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अगले 6-7 दशकों में कितनी रहने लायक बचेगी हमारी पृथ्वी- क्या कहता है नया शोध

पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत के अनेक मत हैं और उनके भी अपने वैज्ञानिक आधार हैं पर पूरी तरह से प्रमाणित नहीं हैं.

पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत के अनेक मत हैं और उनके भी अपने वैज्ञानिक आधार हैं पर पूरी तरह से प्रमाणित नहीं हैं.

शोधकर्ताओं ने भविष्य में होने वाली संभावित परिस्थितियों में पृथ्वी (Earth) के पर्यावरण (Environment) का अनुमान लगाया है कि तब जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का क्या प्रभाव पड़ेगा.

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नई दिल्ली: आज से  50 साल पहले दुनिया में पहला अर्थ डे (Earth day) मनाया गया था. 1970 से पर्यावरण (Environment) के प्रति जागरुकता के लिए हर साल 22 अप्रैल को यह दिवस मनाया जाता है. लेकिन इस साल अर्थडे की50 वीं सालगिरह पर दुनिया कोरोना वायरस (Corona virus) के प्रकोप से ग्रस्त है, लेकिन इसी बीच वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि मानवीय गतिविधियों के कारण आने वाले सालों में, खास कर साल 2100 में पर्यावरण का क्या हाल हो सकता है.

काफी समय से चिंता का विषय है हमारा पर्यावरण
पिछले कुछ सालों से पर्वायरण को लेकर वैज्ञानिकों सहित दुनिया भर के लोगों में चिंता बहुत बढ़ गई है. जिस तरह से जलवायु परिवर्तन को रोकने के तमाम प्रयास नाकाम साबित हो रहे हैं, उससे वैज्ञानिक अनुमान लगाने में लगे हैं कि आने वाले सालों में पृथ्वी की हालत कितनी खराब हो सकती है.

क्या अब भी हालात बिगड़ते ही रहेंगे
इस साल कोरोना वायरस के कारण जलवायु परिवर्तन के आंकड़ों में भारी कमी आई है, लेकिन वैज्ञानिक इसे लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं. उनका मानना है कि कोरोना संकट के हल होने के बाद स्थिति पूर्ववत या उससे भी ज्यादा खराब हो सकती है. इसीलिए अर्थ डे के मौके पर उन्होंने एक अध्ययन किया है कि  आने वाले 80 सालों में हमारे पर्यावरण का क्या हाल हो सकता है.

Earth, Life on Earth
पृथ्वी पर कोरोना वायरस के कारण कार्बन उत्सर्जन मे कमी आई है.


क्या शोध किया है वैज्ञानिकों ने
अपने अध्ययन में शोधकर्ताओं ने भविष्य के कई हालातों का मुआयना किया, जिसका मानव जाति सामना कर सकती है. नेचर में प्रकाशित इस शोध में वैज्ञानिकों ने  इस बात का अध्ययन किया कि किस तरह से कार्बन उत्सर्जन को लेकर अलग-अलग नीतियां बन सकती हैं, और उसका हमारे ग्रह पर क्या असर होगा.

ये दो विपरीत स्थितियों के बीच को हालातों के मुताबिक लगाए अनुमान
इस शोध में एक तरह सबसे आशा जनक स्थिति है, जब दुनिया की सभी सरकारें गरीबी और असमानता हटाने के साथ साथ एकजुट होकर विकसित निम्म कार्बन तकनीकों का इस्तेमाल करने लगेंगीं. वहीं दूसरी ओर इसके पूरी तरह विपरीत स्थिति में दुनिया का हर देश अपने तरक्की के लिए हर कीमत पर जीवाश्म ईंधन (Fossil fuel) का उपयोग करेगी. शोधकर्ताओं ने इन हालातों को साझा आर्थिक सामाजिक पथ (Shared Socioeconomic Pathways, SSP) नाम दिए.

किसका लगाया गया अनुमान
शोधकर्ताओं ने कार्बन उत्सर्जन, तापमान वृद्धि, वायुमंडल में कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा, ग्लोबल वार्मिक पावर जैसे आंकड़ों का पिछले 70 सालों के रिकॉर्ड के आधार पर अलग अलग SSP के मुताबिक अनुमान लगाया. इसके अलावा साल 2010 में बनाए गए हालातों को भी इसमें शामिल किया गया है जिसमें चार तरह के कार्बन प्रदूषण स्तरों, जिन्हें रिप्रडेंटेटिव कंसंट्रेशन पाथवे यानि (RCP) कहा गया, को शामिल किया गया. इनके आधार के आंकड़े भी शोध में दिखाए गए हैं.

Earth
इस साल अर्थ डे की 50वीं वर्षगांठ है.


क्या हो सकता है 2100 में बुरे से बुरा हाल
शोध में अनुमान लगाया गया है कि यदि हालात अब तक जैसे बढ़े हैं, वैसे ही बढ़ते रहे तो अभी जो कार्बन उत्सर्जन 20 बिलियन टन प्रतिवर्ष है, साल 2100 तक 60 बिनियन टन प्रतिवर्ष तक भी जा सकता है. लेकिन इस अध्ययन में तमाम हलातों में यह बहुत विविध पाया गया है. बुरे से बुरे हाल में यह उत्सर्जन दो गुना और बेहतर हालात में यह नकारात्मक स्तर पर भी जा सकता है.

और तापमान वृद्धि
इस शोध के मुताबिक यदि अभी तापमान वृद्धि  प्रतिवर्ष एक डिग्री मानी जाए तो वर्तमान हालातों के ही रहते वह तीन डिग्री हो सकती है, किन बहुत बुरे हालातों में वह पांच डिग्री प्रतिवर्ष हो जाने की संभावना है. वहीं हालात काबू में रहने पर यह डेढ़ डिग्री प्रति वर्ष तक भी रह सकती है.

बहुत सी स्थितियों को शामिल नहीं किया जा सका
यह भी कहा गया कि इनमें बदले हुए हालातों को शामिल नहीं किया गया है जैसे कोरोना वायरस के करण लॉकडाउन, ब्रेक्जिट,  अमेरिका का पेरिस समझौते से हटना, आदि. लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तरह के  नए SSP जोड़े जा सकते हैं, लेकिन उनके SSP में ऐसे कई कारक शामिल हैं जो  इन घटनाओं के कारण हुए नीति परिवर्तन को प्रभावित कर रहे हैं.

क्या आपत्ति है इस शोध पर
गौरतलहब है कि इनमें से कुछ हालात यानि SSP और RCP को लेकर वैज्ञानिकों में मतभेद रहा है कि वे सटीक अनुमान लगाने के लिए सही नहीं हैं. लेकिन शोधकर्ता डोनल्ड वुबल्स का इस पर कहना है कि वे केवल जोखिम को समझने की कोशश कर रहे हैं, भविष्यवाणी नहीं कर रहे हैं.

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