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जानिए चीन ने कैसे बढ़ाया नेपाल में प्रभाव, सीमा विवाद के पीछे की क्या है असली वजह

News18Hindi
Updated: May 23, 2020, 9:49 AM IST
जानिए चीन ने कैसे बढ़ाया नेपाल में प्रभाव, सीमा विवाद के पीछे की क्या है असली वजह
चीन ने तेजी के साथ बीते सालों में नेपाल में अपना दखल बढ़ाया है.

भारत (India) के साथ नेपाल (Nepal) का सीमा विवाद (Border Dispute) पुराना है लेकिन ऐसी आक्रामक भाषा का इस्तेमाल पहले नहीं हुआ. माना जा रहा है कि इसके पीछे चीन (China) का प्रभाव काम कर रहा है. चीन ने बीते सालों में नेपाल में अपना राजनीतिक और सामाजिक दखल तेजी के साथ बढ़ाया है.

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भारत के साथ बेहद नजदीकी नजदीकी और मधुर संबंध रखने वाले नेपाल की भाषा हाल-फिलहाल थोड़ी बदली हुई प्रतीत हो रही है. भारत और नेपाल के बीच का सीमा विवाद पुराना है लेकिन नेपाली सरकार की हालिया भाषा बेहद आक्रामक और 'बाहरी प्रभाव' में बोली गई लग रही है. कहा जा रहा है कि नेपाल की कम्युनिस्ट सरकार पर चीन का प्रभाव बढ़ रहा है और यही वजह है कि भारत के खिलाफ नेपाल की तरफ से आक्रामक तेवर अपनाए जा रहे हैं.

ओली को प्रधानमंत्री बनाए रखने में चीन ने की मदद
द डिप्लोमैट
पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक कुछ समय पहले नेपाल की केपी शर्मा ओली सरकार के  भीतर गुटबंदी तेज हो गई थी. प्रधानमंत्री के विरोधी गुट ने हस्ताक्षर अभियान भी चलाया था. सीनियर लीडर पुष्प कुमार दहल, माधव कुमार नेपाल ने ओली के खिलाफ गुटबंदी तेज कर दी थी. लेकिन इस गुटबंदी का अंत बेहद दिलचस्प तरीके से हुआ.

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नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली




नेपाल में चीन के एंबेस्डर Hou Yanqi ने कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के साथ सीरीज में बैठकें कीं. इन बैठकों में अपील की गई कि पार्टी के भीतर आपसी लड़ाई खत्म की जानी चाहिए. आपसी एकता बनाए रखने की बातें कही गईं. इसके बाद नाटकीय रूप से पार्टी के भीतर चल रहे बगावत के सुर बंद हो गए. ये नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभुत्व का एक उदाहरण भर है.



हालांकि आधिकारिक तौर पर इन बैठकों को कोरोना के खिलाफ प्रयासों से जोड़कर प्रदर्शित किया गया. लेकिन चीनी एंबेस्डर का ऐसे नेताओं के साथ सीरीज में बैठक करना जो पीएम के खिलाफ गुटबंदी कर रहे थे, अपनेआप में कई जवाब दे गया. और फिर इसके बाद गुटबाजी बंद भी हो गई. कई नेपाली मीडिया संस्थानों में पहले भी ऐसी रिपोर्ट की जा चुकी हैं कि चीन का दखल देश में सीमा से ज्यादा बढ़ रहा है. हालांकि नेपाली सत्ताधारी दल के नेता लगातार इन बातों को बकवास बताते रहे हैं.

2008 के पहले जब नेपाल में राजशाही थी, तब तक चीन सिर्फ राजा के साथ अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए नेपाल से संबंध में रहता था. लेकिन राजशाही के अंत के बाद चीन ने नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया. काठमांडु के एक राजनीतिक एक्सपर्ट चंद्र देव भट्ट के मुताबिक चीन नेपाल का महत्वपूर्ण पड़ोसी है. सामान्य तौर पर चीन के बारे में यही माना जाता है कि वो नेपाल के आंतरिक मसलों में दखल नहीं देता. ये बात पहले के लिए सही हो सकती थी लेकिन अब ये सच नहीं है. सच्चाई ये है कि नेपाल में राजनीतिक परिवर्तन के बाद चीन ने नेपाल में मजबूती के साथ अपनी जड़े जमाई हैं. पहले चीन का रोल नेपाल में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में दिखता था लेकिन अब आप ये असर हर तरफ देख सकते हैं. राजनीतिक से लेकर सामाजिक दखल तक.

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साल 2008 में जब नेपाल में माओवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, उसके बाद से ही चीन ने नेपाल में अपनी ताकत बढ़ानी शुरू कर दी थी. बाद जब में माओवादी सरकार गिर गई तब भी चीन ने लगातार उनसे संपर्क बनाए रखा. चीन लगातार इस बात के लिए काम करता रहा कि माओवादी पार्टी के भीतर टूट न हो. कहा जाता है कि साल 2013 में जब माओवादी पार्टी में टूट होने वाली थी तब भी चीन ने ही इसे रोका था. इतना ही चीन चाहता था कि नेपाल की सभी कम्युनिस्ट पार्टियां होकर एक फ्रंट बनाएं लेकिन ये संभव नहीं हो सका.

संविधान निर्माण के दौरान भी चीन ने लगातार नेपाल के बड़े नेताओं से संपर्क बना रखा. कहा जाता है कि चीन की तरफ से ये सुझाव भी दिया गया कि नेपाल को क्षेत्रीय पहचान वाले संघीय ढांचे से दूरी बनानी चाहिए. जैसे ही संविधान का काम पूरा हुआ तो साल 2015 में देश की दो कम्युनिस्ट पार्टियों सीपीएन(माओवादी सेंटर) और सीपीएन यूएमएल ने मिलकर एक फ्रंट तैयार किया. इस गठबंधन के मुखिया बने वर्तमान प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली. केपी शर्मा ने चीन के साथ ट्रांजिट और ट्रांसपोर्ट एग्रीमेंट साइन किया जिससे देश की सप्लाई चेन को लेकर भारत पर निर्भरता कम हुई.

पुष्प कुमार दहल


लेकिन कुछ ही महीने बाद इस गंठबंधन में दरार पड़नी शुरू हो गई. सीपीएन माओवादी सेंटर के प्रमुख पुष्प कुमार दहल ने गठबंधन तोड़ने के प्रयास किए लेकिन तब भी चीन ने इसमें हस्तक्षेप किया. लेकिन कुछ समय बाद ओली सरकार गिरा दी दई और इसे लेकर चीन के सरकारी अखबारों में नकारात्मक प्रतिक्रिया दी गई. चीन के अखबार ग्लोबल टाइम्स में लिखा गया-नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ने इस्तीफा दे दिया है. इससे इस दक्षिण एशियाई देश में अशांति आएगी साथ ही यहां पर किए गए चीन के बड़े इन्वेस्टमेंट में भी. इसके बाद भी अगले कुछ सालों में चीन ने नेपाल में अपना प्रभाव जमाए रखा है. साल 2018 से नेपाल में एक बार फिर केपी शर्मा की ही सरकार है. इस सरकार में चीन का खासा दखल काम करता है.

भारत के साथ सीमा विवाद के पीछे भी माना जा रहा है कि चीन का दबाव ही काम कर रहा है. गौरतलब है कि हाल ही में चीन ने अक्साई चिन में भी सैनिकों की गतिविधियां बढ़ाई थीं. दरअसल वो भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है. इसमें भारत के साथ नेपाल का सीमा विवाद भी उसके काम आ रहा है.

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First published: May 23, 2020, 9:48 AM IST
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