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एक देश-एक चुनाव : शुरूआत यहीं से हुई, फिर कैसे पटरी से उतरी गाड़ी?

न्यूज़18 क्रिएटिव
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पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) से पहले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) और पूर्व गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी (Lalkrishna Advani) एक साथ चुनाव करवाने के आइडिया की वकालत कर चुके हैं. जानें यह सिलसिला एक बार टूटने के बाद कैसे बहाल नहीं हो सका.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 29, 2020, 3:10 PM IST
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आज़ादी के बाद भारत में पहली बार चुनाव (First Election in India) उस घटना के बाद हुए थे, जब देश ने गणतंत्र को अपनाया था. इसके बाद 16 साल तक यह सिलसिला रहा कि लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election) हों या विधानसभा (Assembly Election), सभी एक साथ होते रहे. लेकिन उसके बाद यह क्रम बिगड़ा और देश के सामने राजनीतिक संकटों (Political Crisis) और संवैधानिक समाधानों के नए समीकरण आए. हाल में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने एक बार फिर 'एक देश एक चुनाव' की बात कही, तो इस पर नए सिरे से चर्चा छिड़ रही है.

पीएम मोदी के बयान के बाद न्यूज़18 ने आपको विस्तार से बताया कि 'एक देश एक चुनाव' का कॉंसेप्ट क्या है और इस मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष के क्या तर्क रहे हैं. अब आपको बताते हैं कि लोकसभा और विधानसभा यानी आम चुनाव और राज्यों के चुनाव एक साथ करवाए जाने का इतिहास क्या रहा है. यह भी जानिए कि एक बार क्रम टूटने के बाद कैसे बार-बार इस आइडिया को अमल में लाने की कवायद होती रही.

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शुरूआत कैस हुई थी?
26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद देश में पहली बार चुनाव 1951-52 में हुए. चूंकि यह पहली बार था, तो स्वाभाविक तौर पर पूरे देश में चुनाव एक साथ ही हुए थे. इसके बाद के तीन और चुनाव यानी 1957, 1962 और 1967 में भी देश भर में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ ही होते रहे. इस वक्त तक देश में लोकतंत्र विकसित हो चुका था और बहु पार्टी ट्रेंड मज़बूत हो चुका था, साथ ही लोगों के बीच भी चुनाव और वोट देने संबंधी समझ बढ़ चुकी थी.

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इसके बाद भंग हुआ क्रम?
1967 के चुनाव के बाद कुछ राज्यों में कार्यकाल पूरा होने से पहले ही 1968 और 1969 में सरकारें गिरने की नौबत आई या​ फिर विधानसभा भंग होने की. पहली बार चुनाव एक साथ करवाए जाने का क्रम टूटा. इसके बाद 1970 में पहली बार ऐसा हुआ कि लोकसभा भी कार्यकाल से पहले ही भंग हो गई, तो 1971 में तय कार्यक्रम से पहले ही चुनाव करवाने पड़े.

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इसके बाद लोकसभा के कार्यकाल को लेकर एक अनिश्चितता का ट्रेंड दिखता रहा. इतिहास बताता है कि पांचवी लोकसभा का कार्यकाल संविधान के आर्टिकल 352 के तहत 1977 तक बढ़ाया गया था. फिर आठवीं, दसवीं, चौदहवीं, पंद्रहवीं और सोलहवीं लोकसभा ने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया, लेकिन छठवीं, सातवीं, नौवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं और तेरहवीं लोकसभा का कार्यकाल पूरा नहीं हो पाया.


इसी तरह, कई राज्यों में विधानसभाएं भी अपने पांच साल के कार्यकाल से पहले ही भंग होती रहीं. इस तरह, एक देश एक चुनाव का सिलसिला जब 1967 में एक बार पटरी से उतरा, तो फिर पटरी पर लौट नहीं सका क्योंकि देश के कई राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनता बिगड़ता रहा. आइए, अब जानते हैं कि पीएम मोदी से पहले भी किस तरह एक साथ चुनाव कराए जाने की कोशिशें होती रहीं.

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नाकाम कोशिशों का भी इतिहास है!
चुनाव आयोग ने 1983 में जो अपनी सालाना रिपोर्ट पेश की थी, उसमें एक साथ केंद्र और राज्यों के चुनाव करवाए जाने का आइडिया सुझाया गया था. 1999 में विधि आयोग की रिपोर्ट ने भी यही बात कही थी. और पिछले एक दशक में, इस विचार पर काफी बहस होती रही. साल 2014 में अपने चुनावी घोषणा पत्र में भी भारतीय जनता पार्टी ने यह व्यवस्था लागू करने की बात कही थी.

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प्रतीकात्मक इमेज


इससे पहले, 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ मिलकर इस मुद्दे पर विचार किया था, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. इसी तरह, साल 2010 में, लालकृष्ण आडवाणी ने इंटरनेट पर एक पोस्ट में लिखा था कि उन्होंने तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के साथ बातचीत की थी कि लोकसभा व​ विधानसभा चुनाव साथ हों और कार्यकाल फिक्स हो.

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इसके बाद, पीएम मोदी ने 2016 में जब इस व्यवस्था पर ज़ोर दिया तो नीति आयोग ने इस बारे में एक पूरी रिपोर्ट तैयार की थी. 2018 में विधि आयोग ने इस आइडिया को अमल में लाने के लिए कहा कि कम से कम 'पांच संविधान संशोधन' किए जाने के बाद यह संभव हो सकता है. हालांकि अब तक इस बारे में कानूनी और संवैधानिक स्तर पर बात आगे नहीं बढ़ी है, बयान और बहस जारी है.
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