कितनी कष्टपूर्ण होती है कपिंग थैरेपी, जो बिग बॉस फेम असीम रियाज ने कराई

कपिंग थैरेपी में इस तरह कप को रखकर उसमें ऊपर की ओर लगे ज्वलनशील तत्व में आग लगाई जाती है.

कपिंग थैरेपी में इस तरह कप को रखकर उसमें ऊपर की ओर लगे ज्वलनशील तत्व में आग लगाई जाती है.

बिग बॉस 13 के उप विजेता असीम रियाज ने हाल ही में कपिंग थैरेपी कराई है. ये जानकर उनके प्रशंसक हैरान हैं. दरअसल ये थैरेपी प्राचीन तो है लेकिन कष्टपूर्ण भी, इसमें त्वचा जल जाती है. उसमें छोटे छोटे कट लगाए जाते हैं. ईसापूर्व ये थैरेपी मिस्र और चीन जैसे देशों में रक्तविकार को दूर करने में इस्तेमाल की जाती थी.

  • News18India
  • Last Updated: March 24, 2021, 8:53 PM IST
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बिग बॉस 13 के उपविजेता असीम रियाज ने हाल ही में कपिंग थैरेपी कराई है. सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले असीम ने जब इसकी तस्वीरें इंस्टाग्राम पर डालीं तो उनके समर्थक हैरान रह गए, क्योंकि ये थैरेपी आसान नहीं होती, बल्कि आपकी त्वचा को जला देती है. इससे काफी दर्द भी होता है. कुल मिलाकर ये कष्टपूर्ण थैरेपी है.

जानते हैं कि ये थैरेपी क्या है. कब से इस्तेमाल हो रही है, इसके फायदे क्या हैं. विज्ञान और शोध इस थैरेपी को लेकर क्या कहते हैं. ये थैरेपी ईसा पूर्व 1550 में मिस्र और चीन के साथ मध्य पूर्व के देशों में इस्तेमाल की जाती थी.

चिकित्सा विज्ञान पर लिखी गई सबसे ्प्राचीन पुस्तकों में एक द इबर्स पापरेस बताती है कि मिस्र में प्राचीन समय में इसका खासा प्रचलन था. लोग त्वचा और रक्त संबंधी विकारों और बीमारियों से निपटने के लिए इस थैरेपी का सहारा लेते थे. हालांकि अब भी ये थैरेपी कई देशों में वैकल्पिक चिकित्सा के तौर पर प्रचलित है. हालांकि विज्ञान इसके बारे में बहुत ज्यादा कुछ नहीं कहता.

बिग बॉस 13 के उपविजेता असीम रियाज ने कपिंग थैरेपी के बाद अपनी तस्वीर इंस्टाग्राम पर डाली. फिलहाल उनकी पीठ की स्थिति इस तरह है.

कपिंग थैरेपी, जैसा नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें त्वचा पर खास तरह के कप रखकर इलाज किया जाता है, इन कप में वैक्यूम जैसी स्थितियां पैदा की जाती हैं और तब ये त्वचा को चूसने जैसी प्रक्रिया करने लगते हैं. हालांकि इस थैरेपी का इस्तेमाल कई उद्देश्यों के लिए किया जाता है.

किन मामलों में इसका उपयोग

दर्द से उबरने



सूजन और जलन के मामलों में

रक्त प्रवाह को बेहतर करने में

स्वस्थ रहने के लिए

किस तरह के कप इस्तेमाल होते हैं

ये एक तरह का डीपू टिश्यू मसाज है. इसमें कई तरह के कप इस्तेमाल होते हैं. जो आमतौर पर इन चीजों के बने होते हैं.

कांच

बांस

मिट्टी

सिलिकन

आजकल ये थैरेपी काफी लोकप्रिय है. ट्रेंड में है. प्राचीन संस्कृतियों में इस थैरेपी के जरिए चिकित्सा किए जाने का उल्लेख है.इसमें भी कपिंग दो तरह की इस्तेमाल की जाती हैं. एक सूखी और दूसरी गीली.

कपिंग थैरेपी के जरिए रक्त के विकारों, त्वचा संबंधी रोगों आदि समेत कई बीमारियों को ठीक करने का दावा किया जाता है.


क्या है प्रक्रिया

थेरेपिस्ट कप में अल्होकल, जड़ी-बूटियां या पेपर डालकर इसमें आग लगाता है और फिर कप को उल्टा करके त्वचा पर रख दिया जाता है. जब कप की हवा ठंडी होने लगती है तो वैक्यूम बनने लगता है और फिर त्वचा को अपनी खींचने लगती है. इससे रक्त नसिकाओं विस्तार होने लगता है. रक्त का प्रवाह बढ़ जाता है. आमतौर पर इस कप को 03 मिनट के लिए रखा जाता है. जिस समय कप को आग के साथ रखा जाता है, तब ये कष्टपूर्ण होता है. हालांकि आग का त्वचा से सीधे संपर्क नहीं होता लेकिन उसकी तपिश और आंच त्वचा पर असर डालती है.

आजकल कपों में आग लगाने की बजाए रबर का पंप लगाकर भी वैक्यूम करने का काम किया जाता है. आमतौर पर थेरेपिस्ट इस काम के लिए सिलिकन कपों का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें वो त्वचा अलग अलग जगह बदलते रहते हैं.

कप हटाने के बाद क्या होता है

कप हटाने के बाद त्वचा के उस हिस्से में उभार नजर आता है, वो कुछ जल भी जाती है, उस पर बहुत छोटे छोटे कट लगाए जाते हैं, वहां से बहुत हल्का खून निकाला जाता है.

कितने कपों का इस्तेमाल

पहले सेशन में 3-5 कपों का इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि 01 कप से भी काम चलाया जा सकता है. ज्यादा से ज्यादा 5-7 कप. जब प्रक्रिया पूरी हो जाती है तो त्वचा पर वहां पर एंटीबॉयोटिक क्रीम और बैंडेज लगा दिया जाता है ताकि इंफेक्शन नहीं हो. 10 दिनों में त्वचा फिर पहले की तरह हो जाती है.

शरीर के टॉक्सिक तत्वों को बाहर निकालती है

इस थैरेपी की सोसायटी कई देशों में बनी हैं. इसके समर्थक मानते हैं कि इसके जरिए शरीर के हानिकारक और टॉक्सिक तत्वों को शरीर से बाहर निकालकर खून को शुद्ध कर दिया जाता है, जिसका सकारात्मक असर स्वास्थ्य, खून विकारों और त्वचा पर पड़ता है. हालांकि विज्ञान में ये बहुत ज्यादा साबित नहीं हुआ है. कुछ लोग नीडल कपिंग भी करते हैं. इसमें पहले एक्यूपंचर तरीके से शरीर में छोटी-छोटी सूइयां चुभोई जाती हैं. फिर उन पर कप रखा जाता है.

शोध क्या कहते हैं

हालांकि इस थैरेपी को लेकर ज्यादा वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है. वर्ष 2015 में जर्नल ऑफ ट्रेडिशनल एंड कंपलीमेंट्री मेडिसिन में कहा गया था कि ये थैरेपी मुहांसों, दाद, दर्द से छुटकारा दिलाने में काम करती है. वर्ष 2012 में भी एक रिपोर्ट में यही निष्कर्ष निकाला गया. ब्रिटिश कपिंग सोसायटी के अनुसार ये थैरेपी निम्न बातों पर लाभप्रद है

दाद

मुहांसे

चेहरे का लकवा

सर्वाइकल स्पोंडोलाइसिस

रक्त डिसआर्डर

आर्थराटिस

फर्टीलिटी और गायनोलाजिक डिसआर्डर

त्वचा की समस्याएं

एंजाइटी और डिप्रेशन

एलर्जी और अस्थमा

वेरिकोज वेन्स

इसके साइड इफेक्ट क्या हैं

इससे कई बार इंफेक्शन, शरीर पर खरोंच जैसी समस्याएं हो जाती हैं. कई बार हल्का सिरदर्द भी हो सकता है. लिहाजा इसे हमेशा प्रशिक्षित थेरेपिस्ट से ही कराना चाहिए. कई बार अगर कप साफ नहीं हों और उसमें खून लगा रह गया हो, तो इससे रक्त संबंधी बीमारियां भी हो सकती हैं. जो गंभीर रूप ले सकती हैं. इसलिए ये सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि ये कप अच्छी तरह स्टर्लाइज किए हों.
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