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कैसे सेनाओं ने पूरी दुनिया के खानपान पर असर डाला?

साउथ इंडिया का पुट्टू फिलीपीन्स में पूटो बूमबोंग या पूटो की तरह प्रचलित हुआ.
साउथ इंडिया का पुट्टू फिलीपीन्स में पूटो बूमबोंग या पूटो की तरह प्रचलित हुआ.

भोजन संबंधी आदतों (Food Habits) और परंपराओं के चलते ही ब्रिटिश फौज में भारतीयों ने विद्रोह (First Freedom Struggle of India) किया था और 1916 में तुर्की में ब्रिटिश फौजों के समर्पण की वजह भी भोजन ही रहा था. सेनाएं और शासन भोजन पंरपराओं पर असर डालने वाले अहम कारणों में शुमार रहे हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 27, 2021, 3:56 PM IST
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‘आखिरकार दुनिया में सभी लड़ाइयां खाने को लेकर ही तो हैं.’ फूड राइटर क्लिफर्ड राइट के इस जुमले को कई अर्थों में समझा जा सकता है. एक अर्थ यह है कि दुनिया के कई हिस्सों में आज के समय में जो भोजन प्रचलित या लोकप्रिय (Staple Food) हैं, उनके पीछे किसी युद्ध, किसी सेना या किसी बाहरी शासन (War or Colonialism) की कहानी रही है. सीधे युद्धों, सैन्य हमलों और लंबे चलने वाले सांस्कृतिक संघर्षों के कारण एक-दूसरे के भोजन पर प्रभाव पड़ना (Food Culture) और फ्यूज़न फूड का विकास (Fusion Food) होना समझा जा सकता है. जैेसे बेहद लोकप्रिय ब्रिटिश करी UK में तब चलन में आई, जब ब्रिटिशों ने भारत पर कुछ समय तक शासन कर लिया था.

ऐसी ही एक कहानी ‘करे-करे’ की है. फिलीपीन्स में इस करी की कहानी ब्रिटेन और भारत से जुड़ी है. 18वीं सदी में ब्रिटेन और फ्रांस के बीच हुए युद्ध के दौरान जब ब्रिटिशों ने मनीला को अपने अधीन किया, तब ब्रिटिश सेना में शामिल भारतीय सिपाहियों के लिए खाने की समस्या पैदा हुई क्योंकि फिलीपीन्स में भारती जैसे मसाले नहीं थे. तब भारतीय सैनिकों ने प्रयोग करते हुए एक करी बनाई, जिसे बाद में फिलीपीन्स में करे-करे के नाम से लोकप्रियता मिली.

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सबके अपने प्रीज़र्वेशन के तरीके रहे
सेना के भोजन की कहानी में सबसे अहम बात है लंबे समय तक ढोया और रखा जा सकने वाला भोजन. मांस और ब्रेड का इस्तेमाल दुनिया के कई हिस्सों में सेना के अनुकूल भोजन के तौर पर होता रहा है. चूंकि हर संस्कृति में भोजन को लंबे समय तक खाने लायक बनाए रखने के लिए पद्धतियां अपनाई जाती रहीं, इससे भी भोजन के आदान-प्रदान का मज़ेदार इतिहास सामने आया.

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ब्रिटिश करी की कहानी युद्धों के भोजन पर असर का इतिहास बताती है.


मिसाल के तौर पर दूसरे विश्वयुद्ध के समय सैनिकों को कंडेंस्ड मिल्क देने का प्रचलन हुआ क्योंकि दूध को सामान्य तौर पर ज़्यादा समय तक सुरक्षित रखना मुमकिन नहीं हो पा रहा था. भारत का अचार इसी तरह कई संस्कृतियों और देशों तक पहुंचा. फिलीपीन्स के साथ ही मलेशिया और ब्रूनेई तक अचार पुराने समय से ही भारत से पहुंचा. ये कुछ इस तरह के भोजन थे, जिन्हें यात्रा या युद्ध के समय साथ में रखा जा सकता था.

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ऐसा ही एक उदाहरण है कि दूसरे विश्व युद्ध के समय हवाई में कई सैनिक कई जगहों से आए थे. इन सैनिकों का पेट भरने के लिए आखिर सरकार ने कई बक्सों में भरकर स्पैम भिजवाया था. यही स्पैम अब हवाई का आम भोजन बन चुका है. चावल और नोरी से बने इस रेडी टू ईट फूड के करीब 70 लाख कैन इस छोटे से द्वीप पर हर साल खप जाते हैं.

युद्धों के कारण ही आया रेडी टू ईट का दौर
बेशक. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कोकाकोला. दूसरे विश्वयुद्ध के समय 1941 में कंपनी ने सैनिकों के लिए कोका कोला की कैन की कीमत न के बराबर कर दी थी. इसका नतीजा यह हुआ कि युद्ध के समय कोका कोला की आदत लगी और युद्ध के बाद इसकी बिक्री बढ़ने लगी. यह ट्रेंड आगे जाकर काफी लोकप्रिय हुआ. 1960 के दशक में सेना के लिए रेडी टू ईट फूड का प्रचलन शुरू हुआ, जो अब आम जनजीवन का हिस्सा बन चुका है.

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सेनाएं दुनिया भर की भोजन परंपरा में प्रमुख भूमिका निभाती रहीं.


उपनिवेश का भोजन पर असर
सिर्फ ब्रिटेन ही नहीं कई यूरोपीय देशों और अमेरिका ने भी कई देशों या द्वीपों को अपनी कॉलोनियों के तौर पर उपनिवेश किया या गुलाम रखा. इस तरह के हालात के चलते भी खानपान का अच्छा खासा आदान प्रदान हुआ क्योंकि कॉलोनी में सेना का आना-जाना बना ही रहता था. इससे जुड़ी दो कहानियां बड़ी दिलचस्प हैं.

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जापान का जब ताईवान पर कब्ज़ा था, तब डीप फ्राइड पोर्क को डब्बाबंद ढंग से ट्रेन स्टेशनों पर भेजा जाता था. यह डिश अब भी ताईवान के स्टेशनों पर न सिर्फ मिलती है बल्कि काफी पसंद की जाती है. दूसरी कहानी इसके उलट है जब जापान में चीनी भोजन ने पैठ बनाई. जापान में चाय की परंपराएं हैं, वो चीन से आई हैं, ठीक वैसे ही जैसे जापान का रैमन चीनी नूडल्स से ही विकसित हुआ.

जैसा कि पहले बताया कि ब्रिटेन में जो करी विकसित हुई, वो भारतीय परिवेश के कारण ही मुमकिन हुआ. दिलचस्प यह है कि ब्रिटेन पहला देश था, जिसने सेना के लिए करी को भोजन में शामिल किया था. यह करी एक तरह से दो संस्कृतियों के मिलन से उपजी फ्यूजन डिश थी. जैसे फ्रेंच कॉलोनी के तौर पर वियतनाम में बान्ह मी सैंडविच लोकप्रिय हुआ.

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लोकप्रिय वियतनामी सैंडविच


भारत में अरब और फारस से कई किस्म के मसाले, मेवाएं और भोजन आए जब मुगल या उससे पहले तुर्क आदि भारत पहुंचे. उनकी सेनाओं के साथ कई किस्म की भारतीय भोजन परंपराएं भी मुस्लिम देशों तक पहुंचीं. वास्तव में, वैश्वीकरण के इस समय में भोजन के जो तौर तरीके और चलन दिखाई देते हैं, उनके पीछे युद्धों और बाहरी शासन व्यवस्थाओं की बड़ी भूमिका रही है.
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