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गोलियां चलीं, खून बहा तब जाकर भारत में मिली थी भोपाल रियासत

विलीनीकरण आंदोलन के बाद भोपाल का भारत में विलय हुआ था.

विलीनीकरण आंदोलन के बाद भोपाल का भारत में विलय हुआ था.

भोपाल (Bhopal) के नवाबी स्टेट का भारत में विलय कैसे हुआ था? ये भी जानें कि जिन्ना (Mohammad Ali Jinnah) के करीबी रहे भोपाल के नवाब (Bhopal Nawab) के खिलाफ विलीनीकरण आंदोलन क्यों भड़का था.

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    जब देश आज़ाद हुआ, तब 1947 में 26 अगस्त को भोपाल रियासत (Bhopal Princely State) ने भारत में शामिल होने का ऐलान किया था, लेकिन अगले करीब दो साल तक भोपाल रियासत में भारत का तिरंगा (Indian Flag) नहीं बल्कि अपना अलग झंडा लहराता रहा. सैद्धांतिक सहमति के बावजूद भोपाल रियासत का भारत में औपचारिक विलय (Merger into India) 1949 में हो सका था, लेकिन एक जन आंदोलन (People Movement) के बाद, जिसमें खून भी बहा था. जानिए भारत के एकीकरण के दौर में किस तरह भोपाल रियासत भारत का हिस्सा बनी और उस वक्त क्या कुछ घटा.

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    आज़ादी मिलने के वक्त भोपाल की नवाबी रियासत का इतिहास (History of Bhopal) कुछ सवा दो सौ साल का था. दोस्त मोहम्मद खान (Dost Mohammad Khan) की बसाई इस रियासत में उस वक्त नवाब हमीदुल्लाह खान थे, जो भोपाल के आखिरी नवाब साबित हुए. माउंटबेटन (Mountbatten) और भारतीय नेताओं के बीच हुए करार के बाद भारत विभाजन (India Partition) और आज़ादी साथ मिल रही थी और तमाम रियासतों को ये विकल्प मिला था कि भारत या पाकिस्तान (Pakistan) में से एक देश चुनें और विलय करें. भोपाल रियासत का विलय कितनी मुश्किलों के बाद हुआ था, जानें.

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    मुस्लिम लीग समर्थक थे भोपाल नवाब
    सुल्तान कैखुसरो जहां बेगम के बेटे और 1926 में भोपाल के नवाब बने हमीदुल्लाह खान मुस्लिम लीग के सक्रिय सदस्य थे और 1930-32 में हुए गोलमेज़ सम्मेलन में खास प्रतिनिधि थे. मोहम्मद अली जिन्ना के साथ हमीदुल्लाह की वफादारी जगज़ाहिर थी. लेकिन, जब 1947 में किसी एक देश को चुनने की बात आई तब हमीदुल्लाह ने कश्मीर, हैदराबाद, सिक्किम जैसी रियासतों की तरह दोनों विकल्पों को नकारते हुए अपनी एक स्वायत्त रियासत की दलील दी.

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    भोपाल की नवाबी रियासत का झंडा और राज्य चिह्न इस तरह का था.


    माउंटबेटन ने अपील की खारिज
    भोपाल के स्वतंत्र रियासत बने रहने की हमीदुल्लाह की अपील को माउंटबेटन ने खारिज करते हुए उस वक्त लिखा था कि दो देशों के बीच में एक छोटी सी रियासत कैसे स्वतंत्र स्टेट बनकर रह सकती है. हालांकि आज़ादी का दिन नज़दीक आने के वक्त तक किसी एक विकल्प के साथ जाना नवाब की मजबूरी बन चुकी थी और जब हमीदुल्लाह ने देखा कि उनकी दोस्त कुछ और रियासतें भारत के साथ विलय हो रही हैं तो 1947 में उन्होंने भारत के साथ विलय होने की सहमति दी. लेकिन, वह अगले कुछ समय तक अपनी कोशिशें जारी रखने के मूड में थे कि भोपाल स्वतंत्र रियासत बनकर ही रह सके.

    ऐसे भड़का विलीनीकरण आंदोलन
    हमीदुल्लाह ने भारत सरकार के साथ बातचीत करते हुए भोपाल को अलग स्वतंत्र राज्य घोषित करने पैरवी की थी. असल में, भोपाल एक मुस्लिम नवाबी स्टेट था लेकिन वहां आबादी हिंदू बहुल थी. नवाब के अलग रहने की इच्छा बने रहने की खबर के बाद दिसंबर 1948 में भोपाल में एक जनआंदोलन शुरू हुआ, जब नवाब हज के लिए गए हुए थे. शंकरदयाल शर्मा, भाई रतन कुमार गुप्ता जैसे नेताओं के नेतृत्व में भोपाल के भारत में विलय के लिए 'विलीनीकरण आंदोलन' शुरू हुआ. आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा तो नवाबी व्यवस्था ने इसे कुचलने की कोशिश भी की. कुछ आंदोलनकारी शहीद हुए तो शर्मा जैसे कुछ नेताओं को कई महीनों के लिए जेल में रहना पड़ा.

    फिर पटेल ने किया था हस्तक्षेप
    भोपाल में आंदोलन के ज़ोर पकड़ने के बाद जब नवाबी पुलिस ने आंदोलनकारियों पर गोलियां तक बरसा दीं और कई शहीद हो गए, तब सरदार पटेल ने अपने दूत वीपी मेनन को स्थिति को काबू में करने के लिए कहा था. मेनन ने भोपाल के नवाब पर दबाव बनाकर एक करार किया और आखिरकार 1 जून 1949 तक भोपाल बाकायदा भारत में शामिल हुआ. इसके बाद पहली बार भोपाल में औपचारिक रूप से तिरंगा लहराया और नवाबी झंडा उतरा.

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    भोपाल का मशहूर मिंटो हॉल, जो लंबे समय तक विधानसभा भवन के तौर पर जाना गया.


    पहले कमिश्नरी व्यवस्था हुई थी
    भोपाल के 1949 में भारत के साथ विलय हो जाने के बाद वहां भारत के राष्ट्रपति द्वारा मुख्य कमिश्नर की नियुक्ति कर शासन संभाला गया था. सिंध क्षेत्र से आने वाले रिफ्यूजियों के लिए भोपाल के पश्चिम के उपनगर बैरागढ़ में रिहाइश की व्यवस्था की गई. इसके बाद 1952 में यहां पहली बार चुनाव हुए और तब शंकरदयाल शर्मा पहले मुख्यमंत्री बने थे.

    भोपाल का नवाब खानदान
    इस पूरे विलीनीकरण के चलते नवाब हमीदुल्लाह ने अपनी बड़ी बेटी आबिदा सुल्तान को नवाब की पदवी देना चाही थी लेकिन आबिदा ने पाकिस्तान में बसने का विकल्प चुना और वह वहां विदेश मंत्रायलय व विभाग में आला पदों पर भी रहीं. आबिदा के पाकिस्तान जाने के बाद भारत सरकार ने उन्हें निष्कासित माना और इसके बाद नवाब की छोटी बेटी साजिदा सुल्तान ने गद्दी संभाली. फिर 1971 में देश की तमाम रियासतों का तब खात्मा हो गया जब भारत सरकार ने प्रिवी पर्स की विशेष व्यवस्था खत्म कर दी. गौरतलब है कि मशहूर क्रिकेटर मंसूर अली खान उर्फ नवाब पटौदी इन्हीं साजिदा सुल्तान के बेटे थे और बाद में उन्हें ही भोपाल के नवाब के तौर पर मान्यता मिली थी.

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