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क्या हम कभी जान पाएंगे कि भूख, हादसों और रोगों से कैसे मारे जा रहे हैं मजदूर?

क्या हम कभी जान पाएंगे कि भूख, हादसों और रोगों से कैसे मारे जा रहे हैं मजदूर?

देश की 37 फीसदी आबादी प्रवासियों की है. फाइल फोटो.

देश की 37 फीसदी आबादी प्रवासियों की है. फाइल फोटो.

औरंगाबाद में मालगाड़ी से कुचल जाने के कारण 15 से 17 प्रवासी मज़दूरों की मौत की खबर ने सनसनी फैलाई. एक दिन पहले ही, एक सर्वे रिपोर्ट में बताया गया था कि कोरोना वायरस के चलते हुए देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान सड़क हादसों में कितने मज़दूर मारे गए. लेकिन, लॉकडाउन के दौरान भूख, खुदकुशी, इलाज न मिलने और डर से कितनी मौतें हुई हैं?

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कोविड 19 (Covid 19) वैश्विक महामारी के भारत में आने के बाद 25 मार्च को अचानक देशव्यापी लॉकडाउन (Lockdown) घोषित किया गया. इससे प्रवासी मज़ूदरों (Migrant Workers) के सामने संकट खड़ा हुआ. इनके पास काम नहीं रहा, पैसे पर्याप्त नहीं रहे और अपने गांवों या घरों तक पहुंचने के साधन भी नहीं. ऐसे में, इन मज़दूरों ने अपने घरों को लौटना शुरू किया और यहीं से हादसों, भूख (Starvation), डर और तमाम दिक्कतों के शिकार हुए. सिलसिलेवार जानें कि हमें कैसे उन मौतों को समझना चाहिए, जो लॉकडाउन के समय में कोरोना वायरस (Corona Virus) से नहीं हुई हैं.

युद्ध के समय में वास्तविकता के खिलाफ कल्पना ही सबसे बड़ा हथियार होता है... अंत में, जो अवसर गंवा दिए गए, जिन रिश्तों को हम अपनाने से कतराए और जिन फैसलों में हमने बहुत वक्त लगाया, उन पर अफ़सोस ही रह जाता है.
लुइस कैरॉल, प्रसिद्ध लेखक


कितने मज़दूरों की जान गई?
लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मज़दूर किन हालात में किस तरह मारे जा रहे हैं, इसका कोई सरकारी डेटाबेस नहीं है, लेकिन कुछ स्वयंसेवी अपने स्तर पर ये डेटा जुटा रहे हैं. डेटा संग्रहकर्ता और लोकहित टेकी तेजेश जीएन ने टीम के साथ मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर जो आंकड़े अपडेट किए, उनके मुताबिक आज शुक्रवार तक 370 मज़दूर गैर कोविड 19 संक्रमण कारणों से मारे जा चुके हैं, जबकि वास्तविक संख्या बहुत ज़्यादा हो सकती है.

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तेजेशजीएन के पोर्टल पर इस ग्राफिक के साथ प्रवासी मज़दूरों की मौतों के आंकड़े अपडेट किए जा रहे हैं.


क्या हैं इस डेटा की सीमाएं?
ये डेटा देश दुनिया के मीडिया में आ रही मज़दूरों की मौतों संबंधी रिपोर्ट्स पर आधारित है. यानी सबसे पहले ये सिर्फ उतना आंकड़ा है, जो रिपोर्ट हुआ है. लाठीचार्ज, संक्रमण के डर, भूख, अन्य बीमारियों के चलते समय पर इलाज न मिलने और खुदकुशी जैसे कारणों से हुईं इन मौतों का कोई प्रामाणिक रजिस्टर तक तैयार नहीं हो रहा है. वहीं, संभवत: कुछ अन्य व्यक्ति या संस्थाएं भी इस तरह के डेटा पर स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं.

भूख से कैसे हो रही हैं मौतें?
जिस देश में दावा किया जा रहा है कि खाद्यान्न की कमी नहीं है, वहां अगर लोग भूख से मर रहे हैं तो महामारी आपदा प्रबंधन पर सवाल उठते हैं. मिसाल के तौर पर द प्रिंट की रिपोर्ट बताती है कि कर्नाटक के बेल्लारी में दो, बिहार के भोजपुर में 11 वर्षीय बालक और साइबराबाद में दैनिक वेतन भोगी मज़दूर भूख से मरने वालों में शामिल रहे. ये सिर्फ कुछ उदाहरण हैं. ओडिशा में, सरकार उस मामले की जांच करवा रही है जिसमें एक व्यक्ति ने भूख से बेहाल होने पर खुदकुशी कर ली.

सड़क हादसों की रिपोर्ट
सेवा लाइफ फाउंडेशन की ​सर्वे रिपोर्ट के आंकड़ों की मानें तो लॉकडाउन के समय के दौरान ​कम से कम 42 प्रवासी मज़दूर सड़क हादसों के शिकार हुए हैं. यह आंकड़ा कम से कम इसलिए है क्योंकि कई राज्यों ने इस सर्वे के लिए आंकड़े नहीं दिए इसलिए वहां के नंबर इसमें शुमार नहीं हैं.

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प्रवासी मज़दूरों के लिए विशेष ट्रेनें मई में शुरू की गईं. फाइल फोटो.


और कैसे कैसे जा रही हैं जानें?
1. खबरों के मुताबिक लॉकडाउन के ​नियमों के उल्लंघन की बात कहते हुए मैंगलूरु में पुलिस ने दो लोगों को इस कदर पीटा के उनकी जान चली गई. महाराष्ट्र में पुलिस ने एंबुलेंस ड्राइवर के सिर पर लाठी से इतनी सख्त चोटें दीं कि वह भी आखिरकार मारा गया. गुड़गांव से उत्तर प्रदेश लौटे एक युवक ने कहा कि उसका कोरोना टेस्ट निगेटिव रहा है लेकिन उसके साथ पुलिस ने इतनी मारपीट और बदसलूकी की कि उसने खुदकुशी कर ली. पुलिस की बदसलूकी के ये कुछ उदाहरण हैं.

2. लॉकडाउन के चलते कई अस्पतालों में ओपीडी और सामान्य स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव बड़ी समस्या हो गया है. लॉकडाउन में अपने गांवों या घरों को लौट रहे प्रवासी मज़दूरों के लिए कोरोना वायरस के अलावा भी कई अन्य बीमारियों से ग्रस्त होने का जोखिम बढ़ गया है और इसके लिए उन्हें कोई स्वास्थ्य सुरक्षा नहीं मिल रही है.

3. उत्तर प्रदेश के बांदा में एक व्यक्ति ने खुद को फांसी पर इसलिए लटका लिया क्योंकि वह अपनी खराब आर्थिक हालत और परिवार के भविष्य की चिंता से ग्रस्त था. वहीं, आगरा के एक रसूखदार के रेस्तरां से नौकरी से निकाल दिए गए मेघालय के एक अनाथ युवक ने बेरोज़गारी जनित चिंताओं से खुदकुशी कर ली.

अमानवीयता के और उदाहरण
सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें खबरों के मुताबिक कहा जा रहा है कि गुजरात में सरकारी अधिकारी प्रवासी मज़दूरों के विशेष ट्रेनों से लौटने के समय प्रति व्यक्ति 600 रुपये वसूल करते दिख रहे हैं. ऐसी और भी कुछ मिसालें मुंबई मिरर के एक लेख में दर्ज हैं, देखें :



1. कर्नाटक सरकार ने कथित तौर से बिल्डर लॉबी के इशारे पर प्रवासी मज़दूरों के लिए विशेष ट्रेनें रद्द की हैं.
2. उत्तर प्रदेश सरकार ने एक कानून में कहा है अगर किसी ने जानते बूझते कोरोना संक्रमण छुपाया या फैलाया, उसे उम्र कैद की सज़ा दी जाएगी. अव्वल तो राज्य में मुफ्त टेस्टिंग की सुविधा नहीं दे रहा और यह स्पष्ट नहीं है कि यह कैसे तय किया जाएगा कि किसने जानते बूझते संक्रमण फैलाया.
3. ओडिशा में हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि राज्य में कोविड 19 पॉज़िटिव को प्रवेश नहीं दिया जाएगा.

ज़रा शेल्टर होमों पर नज़र डालें
अपने घरों को लौटने वाले या बेसहारा प्रवासी मज़ूदरों को जिन शिविरों में रोका या रखा जा रहा है, उनकी सही तस्वीर क्या है? इंडियन एक्सप्रेस ने दिल्ली के ऐसे ही शिविर पर दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट के ​हवाले से लिखा :

- पंखे काम नहीं कर रहे, पावर बैकअप नहीं है. मच्छरों की समस्या.
- टॉयलेट्स की सफाई शायद ही कभी हो पाती है. हाथ धोने तक की सुविधा नहीं है. हर काम के लिए सिर्फ एक साबुन मुहैया कराया गया है.
- भोजन की क्वालिटी खराब है. ज़्यादातर प्रवासी शिविर छोड़ना चाहते हैं क्योंकि उनके परिवार यहां ज़िंदा नहीं रह सकते.

क्या जाना जा सकेगा कितनी जानें गईं?
पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने इंडियन एक्सप्रेस के लिए लेख में बेरोज़गारी, अर्थव्यवस्था में गिरावट, पूंजीवादी मानसिकता, मज़दूरों के चिंताजनक हालात जैसे मुद्दे उठाते हुए कहा है चूंकि कोई भी राज्य यह रिपोर्ट नहीं करेगा कि वहां भूख से मौत हुई इसलिए सही सही आंकड़ा मिलना बेहद मुश्किल है कि लॉकडाउन के चलते कितने गरीबों की जानें लाचारी के हालात में गईं.

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देश भर में साढ़े छह करोड़ लोग दूसरे राज्यों में प्रवासी हैं. फाइल फोटो.


आखिर कौन हैं ये मज़दूर?
हालां​कि कई रिपोर्ट्स मानती हैं कि यह आंकड़ा भी सही सही पता करना मुमकिन नहीं है क्योंकि इसका भी कोई प्रामाणिक स्रोत नहीं ​है कि देश में कितने प्रवासी मज़दूर हैं. लेकिन, जनगणना, आर्थिक सर्वे जैसे कुछ स्रोतों के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट की मानें तो देश की 37% आबादी यानी करीब 45 करोड़ लोग प्रवासी हैं. इनमें से करीब 6.5 करोड़ दूसरे राज्यों में प्रवासी हैं और इसके 33% मज़दूर हैं. इस अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश और बिहार से प्रवासियों का आंकड़ा देश के कुल प्रवासियों का करीब 40 फीसदी है.

ये प्रवासी मज़दूर अचानक आसमान से नहीं टपके हैं. ये शहरों के मुहानों, निचली बस्तियों या झुग्गियों में हमेशा मौजूद रहे हैं, जिन्हें संभ्रांतों ने जान बूझकर दरकिनार और अदृश्य रखा है.
उमेश यादव, ट्राइकॉंटिनेंटल शोधकर्ता


क्या सबसे कठोर लॉकडाउन है ये?
इस पूरे विश्लेषण और कई लेखों को पढ़ने के बाद कहा जा सकता है कि अगर केंद्र सरकार ने समय पर तैयारी की होती और पूरी रणनीति के साथ लॉकडाउन घोषित किया होता तो ऐसे हालात नहीं होते. जैसा कि द प्रिंट की रिपोर्ट कहती है कि लोक ट्रांसपोर्ट, ट्रेन, उड़ानें बंद, इमरजेंसी कारणों तक से भी लोगों की यात्रा पर पाबंदी और यहां तक कि लोगों की भूख के लिए भी पर्याप्त इंतज़ामों का न होना इस लॉकडाउन को अमानवीय बनाता है, राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपदा प्रबंधन पर सवाल खड़े कर यह चिंता भी पैदा करता है कि प्रवासी मज़दूरों की इस तरह की मौतों को कैसे जस्टिफाई किया जा सकेगा.

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