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कैसे भूपिंदर सिंह हुड्डा ने दर्ज की हरियाणा में सबसे बड़ी जीत, गढ़ी सांपला में ऐसे लड़ा गया चुनाव

News18Hindi
Updated: October 28, 2019, 9:45 AM IST
कैसे भूपिंदर सिंह हुड्डा ने दर्ज की हरियाणा में सबसे बड़ी जीत, गढ़ी सांपला में ऐसे लड़ा गया चुनाव
हरियाणा में कांग्रेस के खेवनहार भूपेंद्र सिंह हुड्डा

हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जननायक जनता पार्टी (JJP) ने गठबंधन वाली सरकार बना ली है. लेकिन कांग्रेस पिछले चुनाव की तुलना में इस बार काफी मजबूती से खड़ी हो गई है. जानिए इसके पीछे की कहानी.

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  • Last Updated: October 28, 2019, 9:45 AM IST
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चंडीगढ़. हरियाणा की राजनीति अब साफ हो गई है. भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जननायक जनता पार्टी (JJP) ने गठबंधन वाली सरकार बना ली है. प्रदेश की 40 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली बीजेपी के विधायक दल के नेता मनोहर लाल खट्टर प्रदेश के अगले सीएम पद की शपथ ले चुके हैं, वहीं जेजेपी प्रमुख दुष्यंत चौटाला ने डिप्टी सीएम बन गए हैं. इसके साथ ही प्रदेश की 31 सीटों विजय हासिल करने वाली कांग्रेस के मुखिया भूपिंदर सिंह हुड्डा विपक्ष में बैठने की तैयारी कर चुके हैं.

इस बार हरियाणा के चुनावों में चौंकाने वाला प्रदर्शन जेजेपी और उससे ज्यादा चौंकाने वाला प्रदर्शन कांग्रेस ने किया. एग्जिट पोल समेत बीजेपी का दावा था कि वो प्रदेश की 75 से अधिक सीटें जीत रही है. लेकिन यह समीकरण बदला. इसमें प्रदेश कांग्रेस के मुखिया व पूर्व हरियाणा सीएम भूपिंदर सिंह हुड्डा ने महती भूमिका निभाई. खास बात ये रही कि कांग्रेस को 2014 के 15 सीटों की तुलना में कांग्रेस 31 सीटों पर पहुंच गई. इसके अलावा खुद भूपिंदर हुड्डा अपनी गढ़ी सांपला सीट पर सबसे ज्यादा वोटों के अंतर से चुनाव जीत गए.

गढ़ी सांपला-किलोई विधानसभा सीट पर भूपिंदर सिंह हुड्डा को कुल 97,330 वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंदी सतीश नांदल को 39,256 वोट मिले. दोनों के बीच 58,312 वोट का अंतर था. ये हरियाणा में हुई सबसे बड़ी जीत थी.

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार भूपिंदर सिंह हुड्डा की इस बड़ी जीत के पीछे कुछ प्रोफेशनल इलेक्‍शन कैंपेनर्स हैं. बीते 2014 के विधानसभा व लोकसभा चुनाव, व 2019 के लोकसभा चुनाव में लगातार कांग्रेस का वोट प्रतिशत इस क्षेत्र में घटता जा रहा था. जानकारी के अनुसार प्रोफेनल इलेक्‍शन कैंपेनर्स की टीम ने इस गिरते वोट प्रतिशत के बीच नई रणनीत पर काम किया.

भूपिंदर सिंह हुड्डा से जुड़े एक विश्वस्त सूत्र के अनुसार, प्रोफेशनल्स की टीम ने इन प्रमुख मुद्दों पर काम किया-
1. 2016 के जाट आंदोलन में हुई आगजनी के बाद की परिस्थितियों में कांग्रेस पार्टी खासकर हुड्डा को नॉन जाट विरोधी नेता के रूप में देखा जाने लगा. नॉन जाट खासकर ब्राह्मण, हरिजन, खाती, धानक और बनिया समाज का हुड्डा से मोह भंग हो गया. इससे उबरने के लिए कांग्रेस पार्टी ने डोर टू डोर चुनाव प्रचार में इन खास बिरादरी के लोगों को शामिल किया और इनका विश्वास जीतने में सफल हुई.

2. बीजेपी प्रत्याशी सतीश नांदेल काफी लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे थे. पांच सालों तक वो लोगों के बीच में रहे थे, लेकिन हुड्डा की उपस्थिति कम थी इससे लोग नाराज थे. इसी बात को उठाकर सतीश नांदल काफी बढ़त हासिल कर रहे थे. इनके बारे में कई जगहों पर एक बात यह सुनने को मिली कि जिस दिन ये 2014 में चुनाव हारे थे, उसी दिन विधानसभा में किसी की मृत्यु हुई थी हार के बाद भी वो मृतक के अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे. इस विषय पर खास ध्यान दिया गया.
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3. नांदेल एक जाने माने कॉन्ट्रैक्टर भी हैं, उन्होंने बहुत से युवाओं को नौकरी भी दिलाई थी, इसीलिए इनके समर्थकों की तादाद भी बढ़ी थी. इससे निपटने के लिए दूसरी रणनीति पर काम किया गया.

4. हुड्डा के कार्यकाल में हर गांव में 4 चौधरी उभर कर आए थे. इन्हीं के करीबी लोगों ने ज्यादातर सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाया था. हुड्डा से मिलने के लिए भी लोगों ने इन्हीं चौधरियों के रास्ते होकर आना होता था. इस वजह से बाकी के लोग नाराज हुए कुछ पार्टी में खुद को निष्क्रिय कर लिए कुछ तो दूसरी पार्टियों में चले गए, इससे निपटने के लिए दीपेंदर हुड्डा ने अपने भाषणों में सभी को डायरेक्ट मिलने की सुविधा देने की बात कर रहे थे.

5. नान जाट मुख्य तौर पर ब्राह्मण मतदाताओं का कहना था कि 2009 तक हुड्डा को दिल खोलकर वोट दिया लेकिन उन्होंने ज्यादातर जाटों के कार्यों को वरीयता दिया इसीलिए उनका पूरी तरह से कांग्रेस से मोह भंग हो गया और लोकसभा चुनाव में बीजेपी द्वारा अरविन्द शर्मा को प्रत्याशी बनाने के बाद वो पूरी तरह से बीजेपी से जुड़ गए. इसके लिए हुड्डा मजबूत ब्राह्मण लोगों के निर्देशन में लोगों को मनाने की कोशिश किए. इसमें वर्तमान सरपंचों और पूर्व सरपंचों को जोड़ने की रणनीति काफी कारगर रही.

6. प्रतिद्वंदी पार्टी की तरफ से यह प्रचार किया जा रहा था कि अगर कांग्रेस की सरकार बन ही नहीं रही तो हुड्डा को जिताने से क्या फायदा, इसके लिए कांग्रेस यह कहती रही (वो अफवाह फैला रही हैं) कि चौधरी लाएंगे और फिर से गढ़ी सांपला में 22 घंटे बिजली पानी और सड़कों की सुविधा को दुरुस्त करेंगे. बीजेपी की तरफ से नांदल को मंत्री आदि न बनाए जाने के आश्वासन से लोगों का नांदेल में विश्वास कम और हुड्डा में विश्वास बढ़ा.

7. लोग भुपिंदर सिंह हुड्डा की तुलना में दीपेंदर हुड्डा को अधिक मधुर स्वभाव का जाट नेता मानते हैं. लेकिन आज भी हरियाणा की 36 बिरादरी का नेता इन्हीं को माना जाता हैं. इसीलिए बहुत से लोगों की यह मांग थी कि बड़े हुड्डा के बजाय गढ़ी सांपला से छोटे हुड्डा को चुनाव लड़ाया जाए. लेकिन ऐसा होता तो वो चौधरी लाने वाली बात के लिए लोगों को समझा नहीं पाते भूपिंदर हुड्डा के बजाय दीपेंदर हुड्डा के चुनाव लड़ने से किलोई में कांग्रेस को फायदा तो होता लेकिन जाटलैंड में कांग्रेस कमजोर हो जाती. इसीलिए कांग्रेस पार्टी ने बीच का रास्ता निकालते हुए किलोई से हुड्डा को चुनाव लड़ाया और 36 बिरादरी में दीपेंदर की लोकप्रियता का फायदा उठाने के लिए उनके गावों के दौरे करवाए गए.

कुछ अन्य प्रमुख बातें, जिनके मद्देनजर लड़ा गया चुनाव
प्रोफेशनल टीम की रिसर्च के दौरान यह बात पाई गई थी कि हुड्डा के समय में इस विधानसभा में काफी विकास कार्य हुए थे, सबसे ज्यादा इस विधानसभा के लोगों को नौकरियां मिली थीं, पर नौकरियों में जिस परिवार को नौकरी नहीं मिली थीं, वो हुड्डा विरोधी हो गए थे. पर इसका दूसरा पहलू यह भी था कि चंडीगढ़ के चौथे तल पर इस विधानसभा के आम लोगों की भी खूब सुनवाई होती थी. यहां के बहुत से लोगों ने हुड्डा के सरकार को राम राज का पर्याय माना था. इस विधानसभा को वीआईपी ट्रीटमेंट (नहरों में 15 दिन पर पानी आता था, गलियां सड़कें पक्की की गई थीं, बिजली 22 घंटे आती थी, जोहड़ों (पशुओं के नहाने के तालाबों ) व गंदे पानी की नालियों काफी स्वच्छ थे, पीने के पानी की डिग्गी की रिपेयरिंग व नए डिग्गियों का निर्माण किया गया था. पानी समय पर आता था. ये सभी व्यवस्थाएं अब बदहाल हो चली थीं. ये सभी बातें याद दिलाई गईं और चौधरी आएंगे तो फिर से ये व्यवस्थाएं ऐसे ही मिलेंगी.

रिसर्च में सबसे महत्वपूर्ण बात यह निकलकर आई थी कि लोग हुड्डा से नाराज नहीं थे, बल्कि हुड्डा के चार चौधरियों (ये वो लोग थे जो हुड्डा परिवार के करीबी बताए गए, हुड्डा से मिलने के लिए लोगों को इनसे मिलना पड़ता था, गावं में अगर दीपेंदर हुड्डा का कार्यक्रम हो या फिर कोई अन्य कार्यक्रम हो तो पार्टी के 4 चौधरियों के अलावा दूसरे को जानकारी नहीं मिल पाती थी. जब हुड्डा का राज था तो इन 4 चौधरियों का बोल-बाला था सभी सरकारी कार्य इन्हीं के दखल से होते थे तो लोगों का कहना था कि यही 4 चौधरी से ही हुड्डा वोट ले लें) से नाराज थे. जब यह बात दीपेंदर को पता चला तो उन्होंने अपने मीटिंगों में बोलना शुरू किया अगर किसी को मिलना है तो मुझसे डायरक्ट आकर मिलें किसी चौधरी से परमिशन लेने की जरूरत नहीं. बताया जाता है ये बात लोगों को काफी अच्छी लगी.

किनके माध्यम से प्रचार अभियान को गति दिया गया?
सभी मुख्य समस्याओं के समाधान के लिए जनता को समझाने हेतु मुख्य तौर पर चुनावी अभियानों का सहारा लिया जाता है लेकिन इस बार समय कम होने की वजह से पार्टी के वफादार कार्यकर्ताओं की ड्यूटी लगाई गई. प्रोफेशनल टीम की ओर आए सुझावों को प्रभावी तरीके लोगों को कहा गया.

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इस टीम ने की भूपिंदर सिंह हुड्डा की मदद
मुख्य तौर पर इस टीम में सभी आई-पैक संस्‍थान से बाहर आए लोग हैं. इनमें बद्रीनाथ जमीन पर कार्य कर रहे थे. उनके साथ पीके के साथ काम कर चुके आईआईएम से पढ़े लिखे मनीष कुमार मलेशिया से सहायता कर रहे थे. इसके अलावा टेक्सास यूनिवसिर्टी से पढ़े लिखे एकांक जाटवानी, टिस के शाहबाज अहमद, आईपैक में काम कर चुके संजीव कुमार व एस जॉर्डन प्रमुख भू‌मिका अदा की.

जानकारी के अनुसार बद्रीनाथ ने सबसे अहम भूमिका निभाई. वे उत्तर प्रदेश के मऊ जिले से हैं. उन्होंने दिल्ली के आईआईएमसी से पढ़ाई के बाद WHO और बाद में तीन सालों तक प्रशांत किशोर के साथ काम किया. इस दौरान उन्होंने चार सालों से देश में हुए कई महत्वपूर्ण चुनावी अभियानों में काम करते रहे.

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First published: October 27, 2019, 7:33 PM IST
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