मार्क्स के कम्युनिस्ट विचार से कितने सहमत थे आइंस्टीन और स्टीफन हॉकिंग?

आइंस्टीन, मार्क्स और हॉकिंग

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संयोग के बेहतरीन उदाहरणों में है 14 मार्च. कार्ल मार्क्स (Karl Marx Death Anniversary) के साथ ही यह तारीख अंतरिक्ष विज्ञान के दिग्गज हॉकिंग (Stephen Hawking Death Anniversary) की पुण्यतिथि है तो वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein Birthday) की जयंती.

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  • Last Updated: March 14, 2021, 1:26 PM IST
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आइंस्टीन लेफ्टी थे, उन्होंने यादगार व ऐतिहासिक शब्द बाएं हाथ से लिखे थे. आइंस्टीन की थ्योरीज़ (Einstein Theory) को साबित करने के लिए विज्ञान अब भी सिर खपा रहा है. हो सकता है यह भी सच हो कि हर चीज़, हर बात आपस में जुड़ी है! न भी हो, यह सच है कि चाहे वैज्ञानिक हों, चाहे विचारक, आपका वास्ता उस विचार से होता है, जो जीवन और मनुष्य को केंद्र में रखता है. दो महान वैज्ञानिक (Great Scientists) किस तरह एक महान राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक विचार से जुड़े?

हम जो चाहते हैं, अगर वो सब कुछ मशीनें पैदा करेंगी, तो सवाल खड़ा होगा कि जो हासिल होगा, उसे बांटा कैसे जाए. मशीनें जो पैदा करती हैं, उसे साझा किया जाए तो सभी एक खुशहाल जीवन जी सकते हैं, या अगर मशीनों के मालिक संपत्ति के बंटवारे के खिलाफ हो गए तो ज़्यादातर लोग दयनीय रूप से गरीब हो जाएंगे. और लग भी ऐसा रहा है कि तकनीक से असमानता ऐतिहासिक रूप से बढ़ रही है.

यह बात 2015 में जब सम्मानित, प्रतिष्ठित वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने कही तो काफी चर्चा हुई थी. 19वीं सदी के दार्शनिक कार्ल मार्क्स के ​विचार को लेकर यहां तक कहा गया कि उनके विचार आज के समय में और भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं. जिस आर्थिक असमानता की बात हॉकिंग ने कही थी, उसे मार्क्स के शब्दों में आप शायद सालों से पढ़ चुके हैं.

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विज्ञान ने हमेशा अर्थव्यवस्था और समाज के गठजोड़ को लेकर विमर्श किया है. इसी सिलसिले में 20वीं सदी के लीजेंड वैज्ञानिक अल्बर्ट आंइस्टीन का नाम भी यादगार रहा. कई तरह की प्रतिभाओं के लिए मशहूर रहे आइंस्टीन ने न केवल वैज्ञानिकों के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रोल की वकालत की थी, बल्कि 1949 में एक लेख तक लिखा था “Why Socialism?” यानी “समाजवाद क्यों?”

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इस लेख की शुरूआत में ही आइंस्टीन ने यह सवाल उठा दिया था कि “जो व्यक्ति आर्थिक और सामाजिक मामलों पर एक्सपर्ट न हो, क्या उसे समाजवाद जैसे विषय पर अपनी राय रखना चाहिए?” और जवाब भी उन्होंने खुद दिया था “मुझे लगता है कि यह जायज़ है और इसके लिए मेरे पास कई कारण हैं.”



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इन कारणों को जानने के लिए आपको यह लेख पढ़ना चाहिए. वैसे इसे आप कारण भी कह सकते हैं कि यही बात खुद मार्क्स ने अपने अंदाज़ में अपने शब्दों में कही थी :

कम्युनिस्ट समाज में किसी का कोई अलग घेरा नहीं होता, बल्कि सब अपनी इच्छा के मुताबिक किसी भी तरह के लोगों के साथ मिल जुल सकते हैं.. ऐसे समाज में यह आज़ादी होती है कि मैं कुछ भी कभी भी कर सकूं.. यानी सुबह मैं शिकार कर सकता हूं, दोपहर में मछली पकड़ सकता हूं, शाम को मुर्गी पाल सकता हूं और डिनर करते हुए आलोचना कर सकता हूं.. वो भी इसलिए कि मेरे पास दिमाग है और ज़रूरी नहीं कि मुझे ये सब करने के लिए शिकारी, मच्छीमार, पशुपालक या आलोचक होना पड़े.

तो आइंस्टीन के इस लेख का सार क्या था? समाजवाद की संभावना और उससे जुड़े पहलुओं पर सवाल खड़े करते हुए आइंस्टीन ने अपना रुख साफ किया था कि पूंजीवाद के जो भी भयानक नतीजे हैं, उनका हल 'समाजवादी अर्थव्यवस्था से ही संभव है जिसमें सामाजिक लक्ष्यों को तय ​करने वाले शिक्षा सिस्टम का समावेश हो.'

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बहुत काम की बात है कि आइंस्टीन ने पूंजीवादी व्यवस्था का 'भयानक दुष्परिणाम' क्या माना! उनकी नज़र में 'बेतहाशा प्रतिस्पर्धा वाला नज़रिया' पैदा करने वाले एजुकेशन सिस्टम के ज़रिये पूंजीवाद 'व्यक्ति को अशक्त' कर देता है और छात्रों को 'मुनाफे की सफलता' की पूजा करने के लिए ट्रेंड करता है. कई अहम मुद्दों को उठाता आइंस्टीन का यह लेख हर छात्र ही नहीं, हर व्यक्ति को पढ़ना चाहिए.

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कार्ल मार्क्स लिखित ऐतिहासिक किताब कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो

आइंस्टीन लेफ्टिस्ट थे या नहीं, लेकिन ये बातें आपको याद रखनी चाहिए कि पॉल रॉबसन, मैरियन एंडरसन जैसे नामचीन एक्टिविस्ट उनके दोस्त थे. अमेरिका में नागरिक अधिकारों की लड़ाई आइंस्टीन ने लड़ी थी. महात्मा गांधी की भरपूर तारीफ कई बार की थी. मार्क्स के कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो की तर्ज़ पर अपने आखिरी समय में 1955 में आइंस्टीन ने विद्वान बरट्रेंड रसेल के साथ एक peace manifesto तैयार किया था, जिस पर 6 और वैज्ञानिकों ने भी दस्तखत किए थे.

दिलचस्प किस्सा है कि मरते वक्त आइंस्टीन ने अपनी नर्स से कुछ कहा था, लेकिन नर्स को जर्मन भाषा नहीं आती थी इसलिए कभी पता नहीं चल सका कि आइंस्टीन के आखिरी शब्द क्या थे. विचार करने की बात यह है कि मार्क्स और आइंस्टीन के बाद हॉकिंग तक गूंजते रहे दो सदियों के शब्द क्या उस भाषा में रहे, जो हमें नहीं आती!

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