कराची से आतंक का रूट कैसे बन गया मुंबई का समुद्री रास्ता?

भारत और पाकिस्तान (India Pakistan) के दो प्रमुख बंदरगाह मुंबई (Mumbai) और कराची (Karachi) हैं जिनका कारोबारी इतिहास रहा है. जानिए किन घटनाओं और बदलते समय के साथ इस रूट के मायने बदलते चले गए.

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: August 29, 2019, 11:58 PM IST
कराची से आतंक का रूट कैसे बन गया मुंबई का समुद्री रास्ता?
समुद्री रास्ते से हमले की पाकिस्तान की साज़िश के इनपुट के बाद हाई अलर्ट घोषित. फाइल फोटो.
Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: August 29, 2019, 11:58 PM IST
भारत और पाकिस्तान (India & Pakistan Tension) के बीच तनावपूर्ण खबरों के सिलसिले में एक सुर्ख़ी ये है कि पाकिस्तान अब समुद्री रास्ते (Sea Route) से भारत में आतंकी हमले (Terror Attack) की फिराक में है. इस खबर में ये भी कहा गया ​है कि गुजरात (Gujarat) के कांडला बंदरगाह के ज़रिए इस हमले की स्क्रिप्ट रची जा सकती है. इसलिए इसके साथ ही कई अन्य बंदरगाहों पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है और हाई अलर्ट (High alert) जारी कर दिया गया है. भारत पाकिस्तान के बीच समुद्री रास्ते के बारे में आप क्या जानते हैं? इन रास्तों का इतिहास, इनका विकास और समय के साथ आए बदलाव क्या कहानी कहते हैं?

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खुफिया एजेंसी (Intelligence Agency) के इनपुट के मुताबिक़ पाकिस्तान में ट्रेनिंग लेने के बाद कमांडोज़ समुद्री रास्ते के ज़रिए घुसपैठ (Infiltration from Pakistan) कर गुजरात में किसी बड़े हमले की फिराक में हैं. हाल में भारतीय नौसेना (Indian Navy) ने आशंका जताई थी कि जैश-ए-मोहम्मद (Jaish-e-Mohammad) अपने आतंकियों की एक विंग को अंडरवॉटर ट्रेनिंग दे रहा है. हालांकि, भारतीय नौसेना ने पूरी तैयारी की बात भी कही. आपको याद होगा पहले भी कुछ दफ़ा मुंबई में आतंकी हमलों (Mumbai Terror Attacks) की साज़िश इसी समुद्री रास्ते से रची गई. जानिए कि ये समुद्री मार्ग क्या है और कैसे आतंक का रूट बनता गया.

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मुंबई और कराची के बीच गुजरात के समुद्री तटों को भी कारोबार से ब्रिटिश राज में ही जोड़ा गया.


सदियों पहले से चलन में है ये रूट
इतिहास की परतें खोली जाएं तो पता चलता है कि भारत के पश्चिमी समुद्री इलाके प्राचीन समय से यात्राओं के लिए इस्तेमाल में रहे. व्यापार मामलों के इतिहासकार प्रोफेसर द्विजेन्द्र त्रिपाठी के हवाले से एक मीडिया रिपोर्ट में उल्लेख था कि पहली से तीसरी सदी के बीच लिखे गए 'पेरिप्लस ऑफ द एरित्रायन सी' शीर्षक वाले दस्तावेज़ में हवाला मिलता है कि भारत के पश्चिमी समुद्री तटों पर काफी आवागमन रहा. दूसरे प्राचीन ट्रैवलॉग्स में भी ऐसा ज़िक्र मिलता है.
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ब्रिटिश राज में बने इंटरनेशनल बंदरगाह
अंग्रेज़ों ने ईस्ट इंडिया कंपनी शुरू करने के बाद जब भारत को अपने अधीन किया, तब पश्चिम भारत में बंदरगाहों का विकास शुरू हुआ. अंग्रेज़ों ने अपने कारोबारी फायदे के लिए मुंबई और कराची जैसे बड़े बंदरगाह बनवाए. तेज़ी से पश्चिमी भारत के पोर्ट्स का विकास कर इनके ज़रिए अंतरराष्ट्रीय कारोबार शुरू हुआ और साथ ही यही रास्ते सांस्कृतिक आदान प्रदान का ज़रिए भी बने.

मुंबई और कराची के बीच गुजरात के समुद्री तटों को भी कारोबार से ब्रिटिश राज में ही जोड़ा गया. भारत की आज़ादी से पहले तक कराची असल में, बॉम्बे प्रेसीडेंसी का ही अंग था इसलिए गुजराती, मराठी, पारसी और गोवानी जैसे कई कारोबारी समुदाय मुंबई से कराची के बीच समुद्री सफर के ज़रिए कारोबार किया करते थे.


बॉम्बे डॉकयार्ड दुनिया में रहा मशहूर
बंदरगाहों के साथ ही अंग्रेज़ी राज में बॉम्बे डॉकयार्ड यानी जहाज़ निर्माण कारखाना भी शुरू हुआ था. जहाज़ निर्माण को लेकर जल्द ही बॉम्बे पूरी दुनिया में मशहूर हो गया था और कहा जाने लगा था कि यहां जिस क्वालिटी के जहाज़ बनते थे, उससे बेहतर दुनिया में कहीं नहीं. एचएमएस हिंदोस्तान, एचएमएस सीलोन, एचएमएस एशिया, एचएमएस कॉर्नवालिस और एचएमएस मिंडेन जैसे कई ऐतिहासिक जहाज़ भारतीयों ने यहां बनाए जो कई ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़कर अमर हुए.

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अंग्रेज़ी राज में बॉम्बे डॉकयार्ड यानी जहाज़ निर्माण कारखाना भी शुरू हुआ.


विभाजन ने किया सब चौपट
ब्रिटेन ने समुद्री दस्ते के रूप में जो रॉयल इंडियन नेवी तैयार की थी, 1947 में आज़ादी और विभाजन के बाद वह भारतीय नौसेना के रूप में पहचानी गई. आज़ादी के वक्त भारत के पास 538 ऐसे अफसरों के साथ ही 33 अहम जहाज़ थे. आज़ादी के बाद एक तरफ भारतीय नौसेना के विकास का सिलसिला शुरू हुआ तो वहीं अचानक पाकिस्तान के कराची बंदरगाह के साथ समुद्री संबंध टूटने लगे. 1978 में भारतीय कोस्ट गार्ड एक्ट पास हुआ, तब जाकर घुसपैठ और अन्य समुद्री अपराध रोकने की बाकायदा शुरुआत हुई.

18 साल चली थी मुंबई कराची फेरी
आज़ादी के बाद 1965 तक मुंबई और कराची के बीच नियमित रूप से फेरी सेवा चला करती थी, जिसके ज़रिए लोगों और छिटपुट सामान की आवाजाही हुआ करती थी लेकिन 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच जो युद्ध हुआ, उसका नतीजा ये हुआ कि इस सेवा को बंद कर दिया गया. सालों बाद समुद्री रास्ते के ज़रिए दोनों देशों के बीच कारोबार फिर शुरू हुआ लेकिन सख़्त कायदों और जांचों के बीच.

समुद्र के रास्ते तस्करी का दौर
1960 और 70 के दशक में मुंबई के समुद्री रास्ते से तस्करी ने ज़ोर पकड़ा था और कई स्मगलर इस बात का फायदा उठाते थे कि समुद्री रास्तों पर किसी किस्म की खास चौकसी को कोई बंदोबस्त नहीं हुआ करता था. इन्हीं हालात के चलते 1978 में कोस्ट गार्ड व्यवस्था हुई थी. अपने एक लेख 'स्टेप अक्रॉस दिस लाइन' में सलमान रश्दी ने लिखा था :

बचपन में परिवार के साथ बंबई से कराची हम समुद्री रास्ते से जाते थे. इस रास्ते पर पुराने स्टीमर साबरमती और सरस्वती चला करते थे. कच्छ के पास अक्सर ये स्टीमर घंटों रुका करते थे और वहां कई तरह के लोग और सामान चढ़ता उतरता था. एक बच्चे के तौर पर मैं तब ड्रग्स के बारे में नहीं सोच सकता था इसलिए सोने और जवाहरात के गैरकानूनी कारोबार की कल्पना करता था.


फिर हुई मछुआरों को समस्या
कोस्ट गार्ड की व्यवस्था हुई और उधर पाकिस्तान में भी मैरिटाइम सिक्योरिटी एजेंसी बनी. सर क्रीक समुद्री सीमा के इस तरफ भारत का समुद्र माना गया और उधर पाकिस्तान का लेकिन मछुआरों के लिए पानी में सरहद पहचान पाना हमेशा मुश्किल रहा. वैसे भी इस सीमा को लेकर लंबा विवाद चला और बहुत सी बातें तय नहीं थीं. इसके चलते दशकों से दोनों देश समुद्री सीमा के उल्लंघन के आरोप में एक दूसरे के मछुआरों को गिरफ्तार करते रहे और कभी-कभी रिहा करते रहे.

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दोनों देश समुद्री सीमा के उल्लंघन के आरोप में एक दूसरे को मछुआरों को गिरफ्तार करते रहे.


करगिल युद्ध के बाद
1999 में हुए करगिल युद्ध के बाद समुद्री सीमाओं पर और भी सख़्ती बरती गई. इसके बाद समुद्री रास्ते से सिविल ट्रांसपोर्ट तकरीबन बंद हुआ और केवल मंज़ूरी वाले कारोबार के लिए ही ये रास्ता खुलता था. ऐसे में पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए मछुआरों या कारोबारी जहाज़ों का गैरकानूनी ढंग से इस्तेमाल करते हुए घुसपैठ शुरू की. त्रासदी बन चुके 26/11 के मुंबई हमलों का आरोपी कसाब अपने साथियों के साथ कराची-मुंबई के इसी समुद्री रास्ते से आया था. इसके पहले और बाद भी कुछ आतंकियों के इसी रूट से आने जाने के खुलासे होते रहे.

इस रूट के बारे में तकनीकी बातें
कराची मुंबई समुद्री रूट के बीच गुजरात के कच्छ और जामनगर का इलाका पड़ता है और इनके बीच कच्छ की खाड़ी में कांडला पोर्ट मुख्य है. कांडला पोर्ट से भी कारोबार होता है यानी ये भी एक खुला रास्ता या पोर्ट है. मुंबई-कराची की समुद्री दूरी 937 किलोमीटर या 506 नॉटिकल मील है. आम तौर से इसे जहाज़ से तय करने में कम से कम 24 घंटे का समय लगता है.

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First published: August 29, 2019, 9:20 PM IST
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