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अब कोयले से डीजल बनाकर बिगड़ी किस्मत संवारेगा पाकिस्तान

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: October 21, 2019, 9:30 PM IST
अब कोयले से डीजल बनाकर बिगड़ी किस्मत संवारेगा पाकिस्तान
चीन की मदद से पाकिस्तान करेगा वो काम, जो उसकी डांवाडोल आर्थिक स्थिति को बेहतर करेगा

पाकिस्तान की आर्थिक हालत डांवाडोल है. ऐसे में वो चीन की मदद से ऐसे तरीके पर काम करने वाला है, जिससे वो लाखों-करोड़ों डॉलर बचाकर अपनी हालत को सुधार पाएगा.

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  • Last Updated: October 21, 2019, 9:30 PM IST
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ये हम सबको मालूम है कि पाकिस्तान (Pakistan) की आर्थिक हालत (Economic Condition) बहुत खस्ता है. विदेशी कर्ज चढ़ता जा रहा है. विदेश से कुछ भी मंगाने से पहले उसे ये सोचना होता है कि इसका पैसा वो कहां से लाएगा. उसकी सबसे बड़ी मुश्किल ये भी है कि पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर जो कच्चा तेल आयात (Crude Oil import) किया जाता है. उसकी व्यवस्था वो कैसे करे? ऐसे में चीन (China) ने उसे एक ऐसा रास्ता बताया है, जिससे उसकी मुश्किलें काफी आसान हो सकती हैं. कहा जा रहा है कि ये पाकिस्तान के लिए गेम चेंजर साबित होगा.

चीन की ये बात मानने से ना केवल पाकिस्तान हर महीने मोटी विदेशी मुद्रा के खर्च से बचेगा बल्कि डगमगाती हुई आर्थिक हालात में भी राहत की सांस ले पाएगा. अगर चीन की तरकीब हिट हो गई तो पाकिस्तान अपनी रूठी किस्मत भी चमका सकता है. इस काम में पाकिस्तान की मदद करेगा कोयला (Coal).

ये तो पक्का है कि अगर दुनियाभर में कोयले के इस्तेमाल को सीमित किया जा रहा है या इस पर रोक लगाई जा रही है तो पाकिस्तान की स्थिति भी अलग नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि वो अपना कोयला बड़े पैमाने पर बाहर भेजेगा और उससे बहुत मोटी कमाई करेगा. हालांकि ये बात सही है कि पाकिस्तान के पास बेहतरीन क्वालिटी के लिग्नाइट कोयले की प्रचुरता है.



अब यही कोयला पाकिस्तान के काम आएगा. दरअसल इस कोयले से किस्मत संवारने का मंत्र उसे इसी महीने चीन से मिला है. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान (Pakistan prime minister Imran Khan) इस महीने के शुरू में चीन के दौरे पर गए. वहीं पर उन्हें इस बारे में बताया गया.

अब हम बताते हैं कि वो बात है क्या. दरअसल चीन वो गुर अपने इस पड़ोसी देश को बताने वाला है जिसके जरिए कोयले से द्रव ईंधन (Coal to Liquid) यानि सिंथेटिक डीजल (Synthetic diesel) बनाया जा सकता है. पाकिस्तान ने ये इतने बड़े पैमाने पर बना सकता है कि उसे फिर बाहर से डीजल या फ्यूल ईंधन मंगाने की जरूरत ही नहीं रहेगी. इससे वो रोज बड़ी बचत करेगा.

पाकिस्तान में थार इलाके में प्रचुर कोयला
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वैसे कोयले से तेल बनाने की कहानी नई तो नहीं है लेकिन ये तकनीक अभी अंगुली पर गिने जाने वाले देशों के पास ही है. उसमें चीन भी शामिल है. पाकिस्तान में थार (Thar) से निकलने वाले कोयले की क्वालिटी खासी उम्दा है. साथ ही पाकिस्तान के इस इलाकों में इतना कोयला है कि कई दशक तक इसका दोहन किया जा सकता है.

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बचेगी पाकिस्तान की मोटी रकम
चीन की एक कंपनी पाकिस्तान के थार इलाके में ऐसा प्लांट लगाने जा रही है, जिससे वो इस कोयले को सीधे द्रव हाइड्रोकॉर्बन यानि सिंथेटिक डीजल में बदलेगी. पाकिस्तान हर महीने छह लाख टन डीजल बाहर से आयात करता है. इसके लिए उसे बहुत मोटी कीमत देनी पड़ती है. लेकिन अब वो ये बड़ी रकम बचा सकेगा. जिसका इस्तेमाल दूसरे कामों में हो सकेगा.

कोयले से द्रव ईंधन बनाने वाला संयत्र


बताया जाता है कि कोयले से जो लिक्विड ईंधन बनाया जाता है, वो विमानों को उड़ाने के साथ वाहनों को चलाने में इस्तेमाल किया जा सकता है. चीन तो अब खुद बड़े पैमाने पर कोयले को द्रव ईंधन में तब्दील कर अपनी घरेलू खपत में लगा रहा है. चीन की एक बड़ी शेनहुआ निंगशिया कोल इंडस्ट्री के पास इस काम की तकनीक है.

नई नहीं है ये तकनीक लेकिन कम देशों में इस्तेमाल
हालांकि ये तकनीक नई नहीं है बल्कि दुनिया में करीब सौ साल पहले लाई जा चुकी है लेकिन अभी इसका बहुत कम देशों में है. कोयले को द्रव में बदलने की प्रक्रिया को सीटीएल कहते हैं यानि कोल टू लिक्विड (CTL). इसके भी दो तरीके हैं-आईसीएल (ICL)और डीसीएल (DCL). आईसीएल मतलब इनडायरेक्ट कोल लिक्वाफिकेशन और डीसीएल मतलब डायरेक्ट लिक्वाफिकेशन. दरअसल कोयले को जब द्रव में बदलते हैं तो हाई क्वालिटी गैसोलिन बनती है. इसका इस्तेमाल विमानों के ईंधन में होता है. आटोमोबाइल भी इससे चलाए जा सकते हैं.

जर्मनी के दो केमिस्टों ने खोजा था ये तरीका 
जर्मनी के दो केमिस्टों फ्रेंच फिशर और हांस ड्रॉप्स ने इसे 1920 से अपने प्रयोगों के जरिए बनाया. फिर ये तरीका जर्मनी के बहुत काम आया. दूसरे विश्व युद्ध में हिटलर ने इसे बहुत ज्यादा इस्तेमाल किया. हिटलर ने 1936से लेकर अगले चार सालों तक कोयले से द्रव ईंधन बनाने को प्राथमिकता में रखा. इसके कई प्लांट वहां लगाए गए थे.

जर्मनी के नाजी नेतृत्व ने दूसरे विश्व युद्ध के समय कोयले से द्रव ईंधन बनाकर उसका प्रचुर इस्तेमाल किया


बताया जाता है कि दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी के 90 फीसदी से ज्यादा विमान इसी के जरिए चलाये जाते थे. साथ ही इसी से वो सेना के वाहनों को चलाते थे. जर्मनी ने इसका बहुत इस्तेमाल किया लेकिन जब विश्व युद्ध में उसकी हार हुई तो गठबंधन देशों ने उसके कोयले से तेल बनाने पर रोक लगा दी.

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क्या है प्रोसेस का तरीका 
कोयले से तेल बनाने के तरीके डायरेक्ट प्रोसेस कार्बोनाइजेशन, पिरोलाइसिस और हाइड्रोजेनेशन का सहारा लिया जाता है. वहीं इनडायरेक्ट लिक्वाफिकेशन में कोयले को गैस में बदलते हैं. ये कॉर्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन का मिश्रण होती है.

डायरेक्ट तरीके में कोयले को बगैर बीच का कोई प्रोसेस किये सीधे आर्गनिक संरचना को तोड़कर द्रव में बदल दिया जाता है, इसमें हाइड्रोजन  डोनर साल्वेंट का इस्तेमाल किया जाता है. अक्सर ये प्रक्रिया अत्यधिक दबाव और तापमान पर होती है.

पाकिस्तान में थार इलाके की कोयला खदान से निकलने वाले लिग्नाइट कोयले से चीन डीजल बनाने का प्लांट लगाने जा रहा है. इससे पाकिस्तान को खासा फायदा होगा


तापमान 360 डिग्री से 750 डिग्री सेंटीग्रेड तक चला जाता है.  इसके बड़े प्लांट लगाने के लिए बड़ी पूंजी की जरूरत होती है. हालांकि अब तक लोग इस तकनीक की इकोनॉमिक औचित्य पर सवाल उठाते रहे हैं.

अमेरिका में दो दर्जन बड़े प्लांट
हालांकि अमेरिका में करीब दो दर्जन बड़े प्लांट कोयले को सिंथेटिक डीजल और गैसोलिन में बदलने का काम कर रहे हैं. अमेरिका में अपने कोयले का इस्तेमाल अब इसी काम में कर रहा है. अमेरिका में भी कोयले से बनाया लिक्विड ईंधन बड़े पैमान में विमानों और सेना के वाहनों में प्रयोग किया जा रहा है.

दक्षिण अफ्रीका ने 1950 के दशक में इस तकनीक के जरिए अपने कोयले को द्रव ईंधन में बदलने का काम शुरू किया. दक्षिण अफ्रीका में कोई अपना ऑयल सोर्स नहीं है. वो अब भी ऐसा कर रहे हैं. इसके बाद 1970 के दशक में जापान की कई कंपनियों ने कोयले से द्रव ईंधन का उत्पादन शुरू किया. अब ये तकनीक इन देशों के अलावा चीन और आस्ट्रेलिया के पास है.

चीन में कोयले से डीजल बनाने का काम शेनहुआ निंगशिया कोल इंडस्ट्री कंपनी करती है. यही कंपनी पाकिस्तान में प्लांट लगाने जा रही है


भारत में भी शुरू किया गया था पॉयलट प्रोजेक्ट 
माना जा रहा है कि दूसरे वो देश भी इस ओर कदम बढा सकते हैं, जहां कोयले की बहुलता है. भारत में भी साइंटिफिक रिसर्च संस्था सीएसआईआर यानि कौंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (Council of Scientific and Industrial Research) ने दो साल पहले ऐसा पॉयलट प्रोजेक्ट शुरू किया था. इसके परिणाम उत्साह देने वाले हैं.

भारत में कोयले की प्रचुरता है. सीटीएल यहां पर वैकल्पिक ऊर्जा का बड़ा स्रोत बन सकता है. दक्षिण अफ्रीकी कंपनी सासोल भारत में ऐसे प्लांट लगाने की इच्छुख भी है. उसने टाटा के साथ ऐसे संयुक्त उपक्रम लगाने में दिलचस्पी दिखाई थी. इसकी उत्पादन क्षमता प्रतिदिन 80,000 बैरल तेल की प्रस्तावित थी. वहीं जिंदल स्टील एंड पॉवर ( Jindal Steel and Power) ने जर्मन कंपनी के साथ मिलकर 80,000 बैरल तेल प्रतिदिन उत्पादन करने का प्रस्ताव दिया था. ये दोनों प्रस्ताव ओडिशा के लिए थे.

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First published: October 21, 2019, 9:21 PM IST
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