लालू-राबड़ी के 'जंगल राज' पर फोकस करने का एनडीए का दांव क्यों हो सकता है फेल?

न्यूज़18 क्रिएटिव
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Bihar Election Result 2020 : नौकरी, विकास और शिक्षा के मुद्दों को छोड़ मुफ्त वैक्सीन की घोषणा के साथ ही भाजपा और जेडीयू ने फोकस इतिहास पर रखा और लालू के जंगल राज को जमकर कोसने की रणनीति अपनाई.

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  • Last Updated: November 10, 2020, 9:48 AM IST
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बिहार चुनाव 2020 (Bihar Election 2020) के लिए मतगणना (Vote Counting) शुरू होने के बाद रुझानों का सिलसिला शुरू हो चुका है. इससे पहले, विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इस बार बिहार में नीतीश कुमार की अगुवाई वाली एनडीए सरकार (Bihar Government) के सामने संकट खड़ा हो सकता है. बहरहाल, फाइनल नतीजे आने में अब कुछ ही समय बाकी है तो स्थिति साफ हो ही जाएगी. इस बीच, सोचने का मुद्दा यह है कि इस बार चुनाव में भाजपा और जेडीयू (BJP & JDU) ने नीतीश सरकार (Nitish Kumar Government) को 'सुशासन' के तौर पर प्रोजेक्ट कम किया और लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) व राबड़ी देवी सरकार के समय रहे 'जंगल राज' की खूब चर्चा की.

क्या यह दांव कारगर होगा? इस सवाल के जवाब में सबसे बड़ा पहलू यह है कि इस समय के मुद्दों को छोड़कर इतिहास को याद दिलाने के पीछे जो रणनीति रही, वो कितनी अहम साबित होगी. अस्ल में, बिहार की आबादी और वोटरों की उम्र के आंकड़ों को ध्यान में रखा जाए तो इस सवाल के उत्तर की तरफ इशारा मिलता है.

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क्या है बिहार में वोटरों का गणित?
चुनाव आयोग के डेटा की मानें तो बिहार में इस बार कुल 7.29 करोड़ वोटर हैं. इनमें से 50 फीसदी से ज़्यादा वोटरों की उम्र 18 से 39 साल के बीच है, जबकि 7.14 लाख वोटर 18 से 19 साल के हैं. इसी तरह, 20 से 29 साल की उम्र के वोटर 1.6 करोड़ हैं जबकि 30 से 39 साल के वोटरों की संख्या करीब 2 करोड़ है.

इस डेटा के विश्लेषण से साफ माना जा सकता है कि करीब 3 करोड़ वोटर ऐसे हैं, जो 15 साल पुराने बिहार शासन से सीधा वास्ता या उसका स्पष्ट अनुभव नहीं रखते हैं. गौरतलब है कि पिछले 15 साल से बिहार में नीतीश कुमार और एनडीए सत्ता में हैं.

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युवा वोटरों की संख्या इस बार सेट कर सकती है बिहार की कुर्सी का गणित.


कितना अहम है जंगल राज का मुद्दा?
लालू प्रसाद और उनकी पत्नी राबड़ी देवी के शासन काल के दौरान कानून व्यवस्था के लचर होने की बातें इस बार भी चुनाव के दौरान खूब हुईं. लेकिन, वोटरों के डेटा से साफ है कि युवा वोटरों को इस मुद्दे में ज़्यादा दिलचस्पी न होना स्वाभाविक है. विशेषज्ञ मान चुके हैं कि इस बार चुनाव के मुद्दों में शिक्षा, रोज़गार और विकास की योजनाओं से जुड़े मुद्दे ही जनता के बीच लोकप्रियता हासिल कर सके हैं.

क्या इसलिए तेजस्वी हो गए लोकप्रिय?
कोरोना वायरस महामारी के चलते महानगरों से प्रवासी मज़ूदरों और कामगारों का पलायन बड़ी तादाद में हुआ तो बिहार में बड़ी आबादी दूसरे राज्यों से लौटी. ऐसे में यहां बेरोज़गारी के संकट को मुद्दा बनाना ज़रूरी था. इस मौके का फायदा उठाकर राजद के नेता और लालू व राबड़ी के बेटे तेजस्वी यादव ने थोक के भाव नौकरियां देने का ऐलान कर दिया. सरकारी नौकरी बिहार के युवा वोटरों के लिए सबसे बड़ी घोषणा मानी गई.

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चुनावी रैलियों में उनकी लोकप्रियता के पीछे यह बड़ा कारण रहा. दूसरी तरफ, लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान ने भी 'बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट' जैसे चुनावी नारे देकर भीड़ को आकर्षित किया. इन तमाम रुझानों से साफ समझा जा रहा है कि बिहार का युवा वोटर युवा नेताओं के साथ खड़ा हो सकता है और इतिहास के पन्नों से 'गड़े मुर्दे उखाड़ने' की राजनीति इस बार उल्टा दांव साबित हो सकती है.

जेडीयू के सामने चुनौतियां
विशेषज्ञों की मानें तो बिहार के युवा वोटरों को रिझाने के लिए इस बार न तो जदयू के पास युवा नेता रहे और न ही युवाओं के मुद्दों के ​अनुकूल प्रचार अभियान. युवा वोटरों के साथ जेडीयू का सामंजस्य बनना एक चुनौतीपूर्ण स्थिति ही रही. वहीं, प्रशांत किशोर ने भी जेडीयू के लिए भरसक कोशिशें की हैं लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि बिहार की सियासत में तेज़ी से हो रहे बदलाव के आगे यह भी काफी नहीं होगा.

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अब, बहुत देर नहीं है और जल्द ही सामने आ जाएगा कि युवा वोटरों ने जेडीयू के चुनावी दांव पेंचों को नकारा या फिर चिर प्रतिद्वंद्वी लालू प्रसाद की बखिया उधेड़ने की बाजीगरी को स्वीकारा.
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