ईरानी कानून में कैसे पतियों, पिताओं और भाइयों को मिलती है हत्या की छूट?

ईरानी कानून में कैसे पतियों, पिताओं और भाइयों को मिलती है हत्या की छूट?
14 वर्षीय रोमिना की हत्या ईरान में बड़ी सुर्खी बनी.

अपने परिवार की महिलाओं को मौत के घाट उतार देना (Women Killing) शर्म की नहीं, शान की बात है. Iran का लचर कानून इन दिनों बहस का मुद्दा है, जो परिवार की औरतों के कातिलों को सज़ा देने में कतराता दिखता है. जानिए कि कैसे घिर गई है Iran Government और क्यों Iran Laws में सुधार की मांग उठ रही है.

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पिछले एक महीने में ईरान में तीन युवतियों की दिल दहला देने वाली हत्याओं (Murders in Iran) के बाद सभ्य समाज की नींद खुलना शुरू हुई. रज़ा अशरफी ने बाकायदा वकील की सलाह लेकर तसल्ली की कि उसे कानूनन खास सज़ा नहीं मिलेगी और फिर अपनी 14 साल की बेटी का बेरहमी से कत्ल (Father Killed Daughter) कर दिया. इस तरह की खबरें आने के बाद ईरान में Honour Killing, कमज़ोर कानूनों और पितृसत्तात्मक समाज को लेकर बहस छिड़ी है. हाल ही तीन हत्याओं के संदर्भ में यहां उन Iranian Laws के बारे में चर्चा है, जो पुरुषों को कत्ल करने का लाइसेंस दे रहे हैं.

इस महीने 16 जून को 25 वर्षीय रेहाना अमेरी को घर देर से लौटने की वजह से उसके पिता ने मारकर लाश रेगिस्तान में फेंक दी. इससे पिछले हफ्ते 19 वर्षीय फातिमा की हत्या उसके पति ने इसलिए की क्योंकि वह जबरिया शादी से भागी थी. इससे पहले 14 वर्षीय रोमिना अशरफी के प्रेमी के साथ कथित तौर पर भागने के कारण उसके बाप ने मौत के घाट उतारा. इन खबरों ने ईरान के लचर कानूनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. क्यों और कैसे?

ईरान में लोकलाज के चलते इस तरह की हत्याओं के ज़्यादातर मामले रिपोर्ट ही नहीं किए जाते. ऑनर किलिंग के अधिकांश केसों में साज़िश रचने या हत्या करने वालों को परिवार में हीरो समझा जाता है.
शरबानो बहराक केशवार्ज़




कत्ल प्लान किया जाता है और...


जैसा कि रोमिना के केस में सामने आया, ईरान में ऑनर किलिंग के कई मामलों में हत्या सोच समझकर की जाती है. 'ईरान में ऑनर किलिंग के कानूनी नज़रिये' पर लेख में वकील और कानूनविद शरबानो ने कहा ​है कि प्लान करके किए जाने वाले इन कत्लों में परिवारों की महिलाओं यानी मांओं और बहनों की भी मौन स्वीकृति शामिल हुआ करती है.

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महिलाओं के खिलाफ अपराधों को लेकर ईरान में लंबे समय से प्रदर्शन हो रहे हैं.


यह डराने वाला सच है कि महिलाएं भी महिलाओं के कत्ल के लिए सहमति देती हैं. शरबानो एक और डरावना फैक्ट ये बताती हैं कि अगर अरेंज मैरिजों से मना किया करें, शादी से पहले सेक्स या प्रेम प्रसंग या कोई भी ऐसी हरकत करें या उनका बलात्कार ही क्यों न हो, तो महिलाओं को परिवार की इज़्ज़त मिट्टी में मिलाने का कसूरवार माना जाता है.

चौंकाते हैं ईरान में ऑनर किलिंग के आंकड़े
ईरान बार काउंसिल के एक लेख के हवाले से बताया गया है कि ईरान में जितनी हत्याएं होती हैं, उनमें से ऑनर किलिंग 20 फीसदी हैं. यह हत्याओं के मामले में सबसे बड़ा प्रतिशत है. ईरान में ऑनर किलिंग के सबसे ज़्यादा मामले कुर्दिश, अरब, लोरी, बलूची और तुर्की भाषी आदिवासी अल्पसंख्यक समुदायों में आते हैं. दूसरी ओर, कुर्दिस्तान और इलम में ऐसे केसों की संख्या ज़्यादा बताई जाती है.

क्या कर रही है ईरानी सरकार?
इन खबरों और आंकड़ों के बरक्स ईरान की सरकार क्यों चुप है? इस सवाल के जवाब में ईरान इस हिंसा की आलोचना कर रहा है तो वहां के सर्वोच्च नेता खेमनेई के ट्टिवर से कहा गया कि ऐसे लोगों के खिलाफ सख़्त होना चाहिए जो 'महिलाओं का अपमान अपना हक मानते हैं.'

ईरान के इस्लामी कानूनों में सुधार की मांग करने वाले एक्टिविस्टों का कहना है कि घरेलू हिंसा को अपराध मानने के कानून सुधार की तैयारी 8 साल से असहमति की भेंट चढ़ी हुई है. यह भी हैरान करने वाला तथ्य है कि ऑनर किलिंग केस में दोषी साबित होने पर हत्यारे को 3 से लेकर अधिकतम 10 साल तक की जेल हो सकती है.


ईरान में ऑनर किलिंग की वजहें क्या हैं?
पूर्वाग्र​ह ग्रसित समाज, धार्मिक कट्टरता, महिलाएं पुरुषों की गुलाम हैं - ये सोच, सही और बेसिक शिक्षा की कमी और कई इलाकों में पिछड़ापन इस तरह के समाज की वजह है, जहां औरतों की जान लेना पुरुष अपना हक समझते हैं. इसके साथ ही, लचर कानून जो ऑनर किलिंग के मामले में पुरुषों को रियायत देते हैं, वो भी इन हत्याओं के बढ़ने के पीछे ज़िम्मेदार हैं. उन कानूनों के बारे में भी जानें.

महिलाओं को सुरक्षा नहीं देते कानून?
ऑनर किलिंग की बात पर इस सवाल का जवाब दुखद है, पर हां है. ईरान का कानूनी सिस्टम महिलाओं पर पुरुष के आधिपत्य की पारंपरिक सोच को ही तरजीह देता है. शरबानो ने ईरान के कुछ कानूनों का ज़िक्र करते हुए बताया है कि कैसे महिलाओं की हत्या के लिए पुरुषों को शह मिलती है.

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ऑनर किलिंग के ताज़ा मामलों को लेकर ईरान के राष्ट्रपति Hassan Rouhani ने हाल में कानूनों में सुधार की बात कही थी.


1. आर्टिकल 1043 : ईरान सिविल कोड का य​ह हिस्सा कहता है 'किसी भी वर्जिन युवती को शादी के लिए अपने पिता या दादा की सहमति लेना होगी.' ऐसा न करने पर पिता को गलती की सज़ा देने का अधिकार मिलता है.
2. आर्टिकल 1041 : यहां कहा गया है 'मैच्योरिटी की उम्र से पहले भी अगर कानूनी अभिभावक चाहे तो लड़की की शादी कर सकता है, अगर यह फैसला समुदाय के हित में हो.'
3. आर्टिकल 1210(1) : 'पुरुष के लिए मैच्योरिटी उम्र 15 साल है और लड़की के लिए 9 साल.' साल 2002 में इसमें संशोधन करते हुए लड़की की उम्र को 13 साल किया गया.

कानूनों में विरोधाभास है?
इन दकियानूसी कानूनों के बाद ईरान के उन कानूनों को भी जानना चाहिए जो दूसरी तरफ आदर्श की बातें करते हैं. ईरान के संविधान के आर्टिकल 20 में उल्लेख है कि 'देश के सभी नागरिक, महिलाएं और पुरुष, सभी के लिए कानूनन एक सी सुरक्षा है और इस्लामी दायरे के हिसाब से सभी समान मानवीय, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार रखते हैं.'

आर्टिकल 21 में तो महिलाओं के सभी अधिका​रों को सुनिश्चित करने की बात भी है, लेकिन इस्लामी दायरे में. इसके अलावा, मानवाधिकारों पर यूनिवर्सल घोषणापत्र में ईरान ने भी दस्तखत किए हैं. अपने संविधान और गणतंत्र में महिलाओं के अधिकारों की बात करने के बावजूद महिलाओं के साथ पक्षपात और अन्यास के नज़रिये के कारण ईरान की आलोचना पूरी दुनिया करती रही है.

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करना ही होगी शरिया कानून पर बहस?
ईरान में ऑनर किलिंग के ताज़ा मामलों के बाद वो 11 साल से लटका वो कानून पास किया गया जो बच्चों के अधिकारों से जुड़ा था. इस कानून में भी वो शर्त नहीं बदली गई कि बच्चों को जान से मारने वाले पिताओं को आम हत्यारों की तरह सज़ा नहीं मिलेगी. एक मीडिया रिपोर्ट की मानें तो इसके पीछे वज​ह इस्लामिक शरिया कानून से निकली व्याख्या है, जिस पर सरकार बहस के लिए अब तक तैयार नहीं है.

ऐसे कत्ल उस पितृसत्तात्मक समाज के नतीजे हैं, जो महिलाओं को लेकर गैर बराबरी और गैरवाजिब बर्ताव का हिमायती रहा है.
एलाही मोहम्मदी, महिलाओं के मामले पर विशेषज्ञ


ईरान इन मुद्दों पर बहस कर रहा है. बहस कहां तक पहुंचेगी और कब तक? ये तो वक्त बताएगा लेकिन अभी चिंता यह है कि इन मसलों का हल क्या है. 'अगर इन हत्यारों को मौत की सज़ा भी दी जाए तब भी शायद ऑनर किलिंग बंद न हो... क्योंकि इसकी गहरी जड़ें पारंपरिक मान्यताओं में हैं, जहां फांसी का डर बेअसर होता है.' एक ट्वीट में जताई गई यह आशंका खेदजनक है लेकिन आशावादी मानते हैं कि सुधार आंदोलनों का लगातार चलते रहना ही हल लाएगा.
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