US Election : क्या कोर्ट में जीती जाएगी अमेरिकी चुनाव की जंग?

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में आमने सामने हैं ट्रंप और बाइडेन.
अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में आमने सामने हैं ट्रंप और बाइडेन.

US President Election 2020: विशेषज्ञों के मुताबिक उतावलेपन में दिया गया ट्रंप का भाषण (Trump's Speech) 'फ्रॉड' है और अमेरिकी लोकतंत्र (US Democracy) पर सवाल खड़ा है कि मतगणना की प्रक्रिया (Vote Counting Process) ठीक ढंग से चल सकेगी या दांव पेंचों में उलझकर बेईमान हो जाएगी.

  • News18India
  • Last Updated: November 5, 2020, 9:10 AM IST
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अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव खत्म हुए और डोनाल्ड ट्रंप ने जल्दबाज़ी में भाषण (Trump Speech) दे डाला, जिससे पहेली सी बन गई. उसे सुलझाने के लिए अमेरिकी सिस्टम को समझने की ज़रूरत है, जिसके तहत ट्रंप के दावों की हकीकत समझी जा सकती है. मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) ने व्हाइट हाउस से अपने समर्थकों के लिए दिए भाषण में जल्दबाज़ी दिखाते हुए कह दिया कि 'हम चुनाव जीत चुके हैं. डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बाइडन (Joe Biden) हार रहे हैं.'  ट्रंप का भाषण यहीं खत्म नहीं हुआ. ट्रंप ने यह भी कह दिया कि वो अपने दावे को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) लेकर जाएंगे. एक वाक्य और कहा कि 'हम चाहते हैं कि सारी वोटिंग बंद हो जाए'!

इन तमाम वाक्यों को एक तरतीब में समझने के लिए विशेषज्ञ माथापच्ची कर रहे हैं. चूंकि वोट तो डाले जा चुके हैं और मेल इन बैलट भी संपन्न हो चुका है, ऐसे में माना जा रहा है कि 'वोटिंग बंद' से ट्रंप का मतलब उन वोटों से है, जो मेल इन बैलट में गैरहाज़िर रहे. कयास है कि मिशिगन और पेंसिल्वेनिया में ये वोट काफी अ​हमियत वाले हैं और ट्रंप के प्रतिद्वंद्वदी जो बाइडन को बढ़त दिला सकते हैं. आइए समझें कि पूरा माजरा क्या है.

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ट्रंप ने कैसे कह दिया कि वो जीत चुके?
अमेरिकी चुनाव आयोग के हवाले से खबरों में साफ कहा गया कि वोटिंग संपन्न होने की रात को ही अंतिम नतीजे अमेरिका के चुनावी इतिहास में कभी नहीं आए. नतीजे आने में हफ्तों का समय लगता है और खास बात यह है कि सभी जायज़ वोटों की गिनती होती है. विशेषज्ञों के मुताबिक सभी 21 राज्यों में डाले गए वोट गिने जाते हैं और नियत तिथि के बाद भी जो वोट पोस्टमार्क सिस्टम से मिलते हैं, उन्हें भी काउंट किया जाता है.

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ट्रंप के बयान को बौखलाहट और 'फ्राड' करार दिया जा रहा है.


इस बार पेंसिल्वेनिया, नेवाडा और उत्तरी कैरोलिना में ऐसा होगा और पोस्टमार्क वोटों के लिए राज्य के हिसाब से अलग अलग अंतिम तिथि की जाती है.

क्या पहले कभी ऐसा हुआ?
पूरी लड़ाई असल में निर्णायक वोटों की है. अगर आप साल 2000 का अमेरिकी चुनाव याद करें तो पाएंगे​ कि कैसे जॉर्ज डब्ल्यू बुश और अल गोर के बीच एक तरह से टाई की स्थिति बन गई थी और निर्णायक वोटों की गिनती के लिए फ्लोरिडा के वोटों की काउंटिंग चर्चा के केंद्र में आ गई थी. तब गोर ने फ्लोरिडा में वोटों की पुनर्गणना की मांग की थी और दोनों प्रत्याशियों के बीच बहुत कम अंतर बचा था.

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दोनों प्रत्याशी इस मामले में वकीलों की फौज को हायर करने के बाद कोर्ट की शरण में पहुंचे थे. मतदान के पांच हफ्ते बाद 12 दिसंबर 2000 को सुप्रीम कोर्ट के जजों ने और रीकाउंटिंग की ज़रूरत खारिज करते हुए बुश के राष्ट्रपति बनने का रास्ता बनाया था. तो क्या इस तरह का कोई किस्सा इस बार भी संभव है?

क्या कोर्ट में लड़ी जाएगी लड़ाई?
संभव है. इस बारे में डैश विले की खबर की मानें तो जर्मनी में अमेरिका के राजदूत रहे पीटर विटिंग का कहना है कि अमेरिका में अलग अलग इलाकों में 4000 से ज़्यादा कोर्ट केस फाइल किए जा चुके हैं. इस बार चुनाव में आप अदालत में लड़ाई देख सकते हैं. लेकिन, बुश बनाम गोर की लड़ाई से यह लड़ाई अलग होगी.

विटिंग के मुताबिक, उस वक्त गोर ने खेल भावना दिखाई थी और अमेरिकी लोकतंत्र व देश हित के पक्ष में जाकर कानूनी लड़ाई लंबी न खींचने का फैसला किया था. लेकिन इस बार विटिंग निश्चित नहीं हैं कि साल 2000 की तरह की खेल भावना और समझदारी दिखेगी. इस बार लड़ाई नाटकीय और लंबी भी हो सकती है.


तो अमेरिका का लोकतंत्र है दांव पर?
कहा जा सकता है. दुनिया के सबसे मज़बूत लोकतंत्र कहे जाने वाले अमेरिका के सिस्टम की साख इस बार इम्तिहान से गुज़रेगी. ट्रंप जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में उनके समर्थन का माहौल है क्योंकि कंज़र्वेटिव बहुमत है और पिछले ही दिनों ट्रंप द्वारा नामित जज एमी बैरे ने शपथ ग्रहण की है. लेकिन क्या सुप्रीम कोर्ट अमेरिका की इस सियासी लड़ाई में पक्षपात करेगा?

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ट्रंप ने अपने भाषण में जीत का दावा किया जबकि मतगणना पूरी हुई ही नहीं.


नैतिक रूप से करना नहीं चाहिए, लेकिन ऐसा हुआ तो अमेरिका के लोकतंत्र पर कलंक ज़रूर लगेगा. विटिंग के शब्दों में अगले कुछ समय के लिए भारी अनिश्चितता का माहौल बन चुका है. इस वक्त​ चिंता यही है कि मतगणना की प्रक्रिया कायदे के हिसाब से हो सके.
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