. वहीं, नूरजहां ऐसी शातिर शासक भी थी, जिसने सल्तनत के लिए भाइयों को ही आपस में लड़ावा दिया. कहा जाता है कि उसने अपनी बेटी को मल्लिका-ए-हिंदुस्‍तान बनाने के मुगलों को सियासत की बिसात पर मोहरों की तरह इस्‍तेमाल किया. हालांकि, उसकी ये इच्‍छा उसके अपने भाई असफ खान की वजह से ही पूरी नहीं हो पाई.

मेहरुन्निसा के पिता ग्‍यासबेग अकबर के दरबार में करते थे नौकरी
मेहरुन्निसा के पिता ग्‍यासबेग ईरान में गरीबी से जूझ रहे थे. एक दिन उन्‍होंने अकबर के दरबार में शरण पाने की उम्मीद के साथ अपनी बेगम और दो बेटों के साथ हिंदुस्तान की ओर रुख किया. इसी दौरान 31 मई 1577 को कंधार में उनकी बीवी ने एक बच्ची को जन्म दिया. माली हालत खराब होने के कारण ग्‍यासबेग उसे छोड़ के आगे बढ़ने वाले थे. तभी एक व्‍यक्ति ने ग्यासबेग को बेटी को साथ रखने की सलाह दी, जिसे उन्‍होंने मान लिया. भारत पहुंचने पर ग्‍यासबेग को अकबर के दरबार में नौकरी मिल गई. इतिहासकार और लेखिका रूबी लाल अपनी किताब 'एंप्रेस: द अस्टोनिशिंग रेन ऑफ नूरजहां. में लिखती हैं कि बड़ी होने पर खूबसूरत मेहरुन्निसा की पहली शादी 1594 में मुगल सरकार के एक पूर्व सिख सरकारी अधिकारी से हुई. इसके बाद वो बंगाल चली गईं, जो उस समय पूर्वी भारत का संपन्न राज्य था. वहीं, उन्होंने अपनी इकलौती संतान को जन्म दिया.

ब्रिटिश अफसर थॉमस रो के मुताबिक, ताकतवर महिला थी नूरजहां



रूबी लाल लिखती हैं कि बाद में नूरजहां के पति पर जहांगीर के खिलाफ षड्यंत्र रचने के आरोप लगे. तब जहांगीर ने बंगाल (Bengal) के गवर्नर को नूरजहां के पति को आगरा (Agara) में अपने शाही दरबार में लाने का आदेश दिया. लेकिन, नूरजहां के पति गवर्नर के आदमियों के साथ युद्ध में मारे गए. पति की मौत के बाद विधवा नूरजहां को जहांगीर के महल में शरण दी गई. इसके बाद 25 मई 1611 में नूरजहां और जहांगीर की शादी हो गई. इस तरह नूरजहां जहांगीर की 20वीं और आखिरी बेगम बनीं. उसने उसे नूरजहां का खिताब दिया. 1616 में हिन्‍दुस्तान आए ब्रिटिश अफसर थॉमस रो ने जहांगीर के शासनकाल को तीन साल तक करीब से देखा. उनके मुताबिक, नूरजहां उस दौर की सबसे ताकतवर शख्सियत थी.



नूरजहां पहली मुगल बेगम थी, जिसके नाम से सिक्के गढ़वाए गए और शाही फरमान जारी हुए.


बेगम की तरक्‍की और प्रभाव से कभी असहज नहीं हुआ जहांगीर
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि 1620 के आसपास जहांगीर शराब और अफीम की लत के चलते दमे का रोगी हो गया था. इस वजह से उसने सल्तनत की बागड़ोर नूरजहां को सौंप दी. हालांकि, रूबी लाल इससे इत्‍तेफाक नहीं रखती हैं. वह लिखती हैं कि नूरजहां और जहांगीर एक दूसरे के पूरक थे. जहांगीर अपनी बेगम की तरक्की और बढ़ते प्रभाव से कभी असहज नहीं हुआ. जहांगीर से शादी के कुछ ही वक्‍त बाद नूरजहां ने अपना पहला शाही फरमान जारी किया, जिसमें कर्मचारियों की जमीन की सुरक्षा की बात कही गई थी. इस फरमान पर उनके दस्तख़त थे, 'नूरजहां बादशाह बेगम.' इससे पता चलता है कि नूरजहां की ताकत कैसे बढ़ रही थी. कुछ इतिहासकार लिखते हैं कि मल्लिका-ए-हिंदुस्तान बनने के एक साल बाद उसने मुगलों और अपने पिता ग्यासबेग के खानदान के बीच रिश्ते मजबूत करने के लिए 1612 में अपने भाई असफ खान की बेटी अर्जुमंद बानो उर्फ मुमताज महल का निकाह शाहजहां से करवाया.

बेगम नूरजहां की पहले पति से एक बेटी 'लाडली बेगम' थी
नूरजहां को पहले शौहर से एक बेटी लाड़ली बेगम थी. नूरजहां के पिता अकबर के समय में काबुल (Kabul) के दीवान थे. उसके भाई असफ खान ने आगरा दरबार पर कब्जा किया हुआ था. इसको और मजबूत करने के लिए 1620 में नूरजहां ने लाड़ली बेगम का निकाह जहांगीर के चौथे बेटे शहरयार से करवाया. नूरजहां ने अपने पिता को एतमाउद्दौला का खिताब दिलवाया. इसके बाद 1625 में भाई असफ खान को लाहौर का गवर्नर नियुक्त करवाया. बाद में उसे शाहजहां का मुख्यमंत्री बनवाया और उसके बेटे शाइश्ता खान को औरंगजेब (Aurangjeb) का मुख्य सलाहकार नियुक्त कराया. बता दें कि मुगल काल की दो सबसे खूबसूरत इमारतें भी नूरजहां से सीधा संबंध रखती हैं. इनमें वालिद एतमाउद्दौला का मकबरा खुद नूरजहां ने बनवाया था, जबकि उसकी भतीजी मुमताज महल का मकबरा ताजमहल (Tajmahal) शाहजहां ने बनवाया.

वारिस बनने के मामले पर बिगड़ गए शाहजहां के साथ रिश्‍ते
नूरजहां के कहने पर जहांगीर ने अपने बेटे खुर्रम यानी शाहजहां को बड़ी फौज दी थी. साथ ही उसने चित्तौड़ की चढ़ाई पर खुर्रम को भेजने का सुझाव भी दिया जो बहुत कारगर हुआ. खुर्रम की अगुवाई में दक्कन की जंगें भी लड़ी गई थीं. जहांगीर खुर्रम की दक्कन में कामयाबी से इतना खुश हुआ कि उसने दरबार में अपने सिंहासन के बगल में उसका सिंहासन लगवाया और उसे शाहजहां का खिताब दिया. खुर्रम दक्षिण से 23.60 लाख रुपये वसूल करके लाया था. उसने इसमें से दो लाख रुपये के उपहार नूरजहां को दिए थे. नूरजहां के शाहजहां से रिश्ते काफी अच्‍छे थे, लेकिन सल्तनत का वारिस बनने की बात पर मामला बिगड़ गया. शाहजहां 1620 में लाहौर में था. तभी दक्कन में विद्रोह होने लगा. नूरजहां ने इसे कुचलने के लिए जहांगीर को शाहजहां का नाम सुझाया. शाहजहां दोबारा दक्कन नहीं जाना चाहता था, लेकिन नूरजहां उसे जंग में उलझाए रखना चाहती थी.

नूरजहां के कहने पर ही जहांगीर ने अपने बेटे खुर्रम यानी शाहजहां को बड़ी फौज दी थी.


जहांगीर को बेटे शाहजहां के खिलाफ भड़काया, भेजा कंधार
इतिहासकार लिखते हैं कि नूरजहां चाहती थी कि शाहजहां का बड़ा भाई खुसरव भी उसके साथ्‍ज्ञ जंग पर चला जाए ताकि ताकि उसके दामाद शहरयार को शहंशाह बनाने में आसानी हो. शाहजहां को दक्कन में दोबारा सफलता मिली. उसने अब गद्दी हथियाने की ठान ली. इसके बाद उसने खुसरव की हत्या कर पहले रोड़े को हटाया. इसी दौरान ईरान के शाह अब्बास ने कंधार पर चढ़ाई कर दी. फिर नूरजहां के कहने पर जहांगीर ने उसे कंधार (Kandhar) कूच करने का फरमान सुना दिया. जब शाहजहां ने दक्‍कन जाने के लिए शर्त रखी तो एक तरफ नूरजहां ने जहांगीर को उसके खिलाफ भड़काया और दूसरी तरफ धीरे-धीरे शाहजहां की जागीरें शहरयार को सौंपने लगी. जहांगीर ने शाहजहां की शर्तें नहीं मानीं और उसे तुरंत कंधार जाने का हुक्म सुना दिया, जिसे शाहजहां ने नहीं माना.

जहांगीर ने बेटे शाहजहां के खिलाफ ही उठा लिए हथियार
शाहजहां की बगावत से गुस्‍साए जहांगीर ने अपने बेटे के खिलाफ ही हथियार उठा लिए. इधर शाहजहां ने दक्कन में अपने दुश्मन मलिक अंबर, उदयपुर के राणा करण सिंह और नूरजहां के भाई व अपने ससुर असफ खान को अपनी तरफ कर लिया था. हालांकि, युद्ध होने पर शाहजहां को जल्‍द ही अहसास हो गया कि वह जीत नहीं पाएगा. उसने जहांगीर से समझौता कर ली. इस पर नूरजहां ने उसके दो बेटों औरंगजेब और दारा शिकोह को आगरा बुलवा लिया. शाहजहां के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था. एक बार फिर नूरजहां जीत गई. इसी बीच जहांगीर के दूसरे बेटे परवेू की मौत हो गई. वह अब निश्चिंत थी कि शहरयार के बादशाह बनने में सारे रोड़े हट गए हैंलेकिन किस्‍मत को ये मंजूर नहीं था.

इतिहासकारों का मानना है कि नूरजहां अपने समय की सबसे ताकतवर महिला थीं.


जहांगीर के बाद सभी को मारकर बादशाह बना शाहजहां
जहांगीर की कुछ समय बाद राजौरी में मौत हो गई. आगरा दरबार में उस वक्‍त शाहजहां और शहरयार में कोई भी मौजूद नहीं था. शहरयार ने लाहौर में खुद को बादशाह घोषित करवा दिया और खजाने समेत पूरी संपत्ति पर कब्जा कर लिया. लेकिन, शाही सेना के ज्‍यादातर सिपहसलार शाहजहां की तरफ थे. लाहौर से 15 किमी दूर दोनों खेमों में जंग हुई. शाही सेना की कमान असफ खान के हाथ में थी. शहरयार ज्‍यादा देर नहीं टिक पाया. शाहजहां को बादशाह घोषित कर दिया गया. बाद में शाहजहां ने शहरयार समेत सभी को मरवा दिया. विधवा नूरजहां कुछ न कर सकी. बेटी को मल्लिका-ए-हिंदुस्तान बनाने का उसका सपना पूरा नहीं हो सका. शाहजहां ने नूरजहां से कोई बदसुलूकी नहीं की. नूरजहां ने शाहजहां से लाहौर में जहांगीर की कब्र के नजदीक रहने की इजाजत मांगी. इसके बाद उसकी बेटी लाड़ली बेगम और नूरजहां ने जीवन के आखिरी साल लाहौर में ही गुजारे.

मुगलों के दौर में थी सियासी असर रखने वाली अकेली महिला
इतिहासकार रूबी लाल लिखती हैं कि नूरजहां मुगलों के शासनकाल में पहली ऐसी महिला थीं, जो पुरुषों की तरह फैसले लेती थीं. साल 1617 में चांदी के सिक्के जारी किए गए, जिन पर जहांगीर के बगल में नूरजहां का नाम छपा था. अदालत के अभिलेखक, विदेशी राजनयिक, व्यापारी और मेहमानों ने भी नूरजहां के खास दर्जे को पहचानना शुरू कर दिया था. अदालत के एक दरबारी ने एक घटना का जिक्र किया है, जब नूरजहां ने उस शाही बरामदे में आकर सबको चौंका दिया था, जो सिर्फ पुरुषों के लिए आरक्षित था. रूढ़िवादी परंपराओं के खिलाफ नूरजहां का ये अकेला विरोध नहीं था. फिर चाहे वो शिकार करना हो, शाही फरमान और सिक्के जारी करना हो, सार्वजनिक इमारतों का डिजाइन तैयार करना हो, ग़रीब औरतों की मदद के लिए नए फैसले लेने हों या हाशिये पर पड़े लोगों की अगुवाई करनी हो, नूरजहां ने ये सब करके अपने वक्‍त में एक असाधारण महिला की जिंदगी जी.

ये भी देखें:

जानें अफ्रीकी देशों में बहुत धीमी रफ्तार से कैसे बढ़ रहे हैं कोरोना वायरस के मामले

आखिर भारत में कोरोना वायरस को फैलने से रोकने में क्‍यों पेश आ रही हैं मुश्किलें?

जब भारत के 120 जवान चीन के 2000 सैनिकों पर पड़ गए भारी, 1300 को कर दिया था ढेर

जानें भूकंप के बड़े झटके की दस्‍तक तो नहीं बार-बार आ रहे हल्‍के झटके?

भारत-चीन समेत कई देशों में कोरोना के खिलाफ जंग में ऐसे साथ दे रहे हैं 'रोबो योद्धा'
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज

corona virus btn
corona virus btn
Loading