Coronavirus: ये टेस्ट बताएगा भारत में कोरोना के मरीजों की असल संख्या

Coronavirus: ये टेस्ट बताएगा भारत में कोरोना के मरीजों की असल संख्या
खून में एंटीबॉडी की उपस्थिति से ये पता चल सकेगा कि वास्तव में कितने लोग वायरस के संपर्क में आए हैं

सीरोलॉजिकल जांच (serological test) से पता लगा सकते हैं कि रिवकरी के बाद भी क्या किसी व्यक्ति में कोरोना वायरस (coronavirus) इंफेक्शन बाकी है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 28, 2020, 10:18 AM IST
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दुनियाभर में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों (corona infected patients) की संख्या लगभग 6 लाख हो चुकी है. इसी बीच भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् (ICMR) ने कोरोना की सीरोलॉजिकल जांच के लिए 15 लाख एंटीबॉडी किट्स का कोटेशन मांगा है. इन जांच किट्स का उपयोग रिसर्च, मॉनिटरिंग और जांच के लिए किया जा सकता है. ये उन लोगों पर भी इस्तेमाल हो सकता है जो कोरोना वायरस के पॉजिटिव पाए जा चुके हैं. साथ ही इससे उनकी भी जांच हो सकती है जो asymptomatic हैं यानी जिसमें बीमारी का कोई भी लक्षण नहीं या है भी तो लगभग नहीं के बराबर.

खून में एंटीबॉडी की उपस्थिति से ये पता चल सकेगा कि वास्तव में कितने लोग वायरस के संपर्क में आए हैं. इसकी मदद से आने वाले महीनों में कई बातें समझी जा सकेंगी. जैसे शटडाउन कितना लंबा होना चाहिए या फिर नई दवा कितनी प्रभावी है, इसका पता लगाना.

क्या है सीरोलॉजिकल टेस्ट
ये असल में खून की जांच है. John Hopkins Bloomberg School of Public Health के अनुसार इस टेस्ट का उपयोग ये जानने के लिए होता है कि क्या कोई शख्स किसी खास पैथोजन यानी बीमारी फैलने वाले किसी वायरस के संपर्क में आया है. जांच के तहत खून का सीरम लिया जाता है. इसमें लाल और सफेद रक्त कणिकाएं शामिल नहीं होती हैं. खून के इस सीरम की जांच की जाती है और देखते हैं कि क्या इसमें कोई ऐसी एंटीबॉडी है जो किसी खास पैथोजन के होने पर बनती है.



हम एक बार किसी खास बीमारी का शिकार बन जाएं तो दूसरी बार उस बीमारी का असर बहुत कम होता है




बता दें कि शरीर में किसी पैथोजन यानी वायरस के हमले पर हमारा शरीर उससे लड़ता है, इस दौरान एंटीबॉडी बनती है जो दोबारा उस पैथोजन के अटैक पर उसे पहचानकर कमजोर बना देती है और हम स्वस्थ रहते हैं. पैथोजन को एंटीजन भी कहा जाता है. ये एंटीजन असल में फॉरेन पार्टिकल होते हैं. जो एक बार के हमले के बाद शरीर द्वारा पहचान लिए जाते हैं. यही वजह है कि ज्यादातर मामलों में अगर हम एक बार किसी खास बीमारी का शिकार बन जाएं तो दूसरी बार उस बीमारी का असर बहुत कम होता है.

वायरल संक्रमण के दौरान सीरोलॉजिकल टेस्ट यही जानने के होता है कि क्या मरीज का इम्यून सिस्टम किसी खास पैथोजन पर प्रतिक्रिया करता है जैसे इन्फ्यूएंजा. John Hopkins ने रिसर्च के दौरान एक फैक्ट शीट तैयार की. इसके अनुसार किसी संक्रमण की जांच के लिए संक्रमण का ही उपयोग हो सकता है.

यहां एक सवाल ये आता है कि टेस्ट किटों मांग या खरीद पहले क्यों नहीं हो सकी?
पूरी दुनिया में रियल-टाइम polymerase chain reaction (PCR) पर आधारित जांच ही कोरोना पॉजिटिव होने को कंफर्म करने का पहला तरीका है. कोरोनोवायरस संक्रमण की पुष्टि के लिए सीरोलॉजिकल परीक्षणों का उपयोग नहीं किया जाता है. दुनियाभर में जांच किटों की कमी थी और अब इन किटों को बनाए जाने की होड़ लगी है. लेकिन भारत के मामले में अब भी ये पक्का नहीं है कि यहां पर कितनी दवा मैन्युफैक्चर करने वाली कंपनियां ये किट बना सकती हैं. इन्हीं हालातों के कारण किटों की मांग की गई है.

एंटीबॉडीज की जांच के जरिए बीमारी पता लगाने का ये तरीका कई मायने में अलग है


फिलहाल Covid-19 की जांच के लिए जिस तरीके का इस्तेमाल हो रहा है, उससे एंटीबॉडीज की जांच के जरिए बीमारी पता लगाने का ये तरीका कई मायने में अलग है. फिलहाल भारत में जितने भी जांच लैब हैं, वे रियल-टाइम PCR के जरिए बीमारी का पता लगा रहे हैं. इस जांच में संदिग्ध की नाक और गले से सैंपल लेकर उसकी जेनेटिक जांच होती है. वहीं सीरोलॉजिकल जांच में खून की जांच होती है.

रियल-टाइम PCR की एक खामी ये है कि उससे यह पता नहीं चल पाता कि रिकवरी के बाद भी किसी में वायरस होंगे या फिर किसी के शरीर में वायरस होने के बाद भी उसमें कोई लक्षण नहीं दिख रहा. दूसरी तरफ, सीरोलॉजिकल टेस्ट की मदद से यह पता लगाया जा सकता है. शरीर में उपस्थित एंटीबॉडी ये बताने में मदद करती है. वैसे दोनों ही तरह की जांचों में एक दोष ये है कि ये अगर जांच जल्दी हो तो टेस्ट रिजल्ट गलत भी आ सकता है.

क्या है रियल-टाइम PCR
इसे Real-time polymerase chain reaction कहते हैं. साथ ही जांच के इस तरीके को क्वांटिटेटिव चेन रिएक्शन भी कहा जाता है. ये एक लैब तकनीक है, जिसमें रियल टाइम में DNA की जांच होती है कि ये किसी खास एंटीजन के लिए कितना संवेदनशील है. फिलहाल कोविड-19 की जांच में इसे ही सबसे विश्वसनीय तकनीक माना जा रहा है.

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First published: March 28, 2020, 10:06 AM IST
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