कैसे रची गई इसरो के टॉप साइंटिस्ट को जासूसी मामले में फंसाने की झूठी साजिश

70 के दशक में इसरो के शीर्ष वैज्ञानिकों में थे एंबी नारायणन, क्रायोजेनिक इंजन प्रोजेक्ट पर कर रहे थे काम

News18Hindi
Updated: September 14, 2018, 5:10 PM IST
कैसे रची गई इसरो के टॉप साइंटिस्ट को जासूसी मामले में फंसाने की झूठी साजिश
एंबी नारायण की आत्मकथा
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Updated: September 14, 2018, 5:10 PM IST
सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसरो के शीर्ष वैज्ञानिक रहे एस नंबी नारायणन के खिलाफ फैसले से साफ हो गया कि उनके खिलाफ भारी साजिश रची गई. दरअसल केरल सरकार के कुछ लोग उनके जरिए इसरो के दो बड़े वैज्ञानिकों को फंसाना चाहते थे. दाल गल नहीं पाई. हैरानी की बात है कि इस साजिश में जो अफसर मुख्य आरोपी था और जो निलंबित हुआ, वो अब बहाली के बाद बड़े पद पर काम कर रहा है.

इसरो जासूसी कांड में 24 साल बाद न्याय पाने वाले इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) के वैज्ञानिक एस नंबी नारायणन ने लंबी लड़ाई लड़ी है. सीबीआई ने उन्हें दो साल में ही सारे आरोपों से बरी कर दिया था लेकिन वो पिछले 20 सालों से मुआवजे की लड़ाई लड़ रहे थे.

नारायणन एक जमाने में देश के जाने माने साइंटिस्ट रहे हैं. वो उस क्रायोजेनिक प्रॉजेक्ट के डायरेक्टर थे, जिसे इसरो उनकी अगुवाई में विकसित कर रहा था. दरअसल ये नारायणन ही थे, जो 70 के दशक में भारत में द्रव ईंधन की तकनीक काम कर रहे थे. तब एपीजे अब्दुल कलाम की टीम ठोस मोटर पर काम कर रही थी.

भविष्य के कार्यक्रम पर काम कर रहे थे नारायण

नारायण ने 70 के दशक में इसरो को बता दिया था कि किस तरह भविष्य के प्रोग्राम्स में द्रव ईंधन वाले इंजन काम आने लगेंगे. तब वो इसरो के चेयरमैन सतीश धवन के करीबी थे. वो उन्हें प्रोत्साहित करते रहते थे. नारायणन का काम संभालने वाले यूआर राव नारायणन ने बाद में द्रव प्रोपेलेंट मोटर्स विकसित की.

केरल के अधिकारी इसरो के दो टॉप अफसरों को फंसाना चाहते थे, इसलिए पहले साजिश रचकर नारायण को गिरफ्तार किया गया


तब उछला इसरो जासूसी मामला
जब भारत अपनी क्रायोजनिक इंजन तकनीक के लिए रूस से बातचीत कर रहा था तभी 1994 में इसरो में जासूसी कांड सुर्खियां बना. नारायणन समेत तीन साइंटिस्ट गिरफ्तार किये गए, उन पर आरोप लगा कि वो ये तकनीक पाकिस्तान को बेच रहे थे. हालांकि ये आरोप बाद में खारिज हो गया. पुलिस को लाख कोशिश के बाद भी कुछ ऐसा नहीं मिला, जिसे आपत्तिजनक कहा जा सके.

50 दिन जेल में रहे
नारायणन को गिरफ्तार कर लिया गया. वो 50 दिनों तक जेल में रहे. उनका कहना है कि इंटेलिजेंस के जिन अधिकारियों ने उन्हें गिरफ्तार किया, वो चाहते थे कि वो इसरो के अपने टॉप ब्रास के खिलाफ झूठे आरोप लगाएं. जब उन्होंने मना कर दिया तो उन्हें यातनाएं दी गईं. वो अस्पताल ले जाए गए. उन्होंने बाद में कहा कि उनकी सबसे बड़ी शिकायत है कि इसरो ने उस समय उन्हें सपोर्ट नहीं किया. तत्कालीन इसरो चेयरमैन कृष्णास्वामी कस्तूरीरंगन ने कहा था कि इसरो कानूनी मामलों में दखल नहीं देगा.

सीबीआई ने केस का गलत पाया
मई 1996 में सीबीआई ने फोन करके उन्हें बताया कि उनके खिलाफ लगे आरोप सही नहीं पाए गए हैं. सीबीआई ने इस मामले को ही गलत पाया. बाद में अप्रैल 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले को खारिज करते हुए नारायणन को बाइज्जत बरी कर दिया.

सीबीआई ने अपनी जांच में पाया कि केरल सरकार के अधिकारियों ने झूठा केस बनाया था


मानवाधिकार आयोग ने लताड़ा
1999 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने केरल सरकार को लताड़ लगाई. एचएचआरसी ने कहा उनके खिलाफ राज्य सरकार ने जो कुछ किया उससे न केवल उनके परिवार की बदनामी हुई बल्कि उन्हें मानसिक तौर पर भी परेशानी हुई. साथ ही स्पेस साइंटिस्ट के तौर पर उनके शानदार करियर को जो आंच आई, वो अलग. नारायणन आरोप मुक्त जरूर हो गए लेकिन इसरो ने उन्हें तिरुवनंतपुरम से बाहर भेज कर ऑफिस का काम दे दिया.

केरल सरकार का नकारात्मक रुख
वर्ष 2001 में मानवाधिकार आयोग ने केरल सरकार से उन्हें मुआवजे के तौर पर एक करोड़ रुपए देने का आदेश दिया लेकिन उसने उसे नहीं माना. साल 2001 में नारायणन सेवानिवृत हो गए. सितंबर 2012 में मानवाधिकार आयोग ने केरल हाईकोर्ट में अपील की, जहां उन्हें दस लाख रुपए का मुआवजा देने का फैसला हुआ. केरल सरकार ने ये भी नहीं दिया.

आरोपी अफसरों की बहाली
03 अक्टूबर 2012 को केरल सरकार ने आरोपी पुलिस अधिकारियों को बहाल कर नौकरी पर वापस बुला लिया. उसका कहना है कि इस मामले को 15 साल हो चुके हैं लिहाजा आरोपी सरकारी अधिकारियों को बहाल किया जा सकता है. इस मामले का मुख्य आरोपी अफसर सिबी मैथ्यू फिलहाल केरल में चीफ इनफॉर्मेशन कमिश्नर है.

नारायणन ने लिखी आत्मकथा
फिर नंबी नारायणन ने अपनी आत्मकथा ओंरकालुडे ब्रामनपट्टनम लिखकर सारे सच को उजागर किया कि किस तरह एक साजिश करके उन्हें फंसाया गया. ये किताब 23 अक्टूबर 2017 में प्रकाशित हुई.
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