तीन तलाक मुद्दे पर राजीव गांधी से टकराने के बाद साइडलाइन होते गए आरिफ मोहम्मद!

तीन तलाक मुद्दे पर राजीव गांधी से टकराने के बाद साइडलाइन होते गए आरिफ मोहम्मद!
आरिफ मोहम्मद खान. फाइल फोटो.

शाह बानो केस के चलते मुसलमानों की प्रगतिशीलता के ज़बरदस्त पैरोकार के रूप में उभरे आरिफ मोहम्मद खान की ज़िंदगी और सियासी सफर कैसा रहा? ये भी जानें कि ट्रिपल तलाक संबंधी कानून में भूमिका निभाने के बावजूद कैसे सक्रिय राजनीति से दरकिनार हुए खान?

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तीन तलाक का मुद्दा फिर सुर्खियों में है क्योंकि ताज़ा खबरों के मुताबिक मोदी कैबिनेट ने इससे जुड़े बिल को पेश करने के लिए मंज़ूरी दे दी है. पहली बार ये मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर तब सुर्खियों में आया था, जब 80 के दशक में शाह बानो मुकदमा सुर्खियों में था. तब तीन तलाक प्रथा को खत्म करने की ज़बरदस्त पैरवी करते हुए एक केंद्रीय मंत्री ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से सीधे लोहा लिया था. यहां तक कि मंत्री पद से इस्तीफा तक दे दिया था. कौन हैं वो आरिफ मोहम्मद खान? जिन्होंने मुसलमानों की प्रगतिशीलता की वकालत की थी. देश भर में गूंजने के बाद कैसे खान धीरे धीरे सक्रिय राजनीति में दरकिनार होते चले गए?

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अस्ल में, 1978 में पेशे से वकील अहमद खान ने अपनी पहली पत्नी शाह बानो को तीन बार तलाक कहकर तलाक दे दिया था. शाह बानो समान नागरिक संहिता की दलील लेकर गुज़ारा भत्ता मांगने के लिए अपने पति के खिलाफ अदालत पहुंच गई थीं. सुप्रीम कोर्ट ने भी शाह बानो के पक्ष में फैसला दिया था लेकिन सालों चली इस कानूनी लड़ाई के बीच इस केस पर बहस के चलते मुस्लिम समाज तीन तलाक और मुस्लिम महिला के कोर्ट में जाने के खिलाफ आंदोलित हुआ था.



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इसी दरमियान, राजीव गांधी सरकार में गृह राज्य मंत्री रहे आरिफ मोहम्मद खान ने शाह बानो के पक्ष में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले की ज़बरदस्त पैरवी की थी और 23 अगस्त 1985 को लोकसभा में दिया गया खान का भाषण मशहूर और यादगार हो गया था. आखिरकार, इस केस में हुआ ये कि मुस्लिम समाज के दबाव में आकर राजीव गांधी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ संबंधी एक कानून संसद में पास करवा दिया, जिसने शाह बानो के पक्ष में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी पलट दिया. और तब, खान ने राजीव गांधी के इस स्टैंड के खिलाफ मुखर होते हुए न केवल मंत्री पद से इस्तीफा दिया बल्कि कांग्रेस से भी दामन छुड़ा लिया. आइए, प्रगतिशील स्टैंड के लिए मशहूर हुए खान के बारे में विस्तार से जानें.

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आरिफ मोहम्मद खान. फाइल फोटो.


ऐसी थी आरिफ खान की शुरूआती ज़िंदगी
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में 1951 में जन्मे आरिफ मोहम्मद खान का परिवार बाराबस्ती से ताल्लुक रखता था. बुलंदशहर ज़िले में 12 गांवों को मिलाकर बने इस इलाके में शुरूआती बचपन बिताने के बाद खान ने दिल्ली के जामिया मिल्लिया स्कूल से पढ़ाई की. उसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और लखनउ के शिया कॉलेज से उच्च शिक्षा हासिल की.

छात्र जीवन से ही खान राजनीति से जुड़े. भारतीय क्रांति दल नाम की स्थानीय पार्टी के टिकट पर पहली बार खान ने बुलंदशहर की सियाना सीट से विधानसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए थे. फिर 26 साल की उम्र में 1977 में खान पहली बार विधायक चुने गए थे.

कांग्रेस से जुड़ना, दामन छुड़ाना और...
विधायक बनने के बाद खान ने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ली और 1980 में कानपुर से और 1984 में बहराइच से लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने. इसी दशक में शाह बानो केस चल रहा था और खान मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के ज़बरदस्त समर्थन में मुसलमानों की प्रगतिशीलता की वकालत कर रहे थे. लेकिन राजनीति और मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग इन विचारों के विरोध में दिख रहा था.

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मुस्लिम नेताओं के दबाव में आकर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बिल संसद में पास करवा दिया. 1986 में राजीव गांधी और कांग्रेस के इस स्टैंड से नाराज़ होकर खान ने पार्टी और अपना मंत्री पद छोड़ दिया. इसके बाद खान ने जनता दल का दामन थामा और 1989 में वो फिर सांसद चुने गए. जनता दल के शासनकाल में खान ने नागरिक उड्डयन मंत्री के रूप में काम किया. लेकिन बाद में, उन्होंने जनता दल छोड़कर बहुजन समाज पार्टी का दामन थामा.

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पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी. फाइल फोटो.


बसपा के टिकट से 1998 में वो फिर चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे. फिर 2004 में, खान ने भारतीय जनता पार्टी जॉइन की. भाजपा के टिकट पर कैसरगंज सीट से चुनाव लड़ा लेकिन हार गए. फिर 2007 में उन्होंने भाजपा को भी छोड़ दिया क्योंकि पार्टी में उन्हें अपेक्षित तवज्जो नहीं दी जा रही थी. बाद में, 2014 में बनी भाजपा की केंद्र सरकार के साथ उन्होंने बातचीत कर तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाए जाने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई.

इस्लामी प्रगतिशीलता के रहे पैरोकार
खान हमेशा मुस्लिम समाज में सुधारों के समर्थक रहे और अपना स्टैंड वो राजीव गांधी के खिलाफ जाकर ज़ाहिर कर ही चुके थे. तीन तलाक प्रथा को लेकर खान ने हमेशा खुला विरोध ज़ाहिर किया था और कहा था कि इसे अपराध मानकर तीन साल जेल की सज़ा का प्रावधान होना चाहिए. इस्लामी सुधारों को लेकर वह कई नीति निर्धारण प्रक्रियाओं में शामिल रहे. कई थिंक टैंक्स के साथ जुड़े रहे और कई संस्थाओं के लिए व्याख्यान देते रहे.

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मशहूर लेखक के तौर पर करते रहे रूढ़ियों का विरोध
साल 2010 में बेस्ट सेलिंग किताबों में खान की लिखी किताब शामिल रही जो कुरआन के पाठ और समसामयिक चुनौतियों के विषय पर आधारित थी. इसके बाद से ही खान लगातार इस्लाम और सूफीवाद से जुड़े विषयों पर कई तरह के लेख और कॉलम लिखते रहे हैं. अपने लेखन के ज़रिए भी खान भारत के मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को खत्म किए जाने की पैरवी करते रहे हैं.

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शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए उन्होंने हमेशा कहा कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को पूरा हक मिलना चाहिए. इसके अलावा खान अपनी पत्नी रेशमा आरिफ के साथ मिलकर शारीरिक रूप से निशक्तों के लिए एक संस्था 'समर्पण' का संचालन भी करते हैं.

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