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#Gandhi@150: कभी गांधी के साथ थे तो फिर अलग क्यों हो गए पेरियार

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Updated: October 4, 2019, 11:19 AM IST
#Gandhi@150: कभी गांधी के साथ थे तो फिर अलग क्यों हो गए पेरियार
महात्मा गांधी और ई.वी. रामास्वामी पेरियार

असहयोग आंदोलन में पेरियार बहुत सक्रिय थे. जिसके लिए उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था. इसके बाद वे कांग्रेस के मद्रास प्रेसिडेंसी के अध्यक्ष भी बने

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  • Last Updated: October 4, 2019, 11:19 AM IST
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कभी गांधी के सहयोगी और उनसे एक हद तक प्रभावित रहे पेरियार ने जब कांग्रेस और गांधी का साथ छोड़ा तो ऐसे कई मौके आए जब वे आमने-सामने खड़े दिखाई दिए. 1979 में जन्मे पेरियार ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 40 साल की उम्र में एक कांग्रेसी के रूप में की थी. ई.वी. रामास्वामी उनका असली नाम था. कांग्रेस से उनके जुड़ाव के पीछे महात्मा गांधी के प्रभाव में चलाए जा रहे शराब विरोधी, खादी और छुआछूत वाले आंदोलन थे.

इसी दौरान उन्होंने अपनी पत्नी नागमणि और बहन बालाम्बल को भी राजनीति से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया था. ये दो महिलाएं ताड़ी की दुकानों के विरोध में सबसे आगे भी रहीं थीं. ताड़ी विरोधी आंदोलन के साथ एकजुटता में उन्होंने स्वेच्छा से खुद अपने नारियल के बाग नष्ट कर दिए थे. असहयोग आंदोलन में पेरियार बहुत सक्रिय थे. जिसके लिए उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था. इसके बाद वे कांग्रेस के मद्रास प्रेसिडेंसी के अध्यक्ष भी बने.

यूं शुरू हुआ था गांधी से अलगाव
1924 में केरल के त्रावणकोर के राजा के मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते पर दलितों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने का विरोध हुआ था. इसका विरोध करने वाले नेताओं को राजा के आदेश से गिरफ्तार कर लिया गया और इस लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए कोई नेतृत्व नहीं था. तब आंदोलन के नेताओं ने इस विरोध का नेतृत्व करने के लिए पेरियार को आमंत्रित किया.

इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने के लिए पेरियार ने मद्रास राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. वे गांधी के आदेश का उल्लंघन करते हुए केरल चले गए.

पेरियार को शुरू में कांग्रेस और गांधी की कई बातें पसंद आईं लेकिन बाद में उन्हें लगा कि वो कांग्रेस के साथ नहीं चल सकते


इससे पहले उन्हें वायाकोम सत्याग्रह में भाग लेने के लिए जेल भी हुई. इस सत्याग्रह का लक्ष्य उन दलितों को सड़क पर चलने का अधिकार दिलाना था जो वायाकोम महादेव मंदिर के पास वाली सड़कों पर चल भी नहीं सकते थे.
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इसलिए दे दिया था कांग्रेस से इस्तीफा
कांग्रेस सम्मेलनों में पेरियार ने कई बार जातीय आरक्षण का प्रस्ताव रखा. लेकिन वे उन्हें पास नहीं करा सके. इसी बीच पता चला कि चेरनमादेवी शहर में कांग्रेस पार्टी के अनुदान से चलाए जा रहे सुब्रह्मण्यम अय्यर के स्कूल में ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण लोगों के बीच भेदभाव किया जा रहा है.

पेरियार ने पहले प्रयास किया कि वे छात्रों से समान व्यवहार के लिए अय्यर को राजी कर सकें. लेकिन इस बारे में उनकी अय्यर से बातचीत का कुछ असर नहीं हुआ. फिर उन्होंने कांग्रेस से इस बारे में बात कर इस स्कूल को मिलने वाले अनुदान को बंद कराने का फैसला किया. लेकिन जब वे ऐसा कराने में भी सफल नहीं हुए तो उन्होंने कांग्रेस छोड़ने का फैसला कर लिया.



कांग्रेस छोड़ते हुए उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि कांग्रेस केवल ब्राह्मणों के फायदे के लिए काम कर रही है. इसके बाद उन्होंने 1925 में 'आत्मसम्मान आंदोलन' चलाया. इसके जरिए उन्होंने समाज के सभी तबकों के लिए बराबरी की मांग की.

गांधी आस्तिक थे जबकि पेरियार नास्तिक
पेरियार खुद एक नास्तिक थे. बाद में पेरियार ने तमिलनाडु में जस्टिस पार्टी ज्वाइन कर ली. 1935 के एक्ट से जब चुनाव हुए और 1937 में मद्रास प्रेसीडेंसी में जब सी. राजगोपालाचारी के नेतृत्व में सरकार बनी तो राजगोपालाचारी ने गांधी के हिंदी को सारे भारत में ले जाने के कार्यक्रम के लिए एक सार्थक कदम उठाया और मद्रास प्रेसिडेंसी के सारे ही सेकेंड्री स्कूलों में हिंदी को पढ़ाया जाना आवश्यक कर दिया. इस पर पेरियार ने विरोध का झंडा खड़ा कर दिया. पेरियार ने अगले तीन सालों तक अपने विरोध को जारी रखा. जिसके बाद आखिरकार सरकार को 1940 में अपना यह फैसला वापस लेना पड़ा.

1944 में इसी जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर द्रविड़ कझगम कर दिया गया. इस पार्टी को आज की द्रविड़ मुनेत्र कझगम यानि DMK और अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम यानि AIDMK को जन्म देने वाला माना जा सकता है. सारे ही तरीकों से चाहे वह विचारधारा का मसला रहा हो या पॉलिटिक्स के तरीके का.

भगत सिंह को फांसी दिए जाने के बाद भी पेरियार ने भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी विचारों की तारीफ की थी और महात्मा गांधी के तरीके का विरोध किया था. 1973 में पेरियार की मौत हो गई.

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First published: October 4, 2019, 11:18 AM IST
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