जब अपराधियों की कटी नाक जोड़ने से हुई थी प्लास्टिक सर्जरी की शुरुआत

सर्जरी के दौरान मरीज को बेहोश करने के लिए शराब के साथ कई तरह की औषधियां मिलाई जाती थीं- सांकेतिक फोटो
सर्जरी के दौरान मरीज को बेहोश करने के लिए शराब के साथ कई तरह की औषधियां मिलाई जाती थीं- सांकेतिक फोटो

प्लास्टिक सर्जरी (Plastic surgery) या किसी भी तरह की सर्जरी का इतिहास काफी अनोखा है. इसकी शुरुआत भारत से मानी जाती है, जो बाद में अरब से होते हुए पश्चिम तक पहुंची.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 4, 2020, 6:11 PM IST
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अगर आप मानते हैं कि प्लास्टिक सर्जरी और नाक-होंठों को आकार देना मॉर्डन युग और पश्चिमी देशों की देन है तो यहां ये कहना चाहिए कि इसकी शुरुआत करीब 2500 साल पहले भारत में हो चुकी थी. प्राचीन भारतीय चिकित्सक सुश्रुत, जिन्हें सर्जरी का जनक माना जाता है. उन्होंने सुश्रुत संहिता में इसका जिक्र किया है. सुश्रुत ने लिखा है कि तब नाक की सर्जरी कैसे की जाती थी, किस तरह से स्किन ग्राफ्टिंग होती थी. साथ ही बेहोशी की दवा यानी एनेस्थीसिया के तरीकों का भी जिक्र है.

प्राचीन भारत में क्यों नाक की प्लास्टिक सर्जरी की जरूरत पड़ती थी. इसकी कहानी भी कम रोचक नहीं है. प्राचीन भारत में आमतौर पर गंभीर अपराधों में सजा के तौर पर नाक और कान काट दिए जाते थे. इसके बाद सजायाफ्ता अपराधी चिकित्सा विज्ञान की मदद से नाक वापस पाने की कोशिश करता था. माना जाता है कि सर्जरी के जनक माने जाने वाले सुश्रुत ने नाक वापस जोड़ने की सर्जरी सफलतापूर्वक करते थे. संहिता में लगभग 300 तरह की सर्जिकल प्रक्रियाओं का उल्लेख है. इसमें कैटरेक्ट, ब्लैडर स्टोन निकालना, हर्निया और यहां तक कि सर्जरी के जरिए प्रसव करवाए जाने का भी जिक्र है.

सर्जरी के जनक माने जाने वाले सुश्रुत ने नाक वापस जोड़ने की सर्जरी सफलतापूर्वक करते थे




आज के वक्त में इसे रिकंस्ट्रक्टिव राइनोप्लास्टी के रूप में जाना जाता है. सुश्रुत संहिता में जिक्र है कि गालों या माथे से नाक के बराबर की स्किन काट कर उसका सर्जरी के दौरान इस्तेमाल किया जाता था. सर्जरी के बाद किसी तरह का संक्रमण रोकने के लिए औषधियों के इस्तेमाल की सलाह दी जाती थी. इसके तहत नाक में औषधियां भरकर उसे रूई से ढंक दिया जाता था. पश्चिमी देशों में इसके लिए सिरका या शराब का इस्तेमाल होता था. जख्म वाली जगह को इन चीजों से भर दिया जाता था ताकि संक्रमण न हो.
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सुश्रुत संहिता का 8वीं सदी में अरबी भाषा में अनुवाद हुआ, जिसके बाद ये पश्चिमी देशों तक पहुंचा. सुश्रुत को सर्जरी का जनक कहा जाता है. उनकी तस्वीर एसोसिएशन ऑफ प्लास्टिक सर्जन्स ऑफ इंडिया की मुहर (सील) पर बनी होती है. पूरी दुनिया में नाक की सर्जरी के सुश्रुत के तरीके का ही संशोधित तरीका इस्तेमाल होता है, जिसे इंडियन मैथड के तौर पर जाना जाता है. सर्जरी के अलावा सुश्रुत संहिता में 11 सौ बीमारियों का जिक्र है. साथ ही उनके इलाज के लिए 650 तरह की दवाओं का भी उल्लेख है. ये बताती है कि चोट लगने पर खून के बहाव को कैसे रोका जाए, टूटी हड्डियां कैसे जोड़ी जाएं.

ब्रिटिश सर्जन जोसेफ कॉन्सटेन्टिन ने इस प्रक्रिया के बारे में पढ़ने के बाद 20 सालों तक लाशों के साथ इस प्रक्रिया की प्रैक्टिस की- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


सर्जरी के दौरान मरीज को बेहोश करने के लिए शराब के साथ कई तरह की औषधियां मिलाई जाती थीं. सबसे अनोखा था कटे हुए स्थान की सिलाई का तरीका. चिकित्सा शास्त्र में उल्लेख है कि ये काम बड़ी और खास तरह की चींटियां किया करतीं. उन्हें क्रम में घाव के ऊपर रख दिया जाता. उनके जबड़े घाव के लिए क्लिप (wound clips)का काम करते. टांकों की जगह चींटियों का उपयोग तब आम था.

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14वीं और 15वीं सदी में इटलीवालों को इसकी जानकारी हुई. बाद में साल 1793 में भारत प्रवास के दौरान दो अंग्रेज सर्जनों ने नाक की सर्जरी अपनी आंखों से देखी. ये तीसरे एंग्लो-मैसूर युद्ध के दौरान की बात है. अगले साल लंदन की जेंटलमैन मैगजीन में इसका जिक्र भी हुआ. एक ब्रिटिश सर्जन जोसेफ कॉन्सटेन्टिन ने इस प्रक्रिया के बारे में पढ़ने के बाद 20 सालों तक लाशों के साथ इस प्रक्रिया की प्रैक्टिस की. इसके बाद असल ऑपरेशन किया गया जो कामयाब रहा. ये साल 1814 की बात है.

सर्जरी के लिए शरीर को समझने के लिए काटने-छांटने की पश्चिमी देशों में पहले इजाजत नहीं थी- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


वैसे सर्जरी के लिए शरीर को समझने के लिए काटने-छांटने की पश्चिमी देशों में पहले इजाजत नहीं थी. रिसर्च वेबसाइट rasmussen.edu के मुताबिक 13वीं सदी के मध्य में चर्च ने पहली बार मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए चीर-फाड़ पर हामी भरी. इसके बाद से मृत शरीरों को काटकर समझने का चलन हुआ. यही वो कदम था, जिसके बाद सर्जन्स ने एनाटॉमी को समझा और सर्जरी आसान होती चली गई.

शुरुआत में सर्जरी की प्रक्रिया काफी दर्दनाक थी और ऑपरेशन टेबल पर ही बहुत से मरीजों की मौत हो जाती थी. असल में तब बेहोशी की दवा यानी एनेस्थीसिया का चलन नहीं था. ऐसे में डॉक्टर ज्यादा संवेदनशील हुए तो मरीज को अफीम या शरब पिला देते थे ताकि उसे दर्द कम हो.

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ज्यादातर मामलों में ये भी नहीं होता था और पेट या किसी बड़ी से बड़ी चीर-फाड़ के दौरान भी मरीज होश में रहता था. उसका शरीर हिले-डुले नहीं, इसके लिए उसे ऑपरेशन टेबल पर बांध दिया जाता था. अक्सर मरीज की दर्द से मौत हो जाती थी. 18वीं सदी की शुरुआत में जापान में जनरल एनेस्थीसिया दिया जाने लगा, जो धीरे-धीरे हर देश में फैला. हालांकि इसके भी कई खतरे होते थे. जैसे ज्यादा एनेस्थीसिया जाने पर मरीज कोमा में चला जाता था. बाद में इसके लिए एक्सपर्ट नियुक्त किए जाने लगे.
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