झारखंड के आदिवासी इलाकों में क्यों आधी रह गई BJP, मजबूत किला ढहा

बीजेपी के पार्षद जिस हिसाब से कई निगमों में कांग्रेस के महापौर प्रत्याशी के लिए क्रॉस वोटिंग किए हैं. इससे संगठन में हड़कंप मचा हुआ है.

बीजेपी के पार्षद जिस हिसाब से कई निगमों में कांग्रेस के महापौर प्रत्याशी के लिए क्रॉस वोटिंग किए हैं. इससे संगठन में हड़कंप मचा हुआ है.

आखिर क्या बात हो गई कि झारखंड में आदिवासियों के बीच मजबूत मानी जाने वाली बीजेपी ने इस बार वहां मुंह की खाई है. आदिवासी उससे रूठे और उन्होंने चुनाव में इसका प्रदर्शन भी कर दिया. कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा को इसका फायदा मिला

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 23, 2019, 7:23 PM IST
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झारखंड विधानसभा के रिजल्ट काफी हद तक अब साफ हो चुके हैं. वो निर्णायक तस्वीर बनाते हुए लग रहे हैं. चुनाव ये भी बता रहे हैं कि पिछले कुछ बरसों से जो आदिवासी बीजेपी को सिर आंखों पर बिठाकर रखते थे, जहां से बीजेपी पर्याप्त सीटें जीतती थी, उसका वो दुर्ग इस चुनाव में दरक गया है.

झारखंड के वो विधानसभा इलाके जहां 50 फीसदी से ज्यादा आदिवासियों की आबादी है, वहां इस बार कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा का जादू चला है. बीजेपी पहली बार यहां सबसे कम सीटों पर पहुंच रही है.

कुल मिलाकर झारखंड में 17 ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां आदिवासियों की संख्या आधी से ज्यादा है. वो वहां बहुतायत में हैं. झारखंड की सरकार बनाने और बिगाड़ने में उनकी खास भूमिका रहती आई है. अब तक वो बीजेपी के लिए मजबूत किला का काम करते थे लेकिन इस बार उनका रुख भी बीजेपी के लिए बदला हुआ था.



बीजेपी ने इस बार यहां से महज चार सीटें जीती हैं, जो उसका झारखंड में अब तक का सबसे खराब विधानसभा प्रदर्शन है. पिछले चुनावों में उसे यहां से आठ सीटें मिली थीं, जिन्होंने सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई थी. इससे पहले वर्ष 2009 के चुनाव में जब वो केवल 18 सीटों तक पहुंच पाई थी, तब भी उसे इन सीटों पर पांच में जीत हासिल हुई थी.
कैसे फहराया जीत का झंडा
इस बार कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने मिलकर यहां परचम फहरा दिया है. दोनों ने मिलकर 11 सीटों पर कब्जा किया है जबकि पिछले चुनावों में वो यहां से मुश्किल से पांच सीटें जीत पाईं थीं. जिसमें कांग्रेस ने एक सीट जीती थी तो जेएमएम को चार सीटें मिली थीं. इस बार कांग्रेस को पांच सीटों पर जीत मिलती दिख रही है तो जेएमएम 6 सीटों पर काबिज हो रही है.

बीजेपी का कई मजबूत सीटों बिशुनपुर, सिमडेगा, गढ़वा और गुमला से सफाया हो गया है. पिछली बार उसने जो आठ सीटें जीती थीं, उसमें वो केवल कनके और सिंदरी पर जीत पाती हुई लग रही है. प्रदर्शन दोहराया है.

क्या था आदिवासियों का गुस्सा
उसकी एक वजह ये भी मानी जा रही है कि आदिवासी इलाकों में बीजेपी को लेकर इस बात का गुस्सा था कि उन्होंने इस राज्य का मुख्यमंत्री किसी आदिवासी को क्यों नहीं बनाया था. इस बार भी जब चुनावों की घोषणा हुई तो मुख्यमंत्री का चेहरा रघुवर दास ही था, जो आदिवासी नहीं हैं. इस बात को लेकर आदिवासियों में नाराजगी थी.

इस बात का फायदा झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और आरजेडी को मिला, जिन्होंने पहले से शिबू सोरेन के बेटे हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर दिया था.

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