जब चेक युवती ने चुंबन लिया तो झेंप गए ध्यानचंद

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: August 29, 2019, 6:24 PM IST
जब चेक युवती ने चुंबन लिया तो झेंप गए ध्यानचंद
ध्यान चंद एक मैच के दौरान

हॉकी के मैदान पर ध्यानचंद की जादूगरी और चमत्कारिक खेल के तो इतने किस्से हैं कि पूछिए मत. लेकिन उनके कुछ किस्से जो मैदान के बाहर के हैं, वो भी खासे रोचक हैं और एक मानवीय ध्यानचंद को बयां करते हैं

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भारतीय हॉकी के जादूगर ध्यानचंद 30 के दशक में यूरोप में तब हीरो बन गए जब 1932 के एम्सटर्डम ओलंपिक में उन्होंने भारतीय हॉकी टीम को अपने शानदार खेल से स्वर्ण पदक दिलाया. इसके बाद भारतीय यूरोप में कई स्थानों का दौरा करती हुई लौटी. चेकोस्लोवाकिया (अब चेक गणराज्य) में जब भारतीय हॉकी टीम गई तो ध्यानचंद के साथ ऐसा कुछ हुआ, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी.

इसका रोचक घटना का जिक्र ध्यानचंद की बहू डॉ. नीना उमेश ध्यानचंद ने अपनी किताब हॉकी के जादूगर ध्यानचंद, कहानी अपनों की और बोरिया मजूमदार ने अपनी किताब ओलंपिक्स-द इंडिया स्टोरी में किया है.

1932 में एम्सटर्डम में हुए ओलंपिक में भारतीय टीम ने अपने हर मैच में विरोधी टीमों को जबरदस्त तरीके से धोया. इसके बाद उन्होंने उसी अंदाज में फाइनल मैच भी खेला. इसमें कोई शक नहीं कि ध्यानचंद ने इस पूरे टूर्नामेंट में जिस तरह का खेल दिखाया, उससे लोग उनके दीवाने हो गए. यूरोप में उनकी लोकप्रियता अच्छी खासी हो गई.

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उस ओलंपिक में हॉकी का गोल्ड जीतने के बाद भारतीय हॉकी टीम हॉलीवुड गई. जहां उसका जोरदार स्वागत हुआ. उसके बाद वो चेकस्लोवाकिया की राजधानी प्राग पहुंचे, जहां उन्हें एक मैच खेलना था. यहां भी ध्यानचंद का जादू सिर चढ़कर बोल रहा था. भारतीय टीम का जोशोखरोश के साथ स्वागत हुआ. वहां मैच देखने आई एक चेक युवती तो उनके खेल से इतनी प्रभावित हुई कि वो जबरदस्त फैन बन गई.

उस लड़की ने तपाक से चुंबन ले लिया
मैच के बाद ये सुंदर युवती ध्यानचंद से मिलने पहुंची. युवती ने अपने अंदाज में उन्हें इस तरह विश किया कि वो झेंप गए. उस लड़की ने तपाक से ध्यानचंद को चुंबन दिया और कहा, आप तो किसी एंजेल से कम नहीं. वह लडक़ी उनसे अंतरंगता बढ़ाना चाहती थी. ध्यानचंद की स्थिति देखने लायक हो गई. वह बचते रहे. लगातार कहते रहे मैं पहले से शादीशुदा हूं.
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भारतीय टीम ने जब प्राग में मैच खेला तो चेक युवती ध्यानचंद के खेल से इतनी प्रभावित हुई कि खासतौर पर उनसे मिलने पहुंची और उन्हें चूम लिया.


टीम ने लिया हालत पर लुत्फ
टीम के सदस्यों ने भी उनकी इस हालत का भरपूर लुत्फ लिया. शायद ध्यानचंद इस वाकये का जिक्र भी नहीं करते अगर आईएचएफ के अध्यक्ष हेमन ने अपनी टूर बुकलेट में इस बारे में नहीं लिखा होता.

हॉकी के जादूगर ने लगाया गोलों का सैकड़ा
टीम ने यूरोप की यात्रा में जितने मैच खेले, उससे उसे पर्याप्त आमदनी भी हुई, तब भी तीन हजार रुपये की कसर बाकी रह गई. इस खर्च को आईएचएफ के अध्यक्ष हेमन ने खुद बर्दाश्त किया. ओलंपिक और यूरोप की यात्रा के साथ अन्य देशों में भारतीय टीम ने कुल मिलाकर 37 मैच खेले. इसमें उसने कुल 338 गोल किए जबकि 34 गोल खाए. ध्यानचंद ने पूरी यात्रा में 133 गोल किया, जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी.

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इस तरह सेना में अफसर बने
जब टीम वापस लौटी तो मुंबई के विक्टोरिया टर्मिनस पर उसका शानदार स्वागत हुआ. झांसी में ध्यानचंद के क्लब झांसी हीरोज ने भी उनके सम्मान में जोरदार पार्टी दी. जिस समय वह झांसी में ठहरे हुए थे, उसी दौरान उन्होंने वहां की सेना की टीम के खिलाफ झांसी हीरोज से एक मैच खेला.

ध्यानचंद जब 1932 में टीम को गोल्ड मेडल दिलाकर लौटे तो देशभर में हीरो बन गए थे. उन्हें रेलवे ने नौकरी की पेशकश की तब सेना ने पदोन्नति देकर रोका


इसके बाद एक अफवाह फैल गई कि ध्यानचंद सेना से त्यागपत्र देकर रेलवे ज्वाइन करने जा रहे हैं. रेलवे में उन्हें बहुत बढ़िया नौकरी ऑफर की गई है. बात सही भी थी. आईएचएफ के अध्यक्ष हेमन रेलवे बोर्ड के सदस्य थे. उन्होंने ध्यानचंद को रेलवे में एक अच्छी नौकरी का प्रस्ताव दिया था. अब करें तो क्या करें, ये उनकी समझ में नहीं आ रहा था. ध्यानचंद की बटालियन उन दिनों लाहौर में थी. जिसके कमांडिंग अफसर जनरल डंकन थे. जिनसे ध्यानचंद की लाहौर में मुलाकात हुई. उन्होंने आश्वस्त किया कि सेना में उनका बेहतर तरीके से ध्यान रखा जाएगा.
यकीनन अगर ध्यानचंद की मुलाकात जनरल डंकन से नहीं हुई होती तो वह शर्तिया सेना की नौकरी छोड़ देते. हालांकि वह इस बात से ज्यादा खुश थे कि उन्हें सेना की नौकरी नहीं छोड़नी होगी. उन्हें अब उम्मीद थी कि सेना में कैप्टन रैंक देकर उन्हें अफसर बना दिया जाएगा. ऐसा ही हुआ भी, उन्हें बहुत जल्दी कमीशन मिल गया.

घर में ध्यान चंद अपनी बहुओं के लिए स्नेहिल ससुर थे. वह महिलाओं को हमेशा बराबरी के पक्षधर रहते थे


अपने घर में ध्यानचंद
ध्यानचंद की छोटी बहू डॉ. उमेश मीना ध्यानचंद ने अपनी किताब में याद किया कि कैसे थे उनके ससुर यानी ध्यानचंद. उन्होंने लिखा, जब मेरी नई नई शादी सन 1969 में हुई थी. घर में कुछ मेहमान बाहर से आए थे. उनके आने के बाद मुझे बैठक में बुलाया गया. नई नई होने के कारण मुझे कुछ समझ में नहीं आया और मैं नीचे जमीन पर बैठ गई. उसी समय अचानक बाबू जी (ध्यानचंद) वहां आए. उन्होंने मुझे जमीन पर बैठे हुए देख लिया. उन्हें ये बात बहुत नागवार गुजरी. उन्होंने मेहमानों के सामने ही घर के अन्य सदस्यों से कहा- तुम लोगों ने ध्यान नहीं दिया, मेरे घर की बहू जमीन पर बैठी है और तुम लोग कुर्सी पर. उन्होंने उसी क्षण मुझे नीचे से उठाकर कुर्सी पर बिठाया. उन्होंने लिखा, 'ध्यानचंद ने घर में कभी लड़के और लड़कियों में भेदभाव नहीं किया. वह दोनों के समान अधिकारों, समान शिक्षा और समान व्यवहार के पक्षधर थे.'

...तो बहुत परेशान हो जाते थे
अगर घर में किसी बहू की तबीयत खराब हो जाती थी तो ध्यानचंद परेशान हो जाते थे. दिनभर में फिर वह लगातार उसका हालचाल लेते थे. ये पूछते थे कि उसने दवाई ली या नहीं. खुद ले जाकर डॉक्टर के यहां दिखाते थे. पत्नी को वह बराबर नसीहत दिया करते थे कि बहुओं को खुश रखना चाहिए. वह कहते थे, हमारे समाज में बहुएं भी किसी घर की लड़कियां होती हैं. वो शादी के बाद अपने मां-बाप, परिजनों को छोड़कर ससुराल आती हैं इसलिए उन्हें नए घर में पूरा प्यार दुलार और सम्मान के साथ अपनापन मिलना चाहिए. अगर ऐसा होगा तो वो कभी अपने मायके की याद नहीं करेंगी.

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First published: August 29, 2019, 4:02 PM IST
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