ऐसे होता है दुनिया के सबसे ताकतवर नेता का चुनाव, जानिए अमेरिकी राष्‍ट्रपति बनने की प्रक्रिया

ऐसे होता है दुनिया के सबसे ताकतवर नेता का चुनाव, जानिए अमेरिकी राष्‍ट्रपति बनने की प्रक्रिया
अमेरिकी राष्ट्रपतियों का आधिकारिक आवास व्हाइट हाउस.

इस साल 3 नवंबर (3 November 2020) को अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव होने है जिसकी लंबी प्रक्रिया की शुरुआत हो चुकी है.

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अमेरिका की वैश्विक शक्ति और वर्चस्व के मद्देनजर अक्सर कहा जाता है कि वहां का राष्ट्रपति होना दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारी है. इस साल 3 नवंबर (3 November 2020) को अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव (American Presidential Election Voting) होने हैं जिसकी लंबी प्रक्रिया की शुरुआत हो चुकी है. ये चुनाव अमेरिका का 46वां राष्ट्रपति चुनने के लिए हो रहे हैं. अब देखना है कि अमेरिकी जनता वर्तमान रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति माइक पेंस को दोबारा चुनेगी या फिर कोई डेमोक्रेट अमेरिका का राष्ट्रपति बनेगा.

डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति हैं और उन्होंने दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने के लिए अपना प्रचार अभियान शुरू कर दिया है. तो आइए जानते हैं क्या होता है अमेरिकी राष्ट्रपति बनने का प्रोसेस...

पेपर वर्क से होती है शुरुआत
अमेरिकी सरकार की वेबसाइट पर एक वीडियो के जरिए राष्ट्रपति पद की अर्हताओं के बारे में बताया गया है. वेबसाइट के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन के लिए मुख्यत: तीन योग्यताओं की मांग होती है. उम्मीदवार की उम्र कम से कम 35 साल होनी चाहिए. उसे पैदाइशी रूप से अमेरिका का 'नेचुरल सिटीजन' होना चाहिए या फिर उसने देश में कम से कम 14 साल गुजारे हों.
अगर कोई व्यक्ति ये अर्हताएं पूरी करता है तो फिर वो अपना नामांकन करा सकता है. चुनाव में शामिल होने के लिए दस्तावेज अमेरिका के फेडरल इलेक्शन कमीशन में जमा करने होते हैं. हां एक और महत्वपूर्ण बात ये है कि ये सारी प्रक्रिया चुनाव की तिथि से एक साल पहले ही पूरी हो जानी चाहिए अन्यथा दावेदारी नहीं मानी जाएगी.



महत्वपूर्ण होते हैं प्राइमरी चुनाव
इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में प्राइमरी इलेक्शन फरवरी से जून महीने तक होंगे. प्राइमरी इलेक्शन अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के सबसे महत्वपूर्ण और शुरुआती पड़ाव होते हैं. अलग-अलग राज्यों में प्राइमरी इलेक्शन के द्वारा राजनीतिक पार्टियां ये पता लगाती हैं कि उनका सबसे मजबूत दावेदार कौन है? प्राइमरी इलेक्शन के जरिए ही डिस्ट्रिक्ट प्रतिनिधि भी चुने जाते हैं.

राष्ट्रपति पद का मजबूत कैंडिडेट पहचानने के लिए पार्टी के पास प्राइमरी के अलावा कॉकस की प्रक्रिया भी होती है. जहां प्राइमरी इलेक्शन में आम जनता की भागीदारी होती है वहीं कॉकस की प्रक्रिया में पार्टी के पारंपरिक वोटर और कार्यकर्ता ही हिस्सा लेते हैं जो शीर्ष नेतृत्व को प्रेसिडेंशियल कैंडिडेट चुनने में मदद करते हैं.

इसके बाद होता है राष्ट्रीय कन्वेंशन
प्राइमरी इलेक्शन के जरिए जो प्रतिनिधि चुने जाते हैं दूसरे चरण में वो ही राष्ट्रपति पद के कैंडिडेट का चयन करते हैं. इसी दौर में ये तय हो जाता है कि दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवार कौन होंगे. ये ही वो दौर है जब नामांकन की प्रक्रिया होती है. ये दौर इस साल जून महीने के बाद शुरू होगा.

फिर आता है तीसरा चरण
नामांकन के बाद फिर जबरदस्त चुनाव प्रचार का दौर चलता है जिसमें फंड जुटाने की कवायद भी की जाती है. गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को दुनिया के सबसे महंगे चुनावों में भी गिना जाता है. साल 2009 में जब बराक ओबामा पहले अश्वेत अमेरिकी राष्ट्रपति बने थे तब उनके पूरे चुनाव अभियान पर एक किताब भी आई थी. चुनाव प्रचार के दौरान दोनों दलों के प्रत्याशियों के बीच डिबेट का आयोजन भी टीवी चैनलों पर होता है. प्रत्याशी उन राज्यों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करते हैं जहां के वोटर फ्लोटिंग होते हैं, यानी जो किसी भी पार्टी के परंपरागत वोटर नहीं हैं.

इसके बाद होती है इलेक्टोरल कॉलेज की भूमिका
आम चुनावों के बाद शुरू होती है इलेक्टोरल कॉलेज की भूमिका. पूरे देश के मतदाता अपने-अपने राज्यों में इलेक्टर का चुनाव करते हैं. ये इलेक्टर दोनों पार्टियों के होते हैं. इनकी कुल संख्या 538 होती है. इसे इलेक्टोरल कॉलेज भी कहा जाता है. इसी इलेक्टोरल कॉलेज के सदस्यों की वोटिंग के जरिए आखिरी में तय होता है कि राष्ट्रपति कौन बनेगा.

दो बार राष्ट्रपति बनने की सीमा
दुनिया के अलग-अलग देशों में सुप्रीम पद पर बैठने की समयसीमा तय होती है. अमेरिका में ये सीमा दो बार पद पर बैठने की है. यानी कोई भी नेता इस पद पर दो बार काबिज हो सकता है.

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