भारी केंद्रीय बलों को पालने में कैसे टूट रही है जम्मू-कश्मीर की कमर?

कश्मीर में लंबे समय से भारी सुरक्षा बल तैनात हैं.

कश्मीर में लंबे समय से भारी सुरक्षा बल तैनात हैं.

केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती के लिए गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) अपने नियम के मुताबिक राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों से शुल्क वसूलता है. जम्मू-कश्मीर कई बार अरबों रुपयों के इस शुल्क को माफ करने की गुज़ारिश कर चुका है, लेकिन...

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  • Last Updated: January 31, 2021, 7:56 AM IST
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जम्मू और कश्मीर में केंद्र सरकार (Central Government) के अधीन सशस्त्र पैरामिलिट्री बलों की भारी तैनाती का बोझ केंद्रशासित प्रदेश (Union Territory) के खज़ाने पर बुरी तरह पड़ रहा है. सिर्फ CAPF ही नहीं, बल्कि जम्मू व कश्मीर में आर्मी (Army in Jammu & Kashmir) और लोकल पुलिस भी भारी संख्या में तैनात रही है. सीएपीएफ की तैनाती के मामले में ही राज्य के खज़ाने पर पिछले 11 सालों में 4600 करोड़ रुपये से ज़्यादा का बोझ पड़ चुका है. अब सवाल यह है कि क्या इस पिछड़े और गरीब राज्य के पास यह रकम चुकाने का माद्दा है भी?

साल 2008 में जब अमरनाथ भूमि को लेकर नाराज़गी का माहौल बना था और लोग सड़कों पर उतरे थे, उसके एक साल बाद यानी 2009 से केंद्र ने बलों की जो तैनाती की, उसका बिल स्थानीय सरकार को भेजा गया है. द वायर की खबर की मानें तो बिल की रकम 4648 करोड़ रुपये से कुछ ज़्यादा है. यह रकम 1 जुलाई 2020 की स्थिति के मुताबिक इस रकम के भुगतान का मामला जम्मू कश्मीर सरकार के पास पेंडिंग था.

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क्या और कैसा है ये बिल?
जम्मू कश्मीर राज्य को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जो बिल दिया है, उसके बारे में बताया गया कि एक आरटीआई के जवाब के मुताबिक पता चला कि 2014 तक 1132.89 करोड़ रुपये का बिल पेंडिंग था. तबसे हर साल का ब्योरा देते हुए 2020 तक की स्थिति यह हुई कि केंद्र के मुताबिक राज्य को सीएपीएफ की तैनाती के लिए इतनी बड़ी रकम चुकानी है. यह भी बताया गया कि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में हर साल फोर्स की तैनाती के लिए शुल्क गृह मंत्रालय ही तय करता है.

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कश्मीर में तैनात सुरक्षा बल.


उदाहरण के तौर पर जारी वित्तीय वर्ष में मंत्रालय के नियम के मुताबिक किसी भी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश में यदि एक बटालियन सामान्य एरिया में तैनात की जाती है तो 15.40 करोड़ सालाना शुल्क होगा. वहीं, हाई रिस्क ज़ोन में इस तैनाती के लिए शुल्क 26.88 करोड़ और हाई रिस्क के साथ ही हाई हार्डशिप ज़ोन में इस तैनाती के लिए राज्य को 35.96 करोड़ रुपये सालाना चुकाने होते हैं.



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आप जानते ही हैं जम्मू कश्मीर के कई इलाके तीसरे किस्म के ज़ोन रहे हैं. लेकिन यह भी एक फैक्ट है कि जम्मू कश्मीर के अलावा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के साथ ही लेफ्ट विंग के अतिवाद से प्रभावित राज्य इस शुल्क का सिर्फ 10 फीसदी ही अदा करते हैं.

राज्य की सुनने वाला कोई नहीं!

जम्मू और कश्मीर में लगातार हालात तनावग्रस्त रहे हैं और कई सरकारें केंद्र से इस शुल्क को बख्श देने के लिए आवेदन करती रही हैं क्योंकि राज्य की माली हालत कभी यह रकम अदा करने लायक नहीं रही. लेकिन, इन तमाम आवेदनों पर कोई सुनवाई नहीं हुई. मिसाल के तौर पर, 2013 में तत्कालीन सीएम उमर अब्दुल्ला ने तकलीन गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे से यह बिल माफ करने की गुज़ारिश की थी, लेकिन शिंदे ने इससे इनकार कर दिया था.

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इसी तरह, 2015 और 2019 में एनडीए की सरकार ने भी राज्य के ऐसे ही आवदेनों पर कोई गौर नहीं किया. हालांकि 2019 में गृह मंत्रालय ने जम्मू कश्मीर समेत कुछ राज्यों को सीएपीएफ की तैनाती के लिए सिर्फ 10 फीसदी रकम करने की सहूलियत दी.

केंद्रीय बलों की कितनी है तैनाती?

बलवे से निपटने और लॉ एंड ऑर्डर के लिए सीआरपीएफ की 60 से 65 बटालियन परमानेंट तैनात हैं. इसे आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि सीआरपीएफ की कुल संख्या का करीब 26 फीसदी जम्मू व कश्मीर में ही है. यही नहीं, ज़रूरत पड़ने पर समय-समय पर अतिरिक्त फोर्स भी भेजी गई. इसके अलावा, सीमा सुरक्षा बल, सशस्त्र सीमा बल, इंडो तिब्बतन बॉर्डर पुलिस और सीआईएसएफ को भी अगस्त 2019 के बाद से तैनात किया जाता रहा. आर्मी और लोकल पुलिस तो खैर लगातार कश्मीर में मौजूद है ही.

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सीएम रहते हुए उमर अब्दुल्ला ने तत्कालीन गृह मंत्री से सीएपीएफ तैनाती का बिल माफ करने को कहा था.


क्यों माफ किया जाना चाहिए बिल?

पहले कई सुरक्षा अधिकारी नेता यह बिल माफ करने के पक्ष रहे हैं और कह चुके हैं कि 1989 से ही राजरू में हालात संवदेनशील और बाकी राज्यों से काफी अलग रहे हैं. जम्मू कश्मीर के पूर्व डीजीपी एसपी वैद ने कहा था चूंकि आतंकवाद राष्ट्रीय समस्या है इसलिए केंद्र को राज्य पर चढ़ा यह बोझ माफ कर देना चाहिए. इसी तरह, अनंतनाग लोकसभा सीट से सांसद हसनैन मसूदी इस तरह के बिल को बेवजह का बोझ बता चुके हैं.

मसूदी ने तो यहां तक कहा था कि जम्मू और कश्मीर के लिए जो विकास पैकेज घोषित किए गए, वो सुरक्षा बलों की तैनाती के खर्च में ही खप गए. ऐसे में, यह विषय विचार करने का हो जाता है कि जिस राज्य को एक तरफ भारी भरकम मदद देकर विकास की धारा में लाने की कोशिश होनी है, दूसरी तरफ, उस पर एक भारी बोझ भी लादा गया है.
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