'जाना है तो जाओ..' 2014 से कितनी पार्टियां छोड़ चुकीं एनडीए का साथ?

नेटवर्क 18 क्रिएटिव

यह तो स्पष्ट है कि भाजपा और उसके सहयोगियों (BJP and Allies) के बीच मतभेदों की खाई बन चुकी है, लेकिन क्यों? भाजपा का विस्तारवादी रवैया (BJP Expansion) और पूर्ण बहुमत का 'स्वैग' कैसे क्षेत्रीय सहयोगियों को पिछले छह सालों में बीजेपी से अलग कर चुका है?

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    शिद्दत से चल रहे किसान आंदोलन (Farmers' Agitation) के बीच खबर आप तक पहुंच चुकी है कि राजस्थान में हनुमान प्रसाद बेनीवाल (Hanuman Prasad Beniwal) की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) ने खुद को एनडीए (National Democratic Alliance) से अलग कर लिया है. किसान आंदोलन जब शुरू ही हो रहा था, तभी भाजपा की प्रमुख सहयोगी पार्टी रही अकाली दल (Akali Dal) ने भी एनडीए से किनारा किया था. आपको याद है कि किसानों के पक्ष में हरसिमरत कौर बादल (Harsimrat Kaur Badal) ने केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देकर एनडीए को छोड़ा था. क्या आपको यह याद है कि पिछले छह सालों में कितने सहयोगी एनडीए से रूठे और टूटे?

    सियासी उठापटक के लिहाज़ से उत्तर से दक्षिण तक किसान आंदोलन चर्चित ही नहीं, असरदार भी रहा. बेनीवाल और हरसिमरत कौर के अलावा, तमिलनाडु में एमएनएम के महासचिव अरुणाचलम ने भाजपा जॉइन कर ली क्योंकि उनकी पार्टी के नेता और दिग्गज फिल्मकार कमल हासन नए कृषि कानूनों के विरोध में ही रहे. जबसे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए की सरकार केंद्र में बनी, तबसे कई मुद्दों पर गठबंधन के साथी अलग होते रहे.

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    6 साल में एनडीए से अलग हुई पार्टियां
    मोदी के पीएम बनने यानी 2014 से अब तक कितनी पार्टियों ने भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन से दामन छुड़ाया, यह जानने की शुरूआत उसी साल से करते हैं. 2014 के आम चुनाव के बाद सबसे पहले एनडीए छोड़ने वाली पार्टी कुलदीप बिश्नोई की हरियाणा जनहित कांग्रेस रही. तीन साल बाद यह पार्टी कांग्रेस में विलय हो गई.

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    इस साल हरसिमरत कौर और हनुमान बेनीवाल ने एनडीए को छोड़ा.


    साल 2014 से 2016 के बीच, तमिलनाडु की तीन पार्टियों पट्टालि मक्कल कातची (PMK), देसिया मुरपोक्कू द्रविड़ कषगम (DMDK) और मारुमलारची द्रविड़ मुनेत्र कषगम (MDMK) ने भाजपा से खुद को अलग कर लिया. हालांकि इनमें से पहली दो पार्टियां 2019 के लोकसभा चुनाव में वापस भाजपा के साथ जुड़ गई थीं.

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    दूसरी तरफ, तमिलनाडु की प्रमुख राजनीतिक पार्टी AIADMK के बारे में कहा जा रहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव में वो भाजपा के साथ रहने के मूड में नहीं है लेकिन चूंकि उसके पास जयललिता जैसा कोई कद्दावर नेता नहीं है और केंद्रीय जांच एजेंसियां उसके नेताओं के पीछे हैं, इसलिए उसके पास भाजपा को छोड़ पाने का विकल्प नहीं है.

    इनके अलावा, केरल की बात करें तो 2016 में केरल क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी और जनाधिपत्य राष्ट्रीय सभा ने एनडीए को छोड़ दिया था. हालांकि इन पार्टियों से भाजपा को कोई लाभ भी नहीं दिख रहा था. वहीं, महाराष्ट्र में 2017 में किसान नेता राजू शेट्टी की पार्टी स्वाभिमानी पक्ष एनडीए से अलग हुई.

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    अलग होकर वापस आईं ये पार्टियां
    क्षेत्रीय पार्टियों के एनडीए से अलग होते जाने का सिलसिला जारी रहा और 2018 में, बिहार से जीतनराम मांझी की हिंदुस्तान अवाम मोर्चा, मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी एनडीए से टूट गईं. लेकिन यहां भी तमिलनाडु की तर्ज पर मांझी और साहनी की पार्टियां 2020 विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ खड़ी दिखीं.

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    2019 में भाजपा की अहम और पुरानी सहयोगी पार्टी शिवसेना ने दूरी बनाई.


    आंध्र प्रदेश की राजनीति में तीसरे विकल्प के तौर पर उभरने के लिए अभिनेता पवन कल्याण की जनसेना पार्टी भी भाजपा के साथ आती-जाती रही. 2014 में भाजपानीत गठबंधन में रहने के बाद 2019 में लेफ्ट और बसपा के गठबंधन से हाथ मिलाने वाले कल्याण फिर भाजपा के साथ हैं.

    इस तरह भी खुलीं गठबंधन की गांठें
    अब अगर पूर्वोत्तर की बात करें तो नागालैंड में एनडीए की गांठें खुलती दिखीं. 2018 में जब भाजपा ने नेशनल डेमोक्रैटिक प्रोग्रेसिव पार्टी से हाथ मिलाया तो नागा पीपल्स फ्रंट ने हाथ छुड़ा लिया. वहीं बंगाल के विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र तृणमूल कांग्रेस के पाले में जाने वाले और अलग गोरखा लैंड की मांग को मुद्दा बनाने वाले गोरखा मुक्ति मोर्चा ने भी एनडीए को अलविदा कहा.

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    इनके अलावा, ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी भी उत्तर प्रदेश में भाजपा के गठबंधन से अलग हुई. 2018 में आंध्र के लिए विशेष राज्य के दर्जे के मुद्दे पर तेलुगू देशम पार्टी ने भी भाजपा का साथ छोड़ा था. वहीं, महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर हुए विवाद में शिवसेना ने भाजपा के धुर विरोधियों के साथ हाथ मिलाया लेकिन कहा कि राज्य में न सही, केंद्र में शिवसेना एनडीए का हिस्सा है.

    तो क्या भाजपा को साथियों से फर्क नहीं पड़ता?
    एनडी का साथ छोड़ने वाली कई पार्टियां भाजपा की नज़र में वोटों या वोटरों के बीच आधार के हिसाब से 'फायदेमंद' नहीं रहीं. दूसरे, स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाने में कामयाब होने वाली भाजपा के लिए छोटे सहयोगियों पर निर्भरता बची नहीं है. टीडीपी और शिवसेना जब एनडीए के खिलाफ हुए तो उन्हें रोकने के लिए भाजपा का रुख ऐसा नहीं रहा कि वह पुराने और अहम साथियों के लिए हाथ बढ़ाती दिखे.

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    किसान आंदोलन को लेकर उभरे मतभेदों के बाद इस साल दो प्रमुख सहयोगी एनडीए से अलग हुए.


    गठबंधन की राजनीति में भाजपा के पांच बड़े पार्टनर थे - टीडीपी, अकाली दल, शिवसेना, पी​डीपी और जेडीयू. ताज़ा स्थिति यह है कि जेडीयू को छोड़कर बाकी सभी गठबंधन से अलग हो चुके हैं या फिर दूरी बना चुके हैं. पीडीपी को तो खुद भाजपा ने किनारे कर दिया. जानकारों के मुताबिक इस बर्ताव से एनडी कमज़ोर हुआ है.

    कल्याणी शंकर ने न्यूज़18 के लिए विश्लेषण करते हुए लिखा कि एनडीए के कई सहयोगियों की यही शिकायत रही कि महत्वपूर्ण मामलों में उनकी सलाह तक नहीं ले जाती. सहयोगी अटलबिहारी वाजपेयी के समय को याद करते हैं गठबंधन के सदस्यों को मान और अहमियत दी जाती थी. लेख के मुताबिक मोदी के नेतृत्व के समय भाजपा का रुख यह है कि एनडीए में वही पार्टियां उपयोगी हैं, जिनसे भाजपा को किसी तरह फायदा होता है.

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