कैसे नॉर्थ-ईस्ट को बीजेपी ने बना दिया 'कांग्रेस मुक्त'?

पिछले दो दशकों से बीजेपी ने नॉर्थ-ईस्ट पर पैर जमाने की बहुत कोशिश की. अब इस रीजन के चार राज्यों में वो सीधे सत्ता में है जबकि अन्य चार में वो उसके सहयोगी दलों के पास है सरकार.

News18Hindi
Updated: March 14, 2019, 3:42 PM IST
कैसे नॉर्थ-ईस्ट को बीजेपी ने बना दिया 'कांग्रेस मुक्त'?
न्यूज18 क्रिएटिव (मीर सुहैल)
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Updated: March 14, 2019, 3:42 PM IST
(स्वाति डे)
16 मई 2014 के दिन बीजेपी ने 543 सदस्यीय लोकसभा में 282 सीटें जीतीं, इसमें 60 फीसदी से ज्यादा सीटें हिन्दी हर्टलैंड से आईं, जहां पार्टी ने 226 में 191 सीटों पर कब्जा किया. इस क्षेत्र में इसके एनडीए पार्टनर केवल 11 सीटें ही जीत सके.



इस चुनावों में बीजेपी ने कांग्रेस को रौंदकर रख दिया. इस जीत के जरिए बीजेपी ने वर्ष 1984 के लोकसभा चुनावों के बाद  सबसे स्थायी और मजबूत सरकार बनाई. 84 में राजीव गांधी की अगुवाई में कांग्रेस ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उभरी संवेदना लहर में दो-तिहाई सीटें जीती थीं.

2014 की सफलता के पांच साल बाद बीजेपी हिंदी हर्टलैंड राज्यों में दमदार एंटी एनकंबेंसी फैक्टर के साथ इन राज्यों की सत्ता गंवा रही है. पिछले दिनों बीजेपी को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान विधानसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा. इससे पहले कांग्रेस ने उसे गुजरात चुनावों में कड़ी टक्कर दी. बहुत से राजनीतिक विश्लेषक अंदाज जाहिर कर चुके हैं कि पार्टी को इन राज्यों में खासा नुकसान उठाना पड़ेगा.

तो अब बीजेपी यहां से कहां जाएगी. शायद इसका जवाब उत्तर पूर्व के राज्यों में छिपा है. यद्यपि लोक सभा में सिटिजनशिप संशोधन बिल लाकर इस अवसर को ठेस तो पहुंचाई है लेकिन पार्टी को जब लंबे समय से इस बिल को लाने की तैयारी में थी तो उसे इसका अंदाज रहा होगा.

वैसे तथ्य ये है कि बीजेपी को उम्मीद है कि वो लोकसभा चुनावों में नॉर्थ-ईस्ट राज्यों में फायदे की स्थिति में रहेगी. साथ ही बीजेपी को ये अंदाज था कि 2014 में हिंदी के जिन राज्यों में उसने मजबूत पकड़ बनाई थी, वहां से उसे तगड़ा झटका मिल सकता है, लिहाजा बीजेपी ने इस घाटे को पाटने के लिए नॉर्थ-ईस्ट पॉलिसी बनाई, जो अब दिलचस्प फेस में है.

एक जमाना था जबकि बीजेपी इन राज्यों में संघर्ष कर रही थी लेकिन अब असम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में राज्य की सत्ता में है. मेघालय और नागालैंड में बीजेपी सरकार गठजोड़ के जरिए सरकार का हिस्सा है. यहां पर उसने नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) और नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव (एनडीपीपी) के साथ गठबंधन बनाया हुआ है. मिजोरम और सिक्किम में बीजेपी सत्ताधारी दलों का हिस्सा नहीं है लेकिन यहां की सत्ताधारी पार्टियां उस एनईडीए का हिस्सा हैं, जो केंद्र में एनडीए को समर्थन देती हैं.
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भला बीजेपी यहां तक पहुंच गई कि वो नॉर्थ-ईस्ट के आठ में चार राज्यों में शासन कर रही है, दो में गठजोड़ के साथ सत्ता में है और दो अन्य राज्यों में एनडीए के अलांयस के जरिए उनके साथ है. इस बात को समझने के लिए ये जानना भी जरूरी है कि 2016 तक नॉर्थ-ईस्ट रीजन में बीजेपी की अगुवाई वाली कोई सरकार नहीं थी.

गठजोड़ की शुरुआत
दरअसल बीजेपी ने इन आठ नॉर्थ-ईस्ट राज्यों में कभी हौसला नहीं छोड़ा था, भले ही उसे शुरुआत में सफलता नहीं मिल पाई. हाल के बरसों में वो यहां काफी बेहतर स्थिति में आ चुके हैं. ये सुनिश्चित करने के लिए कि नॉर्थ-ईस्ट कांग्रेस मुक्त हो जाए, बीजेपी ने हर उस पार्टी के साथ गठजोड़ किया, भले ही वो आइडोलॉजिक स्तर पर अंतर रखती हो. 2016 बीजेपी ने नॉर्थ-ईस्ट में एक अलायंस बनाया, जिसे नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (एनएफडीए) नाम दिया गया.

एनईडीए उस सियासी गठजोड़ नॉर्थ-ईस्ट रीजनल पॉलिटिकल फ्रंट (एनईआरपीएफ) से निकला, जो इस क्षेत्र में 11 पार्टियों का गठजोड़ था. एनईडीए केंद्र में एनडीए का समर्थन करता है.

1980 में अपने जन्म के बाद बीजेपी ने 1984 से नॉर्थ-ईस्ट में अपने उम्मीदवार खड़े करने शुरू करने शुरू किये थे. तब ये केवल अरुणाचल प्रदेश था, जहां वो इसी साल विधानसभा चुनावों में एक सीट जीत पाई थी. इसके बाद एक दशक से कहीं अधिक समय तक बीजेपी को यहां से कोई सफलता नहीं मिली. 2000 में मणिपुर विधानसभा चुनावों में उसे 60 में छह सीटें हासिल हुईं.

नॉर्थ-ईस्ट में बीजेपी की पहली सरकार अरुणाचल प्रदेश में बनी, हालांकि राज्य के वोटरों ने कभी इस पार्टी को नहीं चुना, चीन की सीमा को छूने वाले इस राज्य में दरअसल विजयी पार्टी के लोगों ने केंद्र से फंड हासिल करने के लिए पाला बदलकर बीजेपी का चोला पहन लिया. हालांकि इसके बाद भी बीजेपी ने अन्य पांच राज्यों में अपना खाता नहीं खोला था. लेकिन अब तस्वीर बिल्कुल अलग है. सभी चुनाव परिणामों का विश्लेषण करके कहा जा सकता है कि बीजेपी इस क्षेत्र में सहयोगियों के साथ और उनके बगैर भी दमदार विकल्प के तौर पर उभर चुकी है.

असम में बीजेपी लगातार अपनी मौजूदगी का अहसास कराती रही थी, ये वो राज्य भी है, नॉर्थ-ईस्ट में बीजेपी को ले जाने का वाहक भी बना. इन आठों राज्यों में 543 लोकसभा सीटों में 25 सीटों के चुनाव (4.6 फीसदी) होते हैं. 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की बीजेपी की अगुवाई से लेकर अब मोदी लहर तक बीजेपी लगातार इस क्षेत्र में पैर जमाने की कोशिश करती रही है, जो काफी हद तक मुख्य धारा की राजनीति से अलग रही है.

पार्टी ने यहां लंबा सफर तय किया है. उनका ये सफर नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में नहीं चुने जाने से लेकर इस इलाके को कमोवेश कांग्रेस मुक्त बनाने तक रहा है. इन आठ नॉर्थ-ईस्ट राज्यों की बागडोर या तो बीजेपी के पास है या एनडीए के उसके सहयोगी दलों के पास.

अरुणाचल प्रदेश
गौर करने की बात ये है कि अरुणाचल के लोगों ने कभी बीजेपी सरकार को शासन करने के लिए नहीं चुना. बीजेपी ने अपनी पहली सरकार इस राज्य में तब बनाई जबकि तत्कालीन मुख्यमंत्री गेगांग अपांग अपने यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के विधायकों के साथ बीजेपी में आ गए. ये तब हुआ जबकि केंद्र में अटल बिहारी वाजपेई की एनडीए सरकार थी.

सोर्स- ECI


यहां की किसी भी सरकार के लिए ये जरूरी था कि अगर उसे इच्छित फंड चाहिए तो उसे केंद्र सरकार से मिलकर चलना होगा. जैसे ही एनडीए ने 2004 का लोकसभा चुनाव गंवाया, अपांग ने तुरंत यू-टर्न लिया, लेकिन बीजेपी ने यहां तब लोकसभा की दोनों सीटें जरूर जीतीं.

बड़ी संख्या में विधायकों का बीजेपी की ओर पलायन फिर मौजूदा मुख्यमंत्री पेमा खांडू के दौर में हुआ. जुलाई 2016 में उन्होंने शुरुआत में कांग्रेस की सरकार बनाई लेकिन सितंबर में पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल प्रदेश (पीपीए) में चले गए, जो केंद्र में एनडीए का सहयोगी थी. एक महीने के बाद खांडू ने औपचारिक तौर पर बीजेपी की सदस्यता ले ली, इसके बाद पीपीए ने बेशक उन्हें सस्पेंड कर दिया लेकिन वो अन्य विधायकों के समर्थन से बीजेपी की सरकार बनाने में सफल रहे. 43 सदस्यीय सदन में उन्होंने 33 विधायकों का समर्थन साबित किया.

असम
अन्य नॉर्थ-ईस्ट राज्यों की तुलना में बीजेपी की स्थिति यहां बेहतर थी. असम नॉर्थ-ईस्ट का अकेला राज्य था, जहां वर्ष 1991 के बाद एनडीए ने विधानसभा चुनाव लड़ा और काफी बड़ी संख्या में सीटें भी जीतीं.  2016 में पार्टी ने यहां पहली बार चुनाव जीतकर अपनी सरकार बनाई. बीजेपी ने ये चुनाव कई क्षेत्रीय पार्टियों मसलन असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ मिलकर लड़ा था.

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कांग्रेस के विद्रोही नेता हेमंता बिश्वा शर्मा 2015 में बीजेपी की सदस्यता ली, उन्होंने राज्य में बीजेपी की जीत में अहम भूमिका निभाई. फिलहाल वो राज्य की बीजेपी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं. एनईडीए से संयोजक होने के नाते उन्होंने नॉर्थ-ईस्ट में बीजेपी की पकड़ मजबूत करने काफी काम किया. शर्मा ने सिटीजनशिप संशोधन बिल का समर्थन भी किया.

वर्ष 2016 में ये एनईडीए का गठन ही था, जिससे बीजेपी यहां क्षेत्रीय पार्टियों के साथ पींगे बढ़ा सकी और फायदे की स्थिति में आ पाई.

मणिपुर
मणिपुर में पिछले तीन कार्यकाल से कांग्रेस की सरकार बन रही है. वहीं दूसरी ओर बीजेपी का वोट शेयर पिछले दो दशकों से बेहतर करने में लगी थी. वर्ष 2000 से 2004 के बीच पार्टी का वोट शेयर बेहतर हुआ. ये तब की बात है जब केंद्र में वाजपेयी की सरकार थी. इसी समय पार्टी ने पहली बार यहां विधानसभा की सीटें भी जीतीं.

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हालांकि केंद्र में एनडीए की हार के साथ बीजेपी का नियंत्रण इस राज्य में तब तक खत्म सा रहा, जब तक केंद्र में मोदी पदासीन नहीं हो गए. वर्ष 2017 में बीजेपी ने विधानसभा चुनावों में 21 सीटें जीतीं लेकिन बहुमत के लिए जरूरी 30 के आंकड़े को क्षेत्रीय पार्टियों और निर्दलीयों के जरिए पूरा कर लिया. कांग्रेस चुनावों में अकेली बड़ी पार्टी के रूप में जरूर उभरी लेकिन सरकार नहीं बना पाई.

मेघालय
मेघालय में बीजेपी का वोट शेयर मामूली रहता आय़ा था. वास्तव में मेघालय के लोगों ने भी कभी बीजेपी सरकार को नहीं चुना था. राज्य लगातार कांग्रेस को चुनता आया था. लेकिन 2000 से एनडीए की सहयोगी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी यहां पर कांग्रेस का दमदार विकल्प बनकर उभरी.

पहली बार बीजेपी ने 1998 में विधानसभा चुनावों में तीन सीटें जीतीं. 2013 में पार्टी को कोई सीट नहीं मिल सकी. 2008 में उसे फिर दो सीटें मिलीं. 2009 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने यहां से कोई उम्मीदवार तक खड़ा नहीं किया था. मोदी लहर में यहां केवल पार्टी का वोट शेयर ही बढ़ सका था. वर्ष 2018 के विधानसभा चुनावों में मोदी यहां दो बार प्रचार करने आए, इसके बाद बीजेपी को 60 सदस्यों के सदन में केवल दो सीटें मिलीं. कांग्रेस ने 21 सीटें जीतीं लेकिन शर्मा ने टेबल की तस्वीर पलट दी. उन्होंने गैर कांग्रेसी दलों से गठजोड़ करके सरकार गठित कर दी.

नगालैंड
दिलचस्प बात ये है कि पिछले तीन लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने कभी यहां और मिजोरम से अपना प्रत्याशी खड़ा तक नहीं किया.  लेकिन यहां बनने वाली नागा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) और नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी केंद्र में एनडीए के सहयोगी रहे हैं. लेकिन एनपीएफ ने 2018 के विधानसभा चुनावों में एनडीए का समर्थन करने से इनकार कर दिया था. फिर एनपीएफ के विद्रोहियों के साथ मिलकर एनडीपीपी ने बीजेपी के सहयोग से सरकार बना ली. हालांकि लोकसभा चुनावों में वो कांग्रेस के सहयोगी थे.

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केंद्र में सरकार बनने के बाद मोदी ने अगस्त 2015 में नागा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. लेकिन नागा लीडरशिप में अब ये समझौता लागू नहीं होने से असंतोष है.

त्रिपुरा
1984 से लगातार कई नाकामियों के बाद आखिरकार बीजेपी का शिकंजा इस राज्य पर कस ही गया. 2018 के चुनावों में बीजेपी ने यहां जीत के बाद पहली बार सरकार बनाई. पार्टी ने मजबूत मानी जाने वाली सीपीआई (एम) की दो दशक से चली आ रही सत्ता को उखाड़ फेंका. वहां माणिक सरकार की सरकार पिछले चार कार्यकाल से चल रही थी.

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इस राज्य में चुनाव से पहले बीजेपी ने इंडिजीनियर पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) के साथ गठजोड़ किया. ये पार्टी राज्य के मूल लोगों के लिए अलग राज्य की मांग करती रही है.

मिजोरम
मिजोरम भी वो राज्य है, जहां के लोग कभी नहीं चाहते थे कि वहां बीजेपी की सरकार बने. पिछले तीन दशकों से ईसाई बहुत ये राज्य बारी बारी से कांग्रेस और मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के बीच सरकार चुनता रहा है.

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इस बार कांग्रेस के दो कार्यकाल के बाद राज्य की जनता ने एमएनएफ को चुना. 1999 से एमएनएफ केंद्र एनडीए का सहयोगी रहा है और फिलहाल एनईडीए का एक घटक. हालांकि एमएनएफ ने विधानसभा चुनाव बीजेपी के साथ मिलकर नहीं लड़ा था लेकिन पहली बार बीजेपी ने विधानसभा की एक सीट जीती.

सिक्किम
सिक्किम शायद अकेला राज्य है, जहां बीजेपी नॉर्थ-ईस्ट में अपने लिए कोई ज्यादा उम्मीद नहीं देखती. उसने 2004 में यहां से प्रत्याशी खड़ा किया था लेकिन उसने यहां से कभी कोई सीट नहीं जीती. पिछले पांच चुनावों में उसका वोट शेयर भी यहां 0.3 से 2.4 फीसदी के बीच रहता आया. लेकिन राज्य की सत्तारूढ पार्टी सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट केंद्र में 2016 से एनडीए की सहयोगी पार्टी है. राज्य के चुनावों में हालांकि इसने बीजेपी से दूरी बनाए रखी. केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजु यहां पूर्व फुटबॉलर बाईचुंग भूटिया की हमारो सिक्किम पार्टी का समर्थन कर रहे थे.

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वैसे एनडीए की केंद्र सरकार ने नॉर्थ-ईस्ट की बेहतरी के लिए लगातार अपना ध्यान केंद्रित रखा है और कई अच्छी योजनाओं को चलाने का काम किया है. साथ ही साथ केंद्र सरकार लगातार नॉर्थ-ईस्ट को मोटा फंड दे रही है. 2017-18 से 2019-20 के लिए नॉर्थ-ईस्ट को 1600 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया. इसका सबसे बड़ा हिस्सा असम (27.78 फीसदी) मिलता है. इसके बाद अरुणाचल को 13.06 फीसदी रकम मिली. सिक्किम को सबसे कम 06.54 फीसदी फंड दिया गया.

पीएम की लगातार यात्राएं
दिमाग में वोट शेयर को बढाने का ख्याल रखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कई बार नॉर्थ-ईस्ट के आठ राज्यों में लगातार यात्राएं की हैं. हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने दो कार्यकाल में यहां 38 बार आए थे. मोदी ने एक ही कार्यकाल में 30 यात्राएं कर डाली हैं.

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