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Nehru@130: अपने पैसे किसको देते थे जवाहर लाल नेहरू, खातों में थी कितनी रकम

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: November 14, 2019, 8:53 AM IST
Nehru@130: अपने पैसे किसको देते थे जवाहर लाल नेहरू, खातों में थी कितनी रकम
पैसे को लेकर क्या रहता था नेहरू का व्यावहार, कैसे खर्च करते थे अपना धन

अक्सर नेहरू के बारे में कहा जाता था कि वो शाहखर्ची थे, विलासितापूर्ण जीवन बिताते थे. 20 साल तक उनके निजी सचिव रहे एमओ मथाई उनके वित्तीय मामलों का पूरा हिसाब रखते थे. बाद में उन्होंने अपनी एक किताब में विस्तार से नेहरू के खर्चों का जिक्र किया. ये भी बताया कि उनके खाते से पैसे किसको दिए जाते थे और धन कहां से उनके पास आता था

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  • Last Updated: November 14, 2019, 8:53 AM IST
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अक्सर हम ये चर्चाएं सुनते हैं कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru)  के पास बहुत धन था. वो लग्जरी लाइफ जीते थे. काफी पैसा खर्च करते थे. करीब 20 साल तक नेहरू के निजी सचिव रहे एमओ मथाई (M O Mathai) ने इसका उलटा पाया. उन्होंने महसूस किया कि नेहरू ऐसे शख्स थे जो खुद पर बहुत कम पैसा खर्च करते थे. आखिर नेहरू के पास कितना धन था. वो इसका करते क्या थे.

एमओ मथाई की चर्चित किताब "रेमिनिसेंस ऑफ नेहरू एज" (Reminiscences of the Nehru Age) में 21वें अध्याय का नाम है, "नेहरू एटीट्यूड टू द मनी". इसमें मथाई ने विस्तार से लिखा है कि दरअसल नेहरू की कमाई क्या थी. वो धन का करते क्या थे.

मथाई लिखते हैं, "1946 में जिस समय मैने निजी सचिव के तौर पर नेहरू का कामकाज संभाला, उस समय उनके वित्तीय मामले मुंबई की बछराज एंड कंपनी देखती थी. ये प्रसिद्ध उद्योगपति जमनालाल बजाज की एक प्राइवेट कंपनी थी. नेहरू ने मुझसे कहा कि मैं इस कंपनी में जाऊं और उनके फाइनेंस की स्टडी करूं. " कुछ समय बाद ये काम मथाई के पास आ गया.

उस समय नेहरू के पास पिता से मिली संपत्ति और किताबों की रॉयल्टी से आने वाला पैसा था. यूरोप और अमेरिका से उनकी किताबों की रॉयल्टी का काम वीके कृष्णा मेनन के सुपुर्द था. इसमें मोटा पैसा आता था. 02 सितंबर 1946 में नेहरू जब अंतरिम सरकार के प्रमुख बने, तब उनके पास पिता से मिली संपत्ति और पैतृक मकान के अलावा बैंक में जो धन था, वो करीब डेढ़ लाख रुपए था.



उसी समय उनकी किताब "डिस्कवरी ऑफ इंडिया" प्रकाशित होने वाली थी. जिसके भारत में प्रकाशन के अधिकार मेनन से लेकर भारतीय प्रकाशक को दिए गए. ये किताब खूब बिकी.

किताबों की बिक्री के साथ रॉयल्टी की रकम भी बढ़ी. नेहरू के धन में इजाफा हुआ. आमतौर पर इस पैसे को वो दो जगह भेज देते थे. एक अपनी बेटी इंदिरा के खाते में और दूसरी पत्नी की याद में बने इलाहाबाद के कमला नेहरू मेमोरियल अस्पताल को. इसी दौरान उन्होंने दोनों नातियों राजीव और संजय के नाम से भारत सरकार की स्माल सेविंग योजना में 25000-25000 रुपए जमा किये.
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नेहरू नहीं लेते थे इनकम टैक्स रिफंड
मथाई ने आगे लिखा, "इसी दौरान एक दिन केंद्रीय राजस्व बोर्ड के चेयरमैन एके रॉय उनके पास आए. उन्होंने कहा कि नेहरू की किताबों पर रॉयल्टी का जो पैसा आ रहा है. उस पर वो इनकम टैक्स भरते हैं लेकिन अगर वो चाहें तो इस पर उन्हें 15 फीसदी रिफंड मिल सकता है. बशर्ते वो अपने निजी सचिवालय के खर्च को दिखाएं. ऐसा करने पर उन्हें पिछले पांच सालों का रिफंड एक साथ मिल सकता है."

नेहरू की निजी सेवा में दिल्ली के अलावा आनंद भवन इलाहाबाद में कई कर्मचारी थे. जिनका खर्च वो वहन करते थे. जब मथाई ने उनसे टैक्स रिफंड की चर्चा की तो उन्होंने साफतौर पर मना कर दिया. लेकिन मथाई द्वारा ये बताने पर वो रिफंड की रकम को निजी स्टॉफ के वेलफेयर पर खर्च कर सकते हैं तो नेहरू ने तैयार रखे रिफंड के कागजात पर दस्तखत कर दिए.

रिफंड की रकम से खुला इम्प्लाई वेयरफेयर अकाउंट
पांच सालों की रिफंड की जो रकम आई, वो खासी मोटी थी. इस रकम से नेहरू ने  इम्प्लाई वेयरफेयर अकाउंट खोला. इससे उनके दिल्ली और आनंद भवन के कर्मचारियों की बहुत मदद हुई. ये वेलफेयर अकाउंट बाद में भी बरसों तक चलता रहा.

यूरोप से ज्यादा कम्युनिस्ट देशों से आती थी रॉयल्टी की रकम
अक्सर सोवियत संघ और अन्य देश नेहरू की किताबों के अंश या किताबें अपने यहां प्रकाशित करना चाहते थे. नेहरू सहर्ष इसकी अनुमति दे देते थे. मथाई ने उनसे कहा कि वो इसकी अनुमति तो बेशक दें लेकिन इन मामलों पर अपनी रजामंदी के बाद उन्हें बातचीत करने दें. मथाई आमतौर पर इन देशों से कहते थे कि आप बेशक इन्हें प्रकाशित करें लेकिन ब्रिकी से हासिल रकम का 15 फीसदी रॉयल्टी के तौर पर दें. किसी भी देश को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी.

नेहरू के पास किताबों की रॉयल्टी का मोटा पैसा आता था, जिसे वो मुख्य तौर पर तीन खातों में ट्रांसफर कर देते थे. इसमें उनकी बेटी इंदिरा गांधी, इलाहाबाद का कमला नेहरू मेमोरियल हास्पिटल और उनके निजी कर्मचारियों के लिए बना इम्प्लाई वेलफेयर अकाउंट शामिल था.


मथाई ने लिखा, बाद में हालत ये हो गई कि यूरोप से नेहरू को किताबों की रॉयल्टी का जितना पैसा नहीं मिलता था, उससे ज्यादा रकम कम्युनिस्ट देशों से उनकी किताबों पर आती थी.
इस सारे पैसे को आमतौर पर तीन हिस्सों में बांटा जाता था. कुछ हिस्सा इंदिरा गांधी के खाते में जमा होता था. बाकी दो हिस्से कमला नेहरू हास्पिटल और इम्प्लाई वेलफेयर अकाउंट में जाते थे.

खुद पर बहुत कम खर्च करते थे
मथाई लिखते हैं, " नेहरू खुद पर बहुत कम रकम खर्च करते थे. उनका विश्वास खुद पर ज्यादा खर्च करने का था ही नहीं. लेकिन गांधीजी की महंगी पेंटिंग्स भी खरीद लेते थे."
किताब में लिखा गया, "नेहरू ने प्रधानमंत्री होने से पहले और बाद शायद कभी किसी से कोई निजी कामों के लिए पैसा मांगा हो या फिर किसी से व्यक्तिगत तौर पर कहा हो कि वो अपना पैसा इस बेहतर काम में लगाएं. वो किसी भी तरह के दान को स्वीकार करने से मना कर देते थे. चाहे उसके किसी भी मकसद से दिये जाने की बात हो. हां, अगर सार्वजनिक तौर पर उन्हें सियासी या जन कल्याण के लिए कोई रकम दी जाती थी तो वो इसको स्वीकार करते थे.

एक बार तोड़ी थी ये शर्त 
एक बार उन्होंने अपनी इस शर्त को तोड़ा. दरअसल सर स्टनफोर्ड क्रिप्स के निधन के बाद लंदन की एक समिति ने उनसे अनुरोध किया कि क्रिप्स का स्मारक बनाने के लिए भारत से भी एक टोकन अमाउंट दिया जाए तो बेहतर रहेगा. तब नेहरू ने पहली बार हैदराबाद के निजाम, नवाशहर के जाम साहब और अन्य बड़े व्यावसायियों और राजाओं को एक पत्र लिखकर छोटे दान देने की अपील की थी. इससे कुल मिलाकर 5000 पाउंड की रकम जुटाई गई थी, जिसे लंदन में संबंधित समिति को भेज दिया गया.

करीब 20 सालों तक उनके निजी सचिव रहे एमओ मथाई ने अपनी किताब में लिखा, नेहरू ऐसे शख्स थे, जो खुद पर कम से कम पैसा खर्च करते थे


तब भोपाल के नवाब ने 50 हजार का चेक भेजा
जब देश में पहले आम चुनाव होने वाले थे तब भोपाल के नवाब ने नेहरू के पास विजयलक्ष्मी पंडित के हाथों 50,000 रुपए का चेक भिजवाया ताकि इसका उपयोग चुनाव में किया जा सके. नेहरू इस चेक को वापस भेजना चाहते थे लेकिन उन्हें लगा कि ऐसा करने से भोपाल के नवाब को बुरा लग सकता है तो उन्होंने चेक को अपने चुनाव प्रबंधन प्रभारी लालबहादुर शास्त्री को दे दिया.

शरणार्थियों को निजी तौर पर नगद मदद देते थे
1946 के बाद जब दिल्ली में शरणार्थियों के आने की संख्या बढ़ने लगी तो नेहरू जब उनके पास जाते थे तो जेब में कुछ रकम भी लेकर जाते. जो जरूरतमंद लगता उसे कुछ रकम दे देते. जल्दी ही लगने लगा कि ऐसा करने पर तो नेहरू के पास शायद ही धन बचे. तब मथाई ने उन्हें ऐसा नहीं करने की सलाह दी. इसे उन्होंने दरकिनार कर दिया. हालांकि बाद में मथाई ने सरकार के अफसरों से विचार विमर्श कर इसकी व्यवस्था सरकार की ओर से करा दी और इसका एक सिस्टम भी बना दिया गया.

धन के मामलों में बहुत सतर्क रहते थे
मथाई लिखते हैं, नेहरू इस बात को लेकर बहुत सतर्क रहते थे कि धन के मामलों में उनके हाथ बहुत साफ रहें, लेकिन उन्होंने कांग्रेस के लिए फंड जुटाने वालों पर कभी एतराज नहीं किया.
जब 24 मई 1964 को नेहरू का निधन हुआ तो अपने पीछे इलाहाबाद में अपना पैतृक मकान आनंद भवन और व्यक्गित अकाउंट में पर्याप्त धन छोड़ गए थे कि उनके निजी कर्मचारियों का खर्च उठाया जाता रहे.

जब उनका निधन हुआ तो उनके पास पैतृक मकान आनंद भवन के अलावा बैंक खाते में काफी धन था


तब अपनी बहन से धन वापस कराया 
मथाई ने इसी किताब में एक अन्य जगह लिखा, एक बार ये पता लगा कि उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित ने अमेरिका में राजदूत होते हुए काफी बड़े निजी खर्च किए हैं. इसकी अदायगी सरकारी फंड और उद्योगपति बिरला से मिले धन से हुआ है. नेहरू ने गुपचुप जांच कराई. विजयलक्ष्मी को ये रकम टुकड़ों टुकड़ों में वापस करनी पड़ी.
इसी मामले में जब मथाई सच्चाई जानने के लिए बिरला से मिले तो एक और रोचक जानकारी हासिल हुई. बिरला की कंपनी ने एक रजिस्टर बनाया हुआ था, जिसमें तकरीबन सभी बड़े कांग्रेसी नेताओं के नाम और समय-समय पर उन्हें दी जाने वाली रकम लिखी जाती थी. ये रकम अक्सर नेताओं को आर्थिक मदद या उनके निजी स्टाफ के खर्चों के रूप में दी जाती थी. इसमें गांधीजी से लेकर पटेल तक के नाम शामिल थे, केवल एक ही नेता इसमें शामिल नहीं था और वो थे नेहरू जी.

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First published: November 14, 2019, 8:45 AM IST
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