क्या न्यूटन नस्लवादी थे? उनके नियमों को लेकर कैसे हो रही है 'विपरीत प्रतिक्रिया'?

मशहूर वैज्ञानिक आइज़ैक न्यूटन का चित्र

मशहूर वैज्ञानिक आइज़ैक न्यूटन का चित्र

Isaac Newton Death Anniversary : आप दसवीं तक भी स्कूल गए होंगे तो न्यूटन के गति के तीन नियमों (Newton's Law of Motion) से वाकिफ होंगे. अमेरिका से यूरोप तक श्वेत बनाम अश्वेत की जो जंग (Black vs White) चल रही है, उसका असर न्यूटन के इन नियमों की पहचान तक पहुंच चुका है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 31, 2021, 2:15 PM IST
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विज्ञान का अपना समाज है, जिसमें न्यूटन का नाम और उनके वैज्ञानिक सिद्धांतों (Scientific Theories) का ज़िक्र अदब के साथ होता रहा है. लेकिन समाज के विचार में इन दिनों न्यूटन का नाम एक 'ज़हरीली सोच' को बढ़ावा देने वाली धारणा से जुड़ गया है. नस्लभेद (Racism) के आरोपों के दौर में 'कैंसल कल्चर' अपने शबाब पर है. इसी का (Cancel Culture) नतीजा है कि इसी महीने नस्लवाद के विरोध की आंच 17वीं व 18वीं सदी के प्रसिद्ध वैज्ञानिक न्यूटन तक भी पहुंच गई. भौतिक शास्त्र (Physics) के प्रचलित वैज्ञानिक नियमों (Science Theories) से न्यूटन का नाम हटाए जाने की कवायद हुई है.

अमेरिका में पिछले साल दमनकारी रवैये के कारण हुईं अश्वेतों की मौतों के बाद नस्लवाद का विरोध आंदोलन का रूप ले चुका है. इसी आंदोलन के चलते अमेरिका में डिज़नी से लेकर डॉ. स्यूज़ जैसे नामों को खारिज करने की खबरें पहले आ चुकी हैं. कैंसल कल्चर के इसी सिलसिले में इस महीने का न्यूटन का नाम भी जुड़ा, जिनकी पुण्यतिथि 31 मार्च को होती है. सवाल यह है कि न्यूटन नस्लवाद के विरोध के दायरे में क्यों और कैसे आए?

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क्या है न्यूटन के विरोध का मामला?
कहा जा रहा है कि न्यूटन के नाम तक बात के पहुंच जाने का मतलब यही है कि नस्लवाद को लेकर विरोध चरम तक पहुंच रहा है. अमेरिका के मीडिया में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसका शीर्षक था 'The Miseducation of America's Elites'. इस रिपोर्ट में कहा गया कि कैसे प्रतिष्ठित स्कूल रेसिज़्म के खिलाफ कदम उठा रहे हैं.

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नस्लभेद विरोधी मुहिम में पहले भी कई मशहूर नाम कैंसल कल्चर के शिकार हो चुके हैं.


इन स्कूलों के हवाले से कहा गया कि अब फिज़िक्स में 'न्यूटन के गति के नियमों' को 'भौतिकी के मूलभूत नियम' यानी fundamental laws of physics कहने की शुरूआत हो चुकी है. इसके पीछे मकसद यही है कि शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में 'श्वेतों' को बढ़ावा देने की परंपरा खत्म की जा सके.



कितनी बढ़ चुकी है बात?

खबरों के मुताबिक अमेरिकी स्कूल 'श्वेत पहचान के इतिहास' जैसे कोर्स भी शुरू कर रहे हैं और नस्लवाद पर चर्चाओं के कई तरह के सेशन्स भी आयोजित किए जा रहे हैं. बताया जा रहा है कि बात सिर्फ एलीट स्कूलों तक की नहीं रह गई है बल्कि पब्लिक स्कूल भी इस दिशा में पहल कर रहे हैं. सैन डिएगो के यूनिफाइड स्कूल में जातियों के अध्ययन संबंधी पाठ्यक्रम नए सिरे से बनाए गए हैं और टीचरों को विविधता के हिसाब से बर्ताव करने की ट्रेनिंग दी जा रही है.

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क्या हैं पक्ष और विपक्ष में तर्क?

न्यूटन का नाम हटाए जाने की कवायद करने वालों का कहना है कि विज्ञान हो या शिक्षा का कोई भी क्षेत्र, हर जगह अश्वेतों और अन्य मानवीय नस्लों के विद्वानों ने भी काफी काम किया है, लेकिन "न्यूटन, आइंस्टीन, केल्विन जैसे नाम सिर्फ यही दर्शाते हैं कि ज्ञान श्वेतों की ही बपौती रहा और सब कुछ महान एक ही नस्ल ने किया."

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गति के नियमों से न्यूटन का नाम हटाए जाने संबंधी ट्वीट.


वहीं, सिक्के का दूसरा पहलू पेश करने वाले तर्क कहते हैं कि बेशक अश्वेत विद्वान भी कम नहीं हैं लेकिन "17वीं सदी में जब न्यूटन फिज़िक्स को समृद्ध कर रहे थे या 20वीं सदी की शुरूआत में आइन्सटीन, तब कौन से अश्वेत विद्वान क्या कर रहे थे?" हालांकि इस तरह के सवालों पर भी नस्लवादी सोच के ही आरोप लग रहे हैं और सोशल मीडिया पर बहस जारी है.

क्या सच में न्यूटन नस्लवादी थे?

भौतिकी के नियमों से न्यूटन का नाम हटाए जाने की कवायद के बीच एक आंदोलन की भावना को तवज्जो दिए जाने की बातें तो हैं, लेकिन खबरों में यह नहीं कहा गया है कि न्यूटन पर नस्लवाद के आरोप लगाकर विरोधियों ने उनका नाम हटाने की मुहिम छेड़ी. इसके बावजूद अगर इतिहास देखा जाए तो कम से कम एक प्रसंग तो मिलते है, जिनसे यह संकेत मिलता है कि न्यूटन श्वेत बनाम अश्वेत भावना में निष्पक्ष नहीं थे.

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एक बहुत चर्चित किस्सा है कि ब्रिटेन की कारोबारी साउथ सी कंपनी के स्टॉक में न्यूटन ने भारी निवेश किया था और इस कंपनी के घाटे के चलते उन्हें भारी नुकसान भी हुआ था. लेकिन, गौर करने की बात यह है कि यह कंपनी दक्षिण अमेरिका और दक्षिण सागर के द्वीपों में अश्वेत अफ्रीकी गुलामों की सप्लाई करने का धंधा करती थी. ऐसी कंपनी से मुनाफा कमाने की वजह से कहा जाता है कि न्यूटन कम से कम नस्लभेदी परंपराओं के विरोध में नहीं थे.

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ट्विटर पर जारी है बहस.


बहरहाल, न्यूटन के नाम हटाने की जो मुहिम जारी है, अगर खुद न्यूटन होते तो शायद अपनी बात दोहराते, जो उन्होंने साउथ सी कंपनी के घाटे के दौर में कही थी, 'मैं सितारों की चाल को तो समझ सकता हूं, लेकिन मनुष्य के पागलपन को नहीं.' खैर, कुछ भी हो न्यूटन को यह तो पता ही था कि समाज का अपना ​एक विज्ञान होता है, जिसमें हर क्रिया के विपरीत और बराबर प्रतिक्रिया तो होती ही है.
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