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क्या कहता है देश में 'धर्म परिवर्तन' रोकने के कानूनों का इतिहास?

न्यूज़18 क्रिएटिव
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यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने भाषण (Yogi Adityanath Speech) में जिस ल​व​ जिहाद के खिलाफ कानून (Love jihad law) का उल्लेख किया था, उसे लागू करने किए जाने की खबरों के बीच जानिए कि कैसे एक सदी पहले से यह मुद्दा कानून निर्माताओं (Lawmakers) के बीच चर्चित रहा.

  • News18India
  • Last Updated: December 1, 2020, 3:50 PM IST
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उत्तर प्रदेश सरकार (UP Government) ने जबसे शादी की आड़ में 'जबरन धर्म परिवर्तन' को रोकने संबंधी कानून बनाने का ऐलान किया, तबसे ही इसे लेकर चर्चा गर्म रही. राजनीतिक स्तर पर इस कवायद से विवादास्पद 'लव जिहाद' की थ्योरी (Love Jihad) कानून की मुख्यधारा में आ रही है, तो सेक्युलर विचार (Secularism) के लोग इसका विरोध भी कर रहे हैं. लेकिन क्या आपको मालूम है कि भारत में धर्म परिवर्तन निषेध कानूनों (Anti Conversion Laws) को एक सदी से भी पुराना इतिहास है? और किस तरह यह वर्तमान स्वरूप तक पहुंचा?

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस तरह के कानून को लागू कर दिया है, तो मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार भी ऐसा ही कानून बनाने की बात कह चुकी है. इसके बाद हरियाणा में भी इस तरह की बात सरकार की तरफ से ही कही गई. कुल मिलाकर, लव जिहाद इन दिनों पूरे देश में अच्छी-खासी बहस का मुद्दा बना हुआ है. लेकिन इस बहस में सबसे खास बात यह है कि बहस करने वाले को इस तरह के कानून से जुड़ा इतिहास पता है भी या नहीं.

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मौजूदा स्थिति क्या है?
इतिहास से पहले जानिए कि धर्म परिवर्तन के खिलाफ भारत के नौ राज्यों अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में हैं. राज्यों के हिसाब से नियमों में कुछ अंतर हैं, लेकिन मोटे तौर पर इनका खाका एक सा ही है. कानून तोड़ने पर विभिन्न राज्यों में 5 से 50 हज़ार रुपये के जुर्माने से लेकर एक से तीन साल तक की कैद तक के प्रावधान हैं.

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एससी/एसटी मामलों में कुछ राज्यों में कानून और सख्त हैं. खबरों की मानें तो उत्तर प्रदेश में जो कानून हाल में लागू हुआ है, उसमें दस साल तक की कैद की सज़ा संभव है. अब जानिए कि धर्म परिवर्तन के खिलाफ कानूनों की कहानी शुरूआत से कैसी रही.

ब्रिटिश राज में थी कश्मकश
कहा जाता है कि वास्को डा गामा जब 1498 में भारत में कालीकट के किनारे पर पहुंचे थे, तब उन्होंने पाया था कि केरल के क्षेत्र में करीब 2 लाख ईसाई हुआ करते थे. बाद में ब्रिटिश राज कायम हुआ तो शुरूआत में ब्रिटिश सरकार ने मिशनरियों को कोई तवज्जो नहीं दी. लेकिन ब्रिटिश संसद में दबाव के बाद 1837 में मिशनरियों को इजाज़त देनी पड़ी.

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सती जैसी प्रथाओं के खिलाफ कानून बनाकर खुद को प्रगतिशील कहने वाले ब्रिटिश राज के सामने जब बात धर्म परिवर्तन के खिलाफ कानून की हुई, तो कंपनी ने आंखें मूंद ली थीं. ईसाई मिशनरियों के ज़रिये हो रहे धर्म परिवर्तन के खिलाफ बॉम्बे के पारसियों ने सबसे पहले याचिका दायर की थी, लेकिन इस पर कोई एक्शन नहीं हुआ. लेकिन, 1930 और 40 के दशक में कई शाही रियासतों ने धर्म परिवर्तन के खिलाफ कानून बनाए थे.

'ईसाई मिशनरियों से हिंदू धर्म की रक्षा के मकसद' से ये कानून बनाए गए थे, जिनमें से कुछ थे रायगढ़ स्टेट कन्वर्जन एक्ट 1936, सरगुजा राज्य धर्म त्याग एक्ट 1942, उदयपुर राज्य धर्म परिवर्तन निषेध कानून 1946 आदि.

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धर्म परिवर्तन कानूनों की भारतीय राज्यों में स्थिति को लेकर यह ग्राफिक कांग्रेस लाइब्रेरी (LoC) से साभार.


आज़ादी के बाद राष्ट्रीय स्तर पर हुई कोशिश
पूरे देश के स्तर पर आज़ादी के बाद संसद के माध्यम से कानून बनाने की कवायदें होती रहीं, लेकिन ऐसा हो न सका. 1954 में ऐसा एक बिल पेश किया गया था, जो लागू होता तो मिशनरियों को धर्म परिवर्तन का रजिस्ट्रेशन करवाना अनिवार्य होता, लेकिन यह बिल पास नहीं हुआ. इसके बाद, 1960 में हिंदू धर्म की पिछड़ी जातियों के इस्लाम, ईसाईयत, यहूदी और पारसी धर्मों में हो रहे कन्वर्जन को रोकने के लिए एक बिल पेश हुआ था.

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साल 1979 में फिर धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी बिल संसद में पेश हुआ था, जो एक से दूसरे धर्म में होने वाले कन्वर्जन पर प्रतिबंध की बात करता था. 1979 में ही 29 मार्च को इस बिल के खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन हुए थे, जिसमें करीब 1 लाख लोग सड़कों पर उतर आए थे. यही नहीं, 2015 में एनडीए सरकार ने फिर राष्ट्रीय स्तर पर एंटी कन्वर्जन कानून बनाने की कोशिश की थी, लेकिन सरकार के ही कानून मंत्रालय ने यह कहकर इस विचार को खारिज कर दिया कि यह राज्यों के अधिकार क्षेत्र का मामला है.

राज्यों ने की ज़ोर आज़माइश
इस तरह का कोई कानून बनाने वाले पहले दो राज्य ओडिशा और मध्य प्रदेश थे. 1967 में ओडिशा और 1968 में मप्र में यह कानून बनाए जाने के बाद 1978 में अरुणाचल प्रदेश में धार्मिक स्वतंत्रता एक्ट बना था. हालांकि 2018 में पेमा खांडू सरकार ने इसे खत्म करने की कोशिश की थी क्योंकि राज्य में यह कानून महज़ कागज़ी खानापूरी बनकर रह गया है.

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उप्र में 'लव जिहाद' के खिलाफ कानून चर्चा में है.


इनके साथ ही, तमिलनाडु में एक विवादास्पद कानून 2002 में बना था, लेकिन 2004 में उसे खत्म भी कर दिया गया. मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब 2003 में गुजरात में कन्वर्जन के विरुद्ध कानून बना था. हिमाचल में 2006 और उत्तराखंड में 2008 में इस तरह के कानून बने.

सुप्रीम कोर्ट का क्या कहना रहा? साल 1977 में रायपुर के एक पादरी रेव स्टैनिसैलस ने मध्य प्रदेश के संबंधित कानून को चुनौती दी थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कन्वर्जन मौलिक अधिकार नहीं है और राज्य इस बारे में अपने नियम-कानून बना सकते हैं.


कांग्रेस सरकारों में भी बने ये कानून
मौजूदा समय में इस तरह का माहौल दिखता है कि भाजपा जैसी दक्षिणपंथी विचारधारा की पार्टियां इस तरह के कानून में ज़्यादा दिलचस्पी ले रही हैं, लेकिन कई राज्यों में धर्म परिवर्तन से जुड़े कानून तब बने, जब कांग्रेस सरकारें सत्ता में थीं. मप्र में यह कानून कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में विधानसभा में आया था, लेकिन पास तब हुआ जब गैर कांग्रेसी सरकार बनी. छत्तीसगढ़ ने मप्र के ही कानून को अपनाया. हिमाचल में वीरभद्र सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के समय यह कानून बना था.
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