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इंदिरा सरकार में चीफ जस्टिस की नियुक्ति में हुआ था विवाद, जानें कैसे बनते हैं मुख्य न्यायाधीश

News18Hindi
Updated: October 18, 2019, 12:45 PM IST
इंदिरा सरकार में चीफ जस्टिस की नियुक्ति में हुआ था विवाद, जानें कैसे बनते हैं मुख्य न्यायाधीश
जस्टिस बोबडे भारत के मुख्य न्यायाधीश बनने वाले हैं

जस्टिस एस ए बोबडे (Justice Bobde) भारत के अगले मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) होंगे. वो चीफ जस्टिस रंजन गोगोई (Ranjan Gogoi) की जगह लेंगे. ऐसे में ये जानना दिलचस्प है कि सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति होती कैसे है...

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  • Last Updated: October 18, 2019, 12:45 PM IST
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जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े (Justice Bobde) सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के अगले चीफ जस्टिस (Chief Justice) बनने वाले हैं. वो वर्तमान चीफ जस्टिस रंजन गोगोई (Ranjan Gogoi) की जगह लेंगे. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने जस्टिस बोबड़े को अगला सीजेआई बनाने की सिफारिश कानून मंत्रालय को भेजी है. जस्टिस गोगोई 17 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं. उसके बाद 18 नवंबर को जस्टिस बोबड़े चीफ जस्टिस बनेंगे. उनका कार्यकाल 23 अप्रैल 2021 तक होगा.

कैसे चुने जाते हैं भारत के मुख्य न्यायाधीश?

ये जानना दिलचस्प है कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की नियुक्ति के लिए कोई तय प्रक्रिया नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 124(1) में सिर्फ ये लिखा है कि एक सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया होगा, जिसके चीफ जस्टिस होंगे. लेकिन उनकी नियुक्ति कैसे होगी, इसको लेकर कोई खास प्रक्रिया नहीं बताई गई है. इस बारे में थोड़ी बहुत जानकारी संविधान के अनुच्छेद 126 से मिलती है. अनुच्छेद 126 में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति को लेकर कुछ दिशा निर्देश दिए गए हैं.

किसी तय प्रक्रिया के नहीं होने की वजह से ज्यादातर मामलों में परंपरा का निर्वहन होता है, जो पहले से चली आ रही है. चीफ जस्टिस की नियुक्ति इसी परंपरा से होती आई है.

क्या रही है सुप्रीम कोर्ट की परंपरा?

सुप्रीम कोर्ट की परंपरा के मुताबिक जब कोई चीफ जस्टिस रिटायर होते हैं, तो उनकी जगह उस वक्त के सबसे सीनियर जज को मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी सौंपी जाती है. सुप्रीम कोर्ट में जजों की रिटायरमेंट की उम्र 65 साल है. हालांकि सीनियरिटी का फैसला उम्र के आधार पर नहीं होता है. सीनियरिटी इस बात से तय होती है कि अमुक न्यायाधीश के पास सुप्रीम कोर्ट के जज के बतौर कितने वर्षों का अनुभव है.

अगर दो जजों के बीच टाई की स्थिति होती है. यानी अगर दो जजों ने एक ही दिन सुप्रीम कोर्ट जॉइन किया हो तो ऐसे में उनके हाईकोर्ट में जज रहने की अवधि देखी जाती है. जिसके पास भी हाईकोर्ट में जज के बतौर ज्यादा दिनों का अनुभव होता है, उसे सीनियर माना जाता है.
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how chief justice of india elected and why in indira government controversy happened in appiontment of cji
जस्टिस बोबडे


जस्टिस दीपक मिश्रा की सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के बतौर नियुक्ति के वक्त भी यही मुश्किल सामने आई थी. जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस चेलमेश्वर की सुप्रीम कोर्ट में जज होने का अनुभव बराबर का था. दोनों ने एक ही साथ 10 अक्टूबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट के जज की शपथ ली थी.

जस्टिस दीपक मिश्रा की उम्र जस्टिस चेलमेश्वर से चार महीने कम थी. लेकिन हाईकोर्ट में जज के बतौर अनुभव के आधार पर दीपक मिश्रा को वरीयता दी गई और अगस्त 2017 में वो सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बनाए गए थे.

चीफ जस्टिस बनने की क्या है प्रक्रिया?

भारत के मुख्य न्यायाधीश न्याय व्यवस्था और सरकार के तालमेल से चुने जाते हैं. इसके लिए एक Memorandum of Procedure है. जब भी किसी मुख्य न्यायाधीश के रिटायरमेंट का वक्त आता है तो उचित समय देखकर कानून मंत्रालय रिटायर होने वाले मुख्य न्यायाधीश से अगले चीफ जस्टिस के नाम का सुझाव मांगता है.

चीफ जस्टिस कानून मंत्रालय को अगले मुख्य न्यायाधीश के लिए सुप्रीम कोर्ट के सीनियर मोस्ट जज के नाम की सिफारिश करते हैं. किसी कंफ्यूजन की स्थिति में चीफ जस्टिस कॉलेजियम से संपर्क कर सकते हैं. चीफ जस्टिस से नाम मिलने के बाद कानून मंत्रालय उस नाम को प्रधानमंत्री को आगे बढ़ाते हैं.

प्रधानमंत्री इस मसले पर राष्ट्रपति से विचार विमर्श करते हैं. जिसके बाद नए चीफ जस्टिस पर फाइनल मुहर लगती है और राष्ट्रपति नए चीफ जस्टिस को उनके पद और गोपनीयता की शपथ दिलवाते हैं.

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जस्टिस रंजन गोगोई


सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और न्यायाधीश चुनने में क्या अंतर है?

भारत के मुख्य न्यायाधीश के चुनाव में सरकार का बस इतना रोल है कि कानून मंत्रालय चीफ जस्टिस से नए मुख्य न्यायाधीश का नाम मांगता है और उस नाम को प्रधानमंत्री को आगे बढ़ाता है. इसके अलावा इसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है. सरकार नए चीफ जस्टिस के तौर पर दिए गए नाम को वापस नहीं लौटा सकती है.

यहीं पर मुख्य न्यायाधीश और बाकी न्यायाधीशों की नियुक्ति में अंतर होता है. सुप्रीम कोर्ट के बाकी न्यायाधीशों की नियुक्ति में सरकार नाम को वापस लौटा सकती है. लेकिन इसमें भी अगर कॉलेजियम उस नाम की सरकार से दोबारा सिफारिश करे तो उसे मानना सरकार की मजबूरी होगी. एक बार के बाद सरकार किसी नाम पर आपत्ति नहीं जता सकती.

क्या कभी इस परंपरा का उल्लंघन भी हुआ है?

1950 में सुप्रीम कोर्ट के गठन के बाद से ही मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में ये परंपरा चली आ रही है. लेकिन इस बीच दो मौके ऐसे भी आए हैं जब इस परंपरा का उल्लंघन हुआ. जस्टिस ए एन रे और जस्टिस एम एच बेग की नियुक्ति में परंपरा का पालन नहीं किया गया. दोनों ही मौकों पर इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं.

जस्टिस ए एन रे 1973 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश चुने गए थे. जस्टिस ए एन रे सीनियरिटी के क्रम में चौथे नंबर पर आते थे. लेकिन इसके बावजूद उन्हें चीफ जस्टिस बनाया गया. उस वक्त जस्टिस जे एम शेलट, जस्टिस के एल हेगड़े और जस्टिस ए एन ग्रोवर सुप्रीम कोर्ट के सीनियर मोस्ट जजेज थे. लेकिन उन्हें इसलिए सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस के तौर पर प्रमोशन नहीं दिया गया क्योंकि इन्होंने केशवानंद भारती केस में सरकार के खिलाफ फैसला दिया था. केशवानंद भारती केस में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि संसद संविधान के मूलभूत ढांचे में बदलाव वाला संशोधन नहीं कर सकती.

ठीक इसी तरह से जस्टिस एम एच बेग को 1977 में सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस नियुक्त किया गया. जबकि उस वक्त जस्टिस एच आर खन्ना ज्यादा सीनियर जज थे. जस्टिस खन्ना ने भी इंदिरा सरकार को असहज करने वाला फैसला दिया था. जबलपुर के एडीएम के एक मामले में जस्टिस खन्ना ने कहा था कि वो सरकार की इस बात से सहमत नहीं हैं कि किसी भी व्यक्ति की हिरासत को सिर्फ इमरजेंसी लागू होने की बात कहकर, उस पर सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता.

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First published: October 18, 2019, 12:45 PM IST
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