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जेसी बोस समेत भौतिक शास्त्रियों ने उपनिषदों को कैसे बनाया प्रयोगशाला?

जगदीश चंद्र बोस (बसु). (न्यूज़18 फोटो)
जगदीश चंद्र बोस (बसु). (न्यूज़18 फोटो)

जगदीश चंद्र बोस जयंती : रबींद्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore), ​स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekanand) और भगिनी निवेदिता (Sister Nivedita) जैसी महान हस्तियां न केवल बोस से प्रभावित थीं बल्कि भारतीय दर्शन को विज्ञान का आधार बनाने के लिए कहीं न कहीं सहयोगी भी.

  • News18India
  • Last Updated: November 30, 2020, 12:57 PM IST
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‘ज्ञान किसी खास नस्ल की बपौती नहीं है... पूरी दुनिया एक-दूसरे पर आश्रित है और विचार की चिंरतन धारा मानवता को पोस रही है.’ अपने इस कथन के अनुसार ही वैज्ञानिक और चिंतक जगदीश चंद्र बोस (J.C. Bose) ने भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Philosophy) के अनूठे ग्रंथों वेदांतों और उपनिषदों का वैज्ञानिक पक्ष (Spirituality and Science) प्रस्तुत किया था. दुनिया में कुछ प्रतिभाएं ऐसी हुई हैं, जिन्होंने अपने समय से आगे की दृष्टि रखी और दुनिया को हैरान किया. मसलन, 1977 में सर नेविल मॉट (Sir Nevill Mott) ने कहा था कि 60 साल पहले ही बोस ने वो अनुमान लगाया था, जिस आविष्कार के लिए उन्हें नोबेल (Nobel Prize) मिल रहा था.

वायरलेस टेलिग्राफी के लिए कैसे जी मार्कोनी को पेटेंट मिला, जबकि बोस ने मार्कोनी से दो साल पहले 1895 में ही यह आविष्कार किया था? या बोस की और वैज्ञानिक उपलब्धियां क्या रहीं? इन तमाम बातों से तो आप वाकिफ हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बोस ने उपनिषद और भौतिक शास्त्र को कैसे जोड़ा था?

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सिर्फ़ बोस ही क्यों! दुनिया भर के प्रसिद्ध और महान भौतिक शास्त्रियों के लिए उपनिषद किसी प्रयोगशाला से कम नहीं रहे. 1858 में जन्मे बोस गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद और सिस्टर निवेदिता जैसी हस्तियों के समकालीन रहे थे और ये सभी बोस की प्रतिभा से प्रभावित थे. पहले बोस की वैज्ञानिक थ्यो​रीज़ के साथ उपनिषदों के संबंध की चर्चा करते हैं और फिर अन्य भौतिक शास्त्रियों पर उपनिषद के प्रभाव के बारे में बताते हैं.

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वैज्ञानिक जेसी बोस का एक यादगार चित्र.


बोस और उपनिषद : टैगोर, विवेकानंद और निवेदिता
जगदीश चंद्र बोस के वैज्ञानिक अध्ययनों, रिसर्चों और अन्य उपलब्धियों पर उपनिषदों का प्रभाव साफ तौर पर दिखता है. वास्तव में 'ब्राह्मण' की जो परिकल्पना (जगत एक है, आत्मा एक है) उपनिषदों ने दी, उसे बोस ने वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध करने का प्रयास किया. इंग्लैंड में बोस के काम पर जब वैज्ञानिक विवाद हो रहे थे, तब टैगोर ने एक बंगाली पत्रिका में जो लिखा था, उस पर ग़ौर किया जाना चाहिए :

उपनिवेशवाद ने भारत के जिस आत्म गौरव को घायल किया है, उसे बहाल करने के लिए ही नहीं, बल्कि बोस को इसलिए भी सराहा जाना चाहिए क्योंकि वो उपनिषदों का 'सब कुछ एक ही है' वाला ज्ञान आधुनिक विज्ञान के ज़रिये दुनिया को समझा रहे हैं. भले ही, ईसाई वैज्ञानिक यह कहते रहें कि जीवन या आस्था को समझाने वाला विज्ञान बेकार है, बोस के उपनिषद आधारित विज्ञान को खारिज नहीं किया जा सकता.


'पौधों में जान होती है', पहली बार दुनिया को यह विज्ञान बताने वाले वैज्ञानिक और चिंतक जगदीश चंद्र बोस ने खुद 1918 में एक लेक्चर दिया था और उसमें उपनिषदों के बारे में विस्तार से चर्चा की थी. सी मैकेंज़ी ब्राउन ने बोस और वेदांत के संबंध में जो रिसर्च पेपर लिखा, उसके अनुसार बोस के लेक्चर का एक अंश इस तरह है :

प्राचीन चिंतक बहुत अच्छी तरह जानते थे कि जीवन और मन हर जगह सार रूप में है... जटिलता के अलावा, सारांश यह है कि पूर्ण विकास क्रमश: होता है. इस तरह का कीमती ज्ञान देने वाले पूर्वजों के वंशजों के तौर पर चिंतकों को यह स्वीकार करना चाहिए कि हर तरह की खोज जो विज्ञान कर रहा है, वह पूर्वजों का ज्ञान है, जिसका क्रमिक विकास हुआ है.


बोस के उपनिषद आधारित विज्ञान की चर्चित किताब 'रिस्पॉंसेज़ इन द लिविंग एंड नॉन लिविंग' की एडिटर सिस्टर निवेदिता रहीं इसलिए इस किताब की लेखन स्टाइल और प्रस्तुतिकरण पर उनका प्रभाव माना जाता है. निवेदिता और टैगोर के बीच हुए पत्र व्यवहार से भी पता चलता है कि निवेदिता ने वेदांतों और उपनिषदों के काफी अध्ययन के बाद बोस के काम को एडिट किया था.

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जेसी बोस की किताब का मुखपृष्ठ.


यही नहीं, बोस के काम के प्रशंसकों में स्वामी विवेकानंद भी शामिल थे, जो पैरिस में बोस से मिल चुके थे. अमेरिका से लौटने पर भारत में 1897 में विवेकानंद ने एक भाषण में कहा था, 'आधुनिक विज्ञान के निष्कर्ष साबित करते हैं कि ये वही निष्कर्ष हैं, जहां वेदांत सदियों पहले पहुंच चुके थे कि इस पूरे ब्रह्मांड में आध्यात्मिक एकात्मता है.' यह बात अस्ल में विवेकानंद ने बोस के काम को लेकर हुई चर्चाओं के संदर्भ में ही कही थी.

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उपनिषद और भौतिक शास्त्र
क्वांटम फिज़िक्स और मैकेनिक्स में बड़ा योगदान देकर नोबेल पुरस्कार अपने नाम करने वाले ऑस्ट्रियन भौतिक शास्त्री इरविन श्रॉडिंजर को उपनिषदों का सबसे बड़ा विदेशी फैन माना जाता है. श्रॉडिंजर की समाधि पर लगे स्मारक तक पर उपनिषद का सिद्धांत है 'सभी जीव एक हैं और सब एक ही है'. उपनिषदों के अनुसार, 'सब कुछ ब्राह्मण है, सब ब्राह्मण में है, ब्राह्मण में ही रहता है और इसी में ही लौटता है.'

श्रॉडिंजर ने वेदांतों के 'एकोSहम्' की पूरक इस 'ब्राह्मण' की परिकल्पना और भारतीय दर्शन में 'माया' के सिद्धांतों की भरपूर विवेचना की. वो अक्सर अपने परिचितों और दोस्तों से उपनिषदों की चर्चा करते थे. सिर्फ श्रॉडिंजर ही नहीं, बल्कि कई भौतिक शास्त्री उपनिषदों से आकर्षित रहे हैं. नीलस् बोह्र का यह यादगार वाक्य कौन भूल सकता है कि 'मुझे जब सवाल पूछने होते हैं, तो मैं उपनिषदों के पास जाता हूं'.

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क्वांटम फिज़िक्स के ही ज्ञाता वर्नर हिज़ेनबर्ग और टैगोर की मुलाकात के बारे में फ्रिटजॉफ कापरा ने लिखा कि टैगोर ने भारतीय ज्ञान और विचार का जो पिटारा खोला, उससे हिज़ेनबर्ग को काफी सहूलियत हुई. इसी तरह, दुनिया के पहले एटम बम के प्रोजेक्ट के प्रमुख रहे जे रॉबर्ट ओपेनहीमर ने पहले परमाणु बम विस्फोट के समय गीता का एक श्लोक दोहराया था 'अब मैं मृत्यु हो गया हूं, सृजन का नाश करने वाला'.

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उपनिषद के एक पृष्ठ की यह तस्वीर विकिकॉमन्स से साभार.


श्रॉडिंजर का विश्वास रहा कि पश्चिमी विचारकों को भारतीय दर्शन से विचार समझने और लेने चाहिए. चूंकि उपनिषद खुद ही एकता का संदेश देते हैं, तो इसमें भेदभाव की बात ही नहीं है. उपनिषद का सार है 'जो सबमें स्वयं को, स्वयं में सबको देख सकता है, उसके मन से नफरत और डर खत्म हो जाता है.' भारत के ज्ञान के इस गौरव की कथा में बोस का यह कथन हमेशा याद रखना चाहिए कि ज्ञान अंतिम नहीं है और न ही रुकने का नाम है :

"जो ​केवल अतीत के गौरव में जीता है, वह सबसे बड़ा दुश्मन है... सिर्फ और सिर्फ लगातार कुछ सीखकर, कुछ उपलब्धियां हासिल कर ही हम पूर्वजों की धरोहर को सही और न्यायोचित साबित करते हैं. इस आडंबर से पूर्वजों का सम्मान नहीं होता कि वो अंतर्यामी हैं, सब कुछ पता है और अब कुछ भी सीखने को नहीं बचा."
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