Sputnik V: कैसे काम करती है रूस की वैक्सीन, देसी टीकों से कितनी अलग है?

सब्जेक्ट एक्सपर्ट कमेटी (SEC) ने रूस की कोरोना वैक्सीन स्पूतनिक वी को मंजूरी दे दी

सब्जेक्ट एक्सपर्ट कमेटी (SEC) ने रूस की कोरोना वैक्सीन स्पूतनिक वी को मंजूरी दे दी

रूस की वैक्सीन स्पूतनिक वी कोरोना वायरस (Sputnik V against coronavirus) के उस प्रोटीन की नकल है, जो हमारे शरीर पर हमला करता है. इसकी एफिकेसी लगभग 91% मानी जा रही है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 13, 2021, 6:00 PM IST
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भारत में कोरोना के कारण मचे हाहाकार के बीच वैक्सीन डोज कम पड़ने की समस्या भी सुनने में आ रही है. इस बीच वैक्सीन वैक्सीन मामले की सब्जेक्ट एक्सपर्ट कमेटी (SEC) ने रूस की कोरोना वैक्सीन स्पूतनिक वी को मंजूरी दे दी है. अब केवल अंतिम निर्णय का इंतजार है, जिसके बाद इसका इमरजेंसी इस्तेमाल हो सकेगा. ये पहली वैक्सीन होगी, जो विदेशी रहेगी. तो जानते हैं कि क्या है ये वैक्सीन और कैसे हमारी बाकी दो वैक्सीन्स से अलग है.

काफी पहले रूस ने किया काम शुरू 

ब्रिटिश मेडिकल एसोसिएशन की एक विज्ञान पत्रिका में रूस की वैक्सीन प्रक्रिया के बारे में खुलासा करते हुए छपा था कि जब साल 2020 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कोरोना को एक महामारी घोषित किया, उस दौरान रूस के मॉस्को में वैक्सीन पर काम शुरू हो चुका था. वैक्सीन को मॉस्को के गामेल्या इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी ने बनाया. और इसे रशियन डायरेक्ट इनवेस्टमेंट फंड (RDIF) ने फंडिंग दी. इस तरह से दूसरे देश जब मास्क लगाना है या नहीं, जैसी बातों में उलझे थे, रूस काफी आगे निकल चुका था.

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59 देशों ने दी मंजूरी 

स्पूतनिक वी का नाम रूस के बनाए दुनिया के पहले सैटेलाइट पर दिया गया है. ये एडिनोवायरस पर आधारित टीका है, जो खुद रूस में भी बड़े पैमाने पर दिया जा रहा है. इससे पहले रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी बताया था कि उनकी दो बेटियों में से एक ने टीके के दोनों डोज लिए हैं और स्वस्थ हैं. हमारे यहां जिस तरह इसके इमरजेंसी इस्तेमाल की बात हो रही है, उसी तरह से दुनिया के 59 देशों ने इसका टीका अप्रूव किया है.



Sputnik V coronavirus vaccine
स्पूतनिक वी का नाम रूस के बनाए दुनिया के पहले सैटेलाइट पर दिया गया है (Photo- twitter)


अब समझते हैं कि आखिर ये कैसे काम करती है?

जैसा कि हम बता चुके हैं, ये वैक्सीन सामान्य सर्दी जुखाम पैदा करने वाले adenovirus पर आधारित है. आर्टिफिशियल ढंग से बना ये टीका कोरोना वायरस में पाए जाने वाले उस कांटेदार प्रोटीन की नकल करती है, जो हमारे शरीर पर सबसे पहला हमला करता है. ये वैक्सीन शरीर में पहुंचते ही शरीर का इम्यून सिस्टम सक्रिय हो जाता है और इस तरह से हमारे भीतर एंटीबॉडी पैदा हो जाती है. चूंकि वैक्सीन में डाले गए वायरस असल नहीं होते, इसलिए रिपोर्ट के मुताबिक इससे किसी तरह के संक्रमण का खतरा नहीं होता है.

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क्या फर्क है तीनों टीकों में

अब अगर इसे, हमारे यहां की दोनों वैक्सीन से तुलना करते हुए देखें तो कई अंतर हैं. तीसरे चरण के ट्रायल में स्पूतनिक वी की एफिकेसी 91% देखी गई. वहीं हमारे यहां भारत बायोटेक की कोवैक्सिन और सीरम इंस्टीट्यूट की एफिकेसी- दोनों ही तुलनात्मक तौर पर इससे कुछ कम हैं. डोज देने के अंतराल की बात करें तो तीनों ही वैक्सीन्स कुछ-कुछ हफ्तों के फर्क पर दी जाती हैं. ये समय तीनों के लिए अलग-अलग है, जबकि एक समानता ये है कि तीनों के ही दो डोज लेने होते हैं. यानी कोई भी वैक्सीन सिंगल डोज नहीं.

Sputnik V coronavirus vaccine
तीसरे चरण के ट्रायल में स्पूतनिक वी की एफिकेसी 91% देखी गई (Photo- news18 English via Reuters)


स्पूतनिक वी की क्या कीमत हो सकती है?

फिलहाल सरकारी अस्पतालों में कोवैक्सिन और कोविशील्ड, दोनों ही वैक्सीन्स मुफ्त लग रही हैं, जबकि निजी अस्पतालों में इसका शुल्क है. फिलहाल स्पूतनिक वी आएगा, तो उसकी कीमत क्या होगी, इस बारे में कोई स्पष्टता नहीं. जिन देशों ने स्पूतनिक के इस्तेमाल को मंजूरी दी है, वहां इसके टीके की कीमत लगभग 700 रुपए है. तो अगर इसे रूस से आयात करें तो टीके की कीमत ज्यादा हो सकती है. लेकिन इसके यहीं उत्पादन की बात चल रही है. ऐसे में टीका कम कीमत पर मिल सकेगा. बता दें कि इसकी डॉ रेड्डी लैबोरेटरीज से 10 करोड़ डोज बनाने की डील हुई है.

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मॉडर्ना और फाइजर यहां क्यों नहीं आए?

इस बीच ये बात भी सोचने की है कि मॉडर्ना और फाइजर नामक जिन दो वैक्सीन्स को यूरोप में बड़े पैमाने पर दिया जा रहा है, क्या वे भी भारत आ सकती हैं? नहीं. इन दो वैक्सीन्स के फिलहाल देश आने की कोई संभावना नहीं है. इसकी भी वजह है. दरअसल फाइजर ने कुछ समय पहले यहां अपनी वैक्सीन के लिए आवेदन दिया था लेकिन जब ये साफ किया गया कि इससे पहले उन्हें यहां के लोगों पर भी ट्रायल करना होगा, तो उसने पैर पीछे कर लिए. बता दें कि किसी भी देश की भौगोलिक स्थिति के अनुसार किसी टीके का अलग जगहों पर अलग असर होता है. यही कारण है कि वैक्सीन को ट्रायल करना जरूरी होता है. अब रही मॉडर्ना की बात, तो उसने यहां अब तक आवेदन नहीं दिया है.
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