आखिर ब्रिटेन को हांगकांग से क्यों है इतना मतलब?

आखिर ब्रिटेन को हांगकांग से क्यों है इतना मतलब?
ब्रिटेन ने चीन के नए कानून से परेशान हांगकांग के 30 लाख लोगों को ब्रिटिश नागरिकता देने की पेशकश की

ब्रिटेन ने चीन के नए कानून से परेशान हांगकांग के 30 लाख लोगों को ब्रिटिश नागरिकता देने की पेशकश (Britain offers citizenship to Hong Kong people) की. कोरोना संकट से उपजी मंदी के दौर में ये काफी बड़ी बात है.

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हांगकांग में सुरक्षा कानून लागू होने के बाद से बवाल मचा हुआ है. ब्रिटेन ने कानून के कारण सकते में आए लोगों को अपने यहां नागरिकता देने की बात की. उसका आरोप है कि चीन ने ब्रिटेन के साथ समझौते को तोड़ा और वहां के नागरिकों को परेशान किया. इसपर चीन ने पलटवार करते हुए कहा कि कि हांगकांग के लोग चीनी नागरिक हैं और वो उन्हें दूसरे किसी देश की नागरिकता नहीं लेने देगा. साथ ही उसने ब्रिटेन पर कड़ा कदम उठाने की धमकी दी. इसके बाद भी ब्रिटेन अपनी बात पर डटा हुआ है कि वो हांगकांग के नागरिकों को पांच सालों के लिए वीजा देगा, जो स्थायी नागरिकता में भी बदल सकता है. जानिए, क्या है ब्रिटेन का हांगकांग के साथ संबंध.

अफीम का कारोबार
सबसे पहले ब्रिटेन और चीन के बीच अफीम तस्करी को लेकर लड़ाई हुई. दरअसल चीन को ब्रिटिश व्यापारी चाय के बदले अफीम सप्लाई करते थे. चीन में अफीम का इस्तेमाल दवाएं बनाने और खाने के लिए होता था. हालांकि अफीम वहां अवैध थी, तब भी मांग के साथ चुपके-चुपके वहां ब्रिटेन भारत से अफीम पहुंचाने लगा. यहां तक कि वहां के लोगों को इस नशे की लत लग गई. साल 1839 में अपने लोगों की हालत देखते हुए चीन के राजा डाओग्वांग ने नशे के खिलाफ युद्ध शुरू किया. छापेमारियां हुईं. नशा जब्त होने लगा.

अफीम युद्ध में हजारों चीनी सैनिक मारे गए, वहीं ब्रिटिश सेना का नहीं के बराबर नुकसान हुआ

ब्रिटेन ने किया हमला


चूंकि ब्रिटिश सरकार को भारत से मिलने वाले राजस्व में बड़ा प्रतिशत अफीम के व्यापार से था इसलिए ब्रितानी हुकूमत भड़क गई. उन्होंने चीन में समुद्र के रास्ते सेना भेज दी. चीनी सेना उनसे लड़ाई के लिए तैयार नहीं थी. साथ ही सैनिकों को भी अफीम की लत थी. वे नशे में होने की वजह से लड़ाई नहीं कर सके. इस अफीम युद्ध में हजारों चीनी सैनिक मारे गए, वहीं ब्रिटिश सेना का नहीं के बराबर नुकसान हुआ.

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हुआ गैर-बराबरी का समझौता
युद्ध के बाद साल 1842 में ब्रिटेन और चीन के बीच एक समझौता हुआ. ये इतना गैरबराबरी का था कि इसे अनइक्वल ट्रीटी के नाम से जाना जाता है. समझौते के तहत चीन को अपने बंदरगाह ब्रिटिश व्यापारियों के लिए खोलने पड़े. यहां तक कि अफीम के कारोबार को नुकसान पहुंचाने के लिए उसे ब्रितानी हुकूमत को बड़ा हर्जाना भी देना पड़ा. यही वो संधि है, जिसके तहत ब्रिटेन को हांगकांग पर कब्जा मिला.

नए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत चीन हांगकांग में सीधे दखल दे सकता है, इसी का विरोध हो रहा है


वापस लौटाया गया हांगकांग
आगे चलकर साल 1984 में हुए नए समझौते के तहत तय हुआ कि ब्रिटेन अपने उपनिवेश हांगकांग को चीन को वापस सौंप देगा. ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर और चीन में जाओ जियांग ने साझा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इसमें 13 सालों बाद हांगकांग चीन के पास जाना था. साल 1997 में ऐसा ही हुआ. ब्रिटेन से 155 सालों बाद हांगकांग चीन के पास पहुंचा. हालांकि चीन ने समझौते के तहत स्वायत्ता की शर्त समेत कई बातों पर हामी भरी थी, जैसे इसे विशेष प्रशासनिक क्षेत्र घोषित किया गया. चीन में कम्युनिस्ट व्यवस्था है, जबकि हांगकांग में पूंजीवादी. चीन ने हांगकांग को लेते हुए ब्रिटेन के साथ पक्का किया कि वहां के नागरिकों को जिस तरह के अधिकार थे, वो चीनी हाथों में आने के बाद भी बने रहेंगे.

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क्या कहता है नया कानून
अब हांगकांग में नया कानून पारित हो चुका है. इस नए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत चीन हांगकांग में सीधे दखल दे सकता है. हांगकांग में नया नेशनल सेक्युरिटी ऑफिस बनेगा, जो वहां के हालात पर नजर रखेगा. खुफिया जानकारी इकट्ठा करेगा. अगर इस कार्यालय ने किसी के खिलाफ कोई मामला दर्ज किया, तो इसकी सुनवाई चीन में भी हो सकती है.

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कानून ये भी कहता है कि चीन का ये कार्यालय किसी सुपर वॉच-डॉग की तरह काम करेगा. हांगकांग के उसके साथ तालमेल के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग बनाना होगा. साथ ही उसकी बात भी माननी सुननी होगी. हांगकांग में अगर कोई सुरक्षा कानून से खिलवाड़ करने का दोषी पाया जाएगा तो उसे आजीवन कारावास भी हो सकता है. यानी एक तरह से कम्युनिस्ट चीन की सारी सेंसरशिप अब हांगकांग पर भी लागू होगी.
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