ऐसे बनती थीं विषकन्याएं, ज़हरीला बनाने के दौरान हो जाती थी मौत भी

विषकन्या का पूरा शरीर यानी खून, थूक सब कुछ जहरीला हो चुका होता था, लिहाजा उनसे किसी भी तरह का शारीरिक संबंध जानलेवा साबित होता.

News18Hindi
Updated: July 29, 2019, 12:51 PM IST
ऐसे बनती थीं विषकन्याएं, ज़हरीला बनाने के दौरान हो जाती थी मौत भी
इसके लिए बच्ची की बाकायदा ट्रेनिंग हुआ करती थी (प्रतीकात्मक फोटो)
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Updated: July 29, 2019, 12:51 PM IST
भारत में प्राचीन समय में राजा-महाराजाओं के पास विषकन्याएं हुआ करती थीं जो उनके सबसे खतरनाक दुश्मन को मारने या कोई भेद निकालने के काम आती थीं. इनके बनने की एक खास प्रक्रिया होती थी. ये ये एक तरह की 'ह्यूमन वेपन' हुआ करती थीं. 

खूबसूरत बच्चियों को छांटा जाता था
ये वे बच्चियां होती थीं जो अक्सर राजाओं की अवैध संतानें होती थीं, जैसे दासियों से साथ उनके मेल से आई संतानें. या फिर अनाथ या गरीब बच्चियां. इन्हें राजमहल में ही रखकर खानपान का ध्यान रखा जाता. कुछ दिनों बाद इन्हें जहरीला बनाने की प्रक्रिया शुरू होती. कम उम्र से ही कम मात्रा में अलग-अलग तरह का जहर दिया जाता. ये जहर खाने में मिला होता था. धीरे-धीरे जहर की मात्रा बढ़ाई जाती थी. इस प्रक्रिया में ज्यादातर बच्चियां मर जाया करतीं. कुछ विकलांग हो जातीं. जो बच्चियां सही-सलामत रहतीं, उन्हें और घातक बनाया जाता था.

मिलती थी ट्रेनिंग

उन्हें नृत्य-गीत, साहित्य, सजने-संवरने और लुभाने की कला में पारंगत बनाया जाता. पूरा ध्यान रखा जाता कि वो इस तरह तैयार हों कि किसी राजा-महाराजा से बातचीत कर उन्हें लुभा सकें. युवा होते-होते वो इतनी जहरीली हो जातीं कि उनके शरीर का स्पर्श भी जानलेवा हो जाया करता. चूंकि विषकन्या का पूरा शरीर यानी उनका थूक, पसीना, खून सब कुछ जहरीला हो चुका होता था, लिहाजा उनसे किसी भी तरह का शारीरिक संबंध जानलेवा साबित होता. उनका इस्तेमाल दूसरे राजाओं या सेनापति को मारने या फिर जरूरी जानकारियां निकलवाने के लिए किया जाता.

जो बच्चियां जिंदा बच जातीं, उन्हें और घातक बनाया जाता था (प्रतीकात्मक फोटो)
जो बच्चियां जिंदा बच जातीं, उन्हें और घातक बनाया जाता था (प्रतीकात्मक फोटो)


डरे हुए राजा ने की शुरुआत
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जहरीला बनाने की इस पूरी प्रक्रिया को मिथ्रिडायटिज़म (mithridatism) नाम से जाना जाता है. इसके तहत शरीर में धीरे-धीरे जहर डालकर उसे जहर के लिए इम्यून बनाया जाता है. इस शब्द का इतिहास भी दिलचस्प है. ये पोंटस और आर्मेनिया के राजा Mithridates VI के डर से उपजा था. राजा के पिता को जहर देकर मारा गया था. इससे राजा इतना डर गया कि वो तरह-तरह की कल्पनाएं करने लगा. भविष्य में उसके साथ ऐसा न हो, इसके लिए वो रोज खुद थोड़ा-थोड़ा जहर खाता ताकि उसकी मौत न हो.

खास तरह का जहर
मिथ्रिडायटिज़म हर तरह के जहर के साथ नहीं किया जाता था. इसके लिए केवल उसी तरह का जहर लिया जाता था जो बायोलॉजिकली ज्यादा जटिल संरचना के हों क्योंकि शरीर का इम्यून सिस्टम उसी पर प्रतिक्रिया देता है. एक बार थोड़ा जहर देने के बाद दोबारा उसी तरह का जहर देने पर लिवर की कंडीशनिंग हो जाती है और वो ज्यादा एंजाइम बनाता है, जिससे जहर पच जाए. इसे सायनाइड के उदाहरण से समझा जा सकता है. सेब या कई दूसरे फलों के बीज में सायनाइड होता है, जो अक्सर हम खा भी लेते हैं. चूंकि ये थोड़ी मात्रा में शरीर के भीतर जाता है, लिहाजा आदी हो चुका हमारा लिवर उसे पचा जाता है.

हिंदू माइथोलॉजी में भी जिक्र
कहा जाता है कि ग्रीक राजा सिकंदर (अलेक्जेंडर द ग्रेट) जब दुनिया फतह करने निकला था तो उसके गुरु अरस्तू ने उसे भारत की विषकन्याओं के बारे में आगाह किया था. युद्धकला के महारथी मेसेडोनिया के इस प्रशासक ने भारत फतह के दौरान खास ध्यान रखा कि उसका यहां की युवतियों के साथ ज्यादा संबंध न हो या हो भी तो जांच-परखकर. चाणक्य (340-293 ईपू) के अर्थशास्त्र में भी इसका जिक्र मिलता है.

जहरीला बनाने की इस प्रक्रिया को मिथ्रिडायटिज़म नाम से जाना जाता है (प्रतीकात्मक फोटो)
जहरीला बनाने की इस प्रक्रिया को मिथ्रिडायटिज़म नाम से जाना जाता है (प्रतीकात्मक फोटो)


मौर्य शासक चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल के दौरान उनके सलाहकार और गुरु चाणक्य ने इसमें विषकन्या तैयार करने की जरूरत पर बात की. हिंदू माइथोलॉजी कल्की पुराण में विष के बारे में कहा गया है कि वो इतनी जहरीली होती थीं कि देखने या चुंबन लेकर जान ले सकती थीं. नृत्य-गीत के देवता गंधर्व की पत्नी सुकन्या भी विषकन्या मानी जाती थीं.

किताबों में छाई रही विषकन्याएं
साहित्य में भी बेहद हसीन इन विषकन्याओं की चर्चा होती रही है. खासकर संस्कृत साहित्य में इसका काफी जिक्र मिलता है. हिंदी लेखिका शिवानी के इन पर उपन्यास हैं. वहीं मराठी साहित्य में भी इन पर लिखा गया है. विषकन्या- अनकहे रहस्य नामक किताब की लेखिका विभा राही ने साल 2009 में ये कहकर तहलका मचा दिया कि ऊंची जाति की महिलाएं अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए नीची मानी जाने वाली जातियों के पुरुषों से संबंध बनाती हैं. आत्मकथानक इस किताब में इसी पर बात की गई थी. साल 2007 में विषकन्या किताब आई जो hiv/AIDS पर बात करती है. इस पर फिल्में भी बनी हैं, जैसे 1943 में बनी विषकन्या में लीला मिश्रा ने अभिनय किया था.

लोककथाओं में भी विषकन्या विषय खूब फला-फूला. संस्कृत साहित्य सुकसप्तित (Śukasaptati) में तोता अपनी कहानी की नायिका को अपने शरीर के जहर से मारने वाली युवती पर कहानी सुनाता है. विदेशी साहित्य में भी ये विषय अछूता नहीं रहा. इंग्लिश पोएट Alfred Edward Housman के ख्यात कविता संकलन A Shropshire Lad में मिथ्रिडायटिज़म को रूपक की तरह इस्तेमाल किया गया. यानी गंभीर कविता अपने पाठक पर मिथ्रिडायटिज़म की तरह ही असर करती है.

माता हारी का असल नाम मार्गरेट ट्सेला था जो नृत्यांगना थीं
माता हारी का असल नाम मार्गरेट ट्सेला था जो नृत्यांगना थीं


मॉडर्न जमाने की विषकन्या
हालांकि ऐसा कोई ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं है जो पुराने समय में विषकन्याओं के होने की पुष्टि कर सके लेकिन तब भी दुनिया भर के साहित्य और लोकगाथाओं में उल्लेख इसके होने पर मुहर लगाता है. हनी ट्रैप को विषकन्या का ही आधुनिक टर्म माना जाता है. ये एक तरह की महिला जासूस होती हैं जो सेना के अधिकारियों से जरूरी जानकारियां निकालने के लिए अपनी सुंदरता को हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं. कई ऐसी हनी ट्रैपर रहीं, जो किंवदंतियां बन चुकी हैं.

इन्हीं में से एक है माता हारी. इन्हें बाद में एजेंट H21 के नाम से जाना गया जो कि उनका सीक्रेट कोड था. नीदरलैंड्स में साल 1876 में जन्मी माता हारी का असल नाम मार्गरेट ट्सेला था. बाद में एक पुजारी ने इन्हें माता हारी नाम दिया. इंडोनेशिया में इसका अर्थ सूर्य होता है. ये बेमिसाल सुंदरी और बेहद कामुक नृत्यांगना थीं. पहले विश्वयुद्ध में उन्हें जर्मनों की ओर से फ्रांस की जासूसी के आरोप में मौत की सजा दी गई लेकिन आखिर तक ये साफ नहीं हो सका कि वे दरअसल किसके लिए काम करती थीं. हाल ही के वक्त में भारतीय डिप्लोमेट माधुरी गुप्ता पर भी हनी ट्रैप का इलजाम लगा. वह इस्लामाबाद की इंडियन हाई कमीशन में काम करती थीं. उन पर आरोप था कि वह पाकिस्तान की ओर से भारत की जासूसी कर रही हैं.

कई विषपुरुष भी रहे हैं
बिल हास्ट एक ऐसे ही विषपुरुष हैं जो मियामी में सांपों के लैब के डायरेक्टर हुआ करते थे. वह मेडिकल और रिसर्च के लिए सांपों के जहर निकाला करते थे. उन्हें सैकड़ों बार दुनिया के सबसे जहरीले सांपों ने काटा था. धीरे-धीरे वह हर तरह के जहर के लिए इम्यून हो गए. गिनीज बुक में भी उनका नाम है. ऐसे ही बर्मा मूल का एक शख्स जहरीले सांपों का जहर निकालकर उनसे अपने शरीर पर टैटू बनाया करता था.

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First published: July 29, 2019, 11:25 AM IST
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