कैसे याद किया जा रहा है बंगाल में गांधीगीरी का वो 'यादगार चमत्कार'?

महात्मा गांधी की यादगार तस्वीर.

West Bengal Elections : पश्चिम बंगाल चुनाव 2021 की सुर्खियों के बीच हैदरी मंज़िल (Hyderi Manzil) को जानिए, जो उन कहानियों की गवाह रही, जिनमें खून खराबे के बीच प्यार के पौधे पनपे थे. इस भवन (Gandhi Bhavan) के महत्व और यहां रचे गए इतिहास की प्रासंगिकता बताती कहानी.

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    तब कोलकाता (Kolkata) नहीं, कलकत्ता था. यहां मियांबागान इलाके में एक उजाड़ वीरान सी कोठी हुआ करती थी, वो भी शहर के बीचों बीच. 1947 में आज़ादी (Freedom of India) के बाद इस वीराने में शांति और प्रेम के फूल खिले थे. ये फूल खिलाने वाले कोई और नहीं, बल्कि महात्मा गांधी (Mohandas Karamchand Gandhi) थे, जिन्होंने सांप्रदायिक दंगों (Communal Riots) की आग में झुलस रहे कलकत्ते में उस समय शांति के लिए यादगार उपवास किया था. इतिहासकारों ने ​इस घटना को 'Miracle of Calcutta' यानी 'कलकत्ता का चमत्कार' के रूप में दर्ज किया.

    कलकत्ता की एक समाजशास्त्री के हवाले से एक रिपोर्ट बताती है कि 7 सितंबर 1947 को गांधी ने जो शब्द कहे थे, उनमें उनके सपनों के बंगाल की झलक साफ देखी जा सकती है :

    हम ईश्वर को साक्षी मानकर चलें. चाहे पूरा हिंदोस्तान ही क्यों न राख हो जाए, लेकिन तब भी बंगाल को शांत रहना होगा... कितना सुखद होगा कि मुस्लिम और पारसी उसी तरह कुरान और ज़ेंद अवेस्ता पढ़ने के लिए आज़ाद हों, जैसे बंगाल के हिंदू गीता पढ़ने, गायत्री मंत्र जपने और संध्या पूजा के लिए स्वतंत्र हैं.'


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    बेलीघाट के बीचों बीच करीब 400 वर्गमीटर के दायरे में फैली हैदरी मंज़िल को अब गांधी भवन के नाम से जाना जाता है क्योंकि कलकत्ते में महात्मा गांधी की आखिरी यात्रा की गवाह यही इमारत थी और यहीं वह ऐतिहासिक घटनाक्रम हुआ था, जिसकी वजह से भारत की आज़ादी की घटना बंगाल में दुख नहीं बल्कि कुछ खुशी का कारण बन सकी थी.

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    1946-47 में बंगाल हिंसा की चपेट में था.


    क्या था 'मिरैकल ऑफ कैलकटा'?
    यह शब्द अस्ल में खुद महात्मा गांधी के एक लेख की वजह से प्रचलन में आया. यह एक घटना नहीं बल्कि 26 दिनों तक होते रहे घटनाक्रमों का सिलसिला और नतीजा था. इस पूरे घटनाक्रम को महात्मा गांधी के अंतिम सालों में किए गए एक महत्वपूर्ण कारनामे के तौर पर जाना जाता है.

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    हो सकता है कि आपने एक कहानी सुनी हो या रिचर्ड एटनबरो की फिल्म में एक सीन के तौर पर देखी हो : मुस्लिम भीड़ के हाथों बेटे के मारे जाने के बाद एक कट्टर हिंदू नाहरी एक मुस्लिम बच्चे का कत्ल करता है. गांधी के पास जब नाहरी पहुंचता है, तो गांधी उसे प्रायश्चित के तौर पर एक अनाथ मुस्लिम बच्चे को गोद लेने को कहते हैं और कहते हैं कि नाहरी उस बच्चे को मुस्लिम की पहचान के साथ ही पाले. नाहरी पछतावे के आंसू बहाता है.

    हालांकि यह कहानी काल्पनिक है लेकिन इतिहासकार बताते हैं कि उस वक्त गांधी के प्रयासों के चलते ऐसे कई किस्से सच में भी घटे थे. इस पूरे घटनाक्रम को सिरे से समझिए.

    वीराने में कैसे खिले थे फूल?
    हैदरी मंज़िल को रहने लायक बनाने के लिए करीब आठ कमरों की साफ सफाई करवाई गई और वहां कुछ लोगों के रहने लायक इंतज़ाम करवाए गए. 13 अगस्त से 7 सितंबर 1947 के बीच गांधी इस इमारत में रहे और उनके साथ हुसैन शहीद सुहरावर्दी भी थे, जो पहले अविभाजित बंगाल की सरकार के प्रमुख रह चुके थे.

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    कोलकाता स्थित गांधी भवन का चित्र विकिकॉमन्स से साभार


    हिंदू और मुस्लिम दंगों की आग में जल रहे थे और इस इमारत से दोनों समुदायों के बीच प्यार और शांति कायम करने का बीड़ा गांधी ने उठाया था. लगातार 73 घंटों तक उपवास रखकर गांधी ने कहा था कि जब तक दोनों पक्षों के लोग हथियार नहीं फेंक देंगे, वो उपवास नहीं तोड़ेंगे. हुआ भी. 4 सिंतबर को गांधी के पैरों में हथियार डालकर सबने अम्न की कसम खाई.

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    शहीद मीनार पर 7 सितंबर को भारी भीड़ के बीच गांधी ने क​हा था : 'आप लड़ना चाहें भी तो किसके खिलाफ़ लड़ेंगे! अपने ही भाइयों के खिलाफ? जिनके पास भी हथियार हैं, मैं गुज़ारिश करता हूं कि फेंक दें. हथियार किसी की रक्षा नहीं करते, ईश्वर करता है, उसकी हिफाज़त में ही जाना होगा.'

    यह था कलकत्ते का चमत्कार. टेलिग्राफ की​ रिपोर्ट में एक समाजशास्त्री के हवाले ये यह भी कहा गया 'दक्षिण एशिया के सबसे काले समय में रोशनी की किरणें फूटने की ये कहानियां भुला दी गई हैं और धार्मिक एजेंडों के तहत लोगों को इन कहानियों की याद तक न आए, इस तरह के प्रौपेगैंडा किए जाते हैं. यह भी नहीं बताया जाता कि 1940 के दशक में हिंदुत्ववादी संगठनों की क्या भूमिका रही थी और सारा दोष मुस्लिम लीग के सिर मढ़ दिया जाता है.'

    क्यों खास रही हैदरी मंज़िल?
    19वीं सदी में दाउदी बोहरा समाज द्वारा बनाई गई यह इमारत कलकत्ता के उस इलाके में स्थित थी, जहां 1946 के दंगों में काफी हिंसा हुई थी. महात्मा गांधी ने जान बूझकर मुस्लिम बहुल इलाके वाले इस स्थान को उपवास करने के लिए चुना था. इतिहास बताता है कि भारत की आज़ादी के दिन भी गांधी उपवास और प्रार्थना कर रहे थे.

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    कोलकाता स्थित गांधी भवन की तस्वीर विकिकॉमन्स से साभार.


    हैदरी मंज़िल इसलिए भी खास रही क्योंकि कलकत्ता में गांधी की आखिरी यात्रा के दौरान यही उनका केंद्र थी. इतिहासकारों की मानें तो गांधी ने 1896 अपने आखिरी समय तक कलकत्ता के 64 बार दौरे किए और कुल 566 दिन इस शहर में बिताए थे. नेताजी सुभाषचंद्र बोस के खानदान के सुगत बोस भी कह चुके हैं कि 15 अगस्त 1947 को अगर कलकत्ता में शांति थी, तो उसके पीछे गांधी की ही नैतिक ताकत थी.

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    इतिहासकार मौजूदा और हाल में हुई कुछ घटनाओं के मद्देनज़र कहते हैं कि बंगाल का दुर्भाग्य है कि अब गांधीजी जैसा न तो कोई नेता बचा है और न ही उनकी दिखाई राह पर चलने वाला है. हां, उनके नाम के ब्रांड को इस्तेमाल करने वाले कम नहीं हैं. बंगाल के बुद्धिजीवी गांधी की सोच को इस समय में बंगाल के लिए काफी प्रासंगिक बता रहे हैं.

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