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ठंड में कितना कठिन जीवन जीते हैं देश के इस कोने में लोग?

कश्मीर में चिल्लई कलां का दौर जारी है.
कश्मीर में चिल्लई कलां का दौर जारी है.

उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड (North India Winters) और जम्मू व कश्मीर में चिल्लई कलां (Chillai Kalan in Kashmir) की खबरों के बीच जानिए कैसे कांगड़ी (Kanger) यहां जान बचाती है. हाड़ कंपाने वाली सर्दी के करीब 50 दिन किस तरह काटे जाते हैं, मरने के हालात में कैसे जिया जाता है...

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 6, 2021, 11:22 AM IST
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कश्मीर में ठंड कोई मौसम (Winters in Kashmir) नहीं, बल्कि जीने का एक तरीका है. लेकिन चिल्लई कलां के 40 दिनों के दौरान यहां कई जगहों पर जीना किसी जंग से कम नहीं होता. आम तौर पर 21 दिसंबर से 31 जनवरी के बीच कश्मीर में सबसे ठंडे (Coldest Days in Kashmir) दिन होते हैं, जिन्हें चिल्लई कलां के नाम से जाना जाता है. इस दौरान पारा -10 से -20 डिग्री तक नीचे गिर जाता है और लोग एक तरह से घरों में ही कैद होकर रह जाते हैं. इस वक्त में कांगड़ी, फेरन (Pheran), गब्बा और गद्दों के ​बगैर यहां जीने की कल्पना करना भी मुश्किल है.

पूरी वादी बर्फ से नहाती है, कानों को सुन्न करती हवा बहती है और भीतरी आग कम पड़ती है तो बदन को गर्म रखने के लिए लकड़ियां सुलगाना होती हैं. मौसम की सनक पर तय करता है कि आप कब यहां घर से बाहर निकल सकते हैं. सड़कें, हाईवे बंद हो जाते हैं और कश्मीर एक तरह से दुर्गम द्वीप बन जाता है. देखिए, यहां किस तरह इस मौसम से जूझा जाता है. ताज्जुब हो सकता है कि यह मौसम ही जीने की ऊर्जा भी बन जाता है.

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कैसे गले पड़ता है ये मौसम?
चिल्लई कलां या कश्मीर में इसे चिले कलां और चिलिया कलां के नाम से भी पुकारा जाता है, कश्मीर और लद्दाख में यह मौसम यूं तो 40 दिन का माना जाता है, लेकिन होते होते ही खत्म होता है. चिल्लई कलां के बाद उतार की ठंड यानी चिल्लई खुर्द का दौर आता है जो 31 जनवरी से 19 फरवरी के बीच रहता है और फिर 10 दिन और चिल्लई बाचा के होते हैं यानी जाती या मामूली ठंड के. यानी मार्च से पहले ठंड से राहत कम ही रहती है.

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बर्फ गिरने से कश्मीर में रास्ते बंद हो जाते हैं.


इस मौसम में कश्मीर के कई इलाकों में बिजली की समस्या इस तरह बनी रहती है कि लोगों को आग का इंतज़ाम पहले ही करके रखना होता है. सिर्फ आग ही नहीं, बल्कि अगले करीब दो महीनों के लिए खाने पीने और ओढ़ने बिछाने आदि की तैयारी भी पहले ही करना होती है क्योंकि चिल्लई कलां आपको कहीं जाने की इजाज़त नहीं देती. दे भी तो ज़रूरी बाज़ार खुला हो, यह भी मुश्किल होता है.

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यह मौसम कांगड़ी, फेरन और गब्बा आदि के सहारे ही कटता है. गब्बा एक तरह का पारंपरिक ऊनी फर्श होता है. फेरन ठंड के मौसम के लिए खास गर्म पहनावा है और कांगड़ी एक छोटी सी सिगड़ी जैसी होती है, जिसे कांगेड़ भी कहा जाता है और इसे लोग कपड़ों के भीतर रखते हैं ताकि शरीर में गर्मी बनी रही. यह इतने सुंदर होते हैं कि बाकी मौसमों में डेकोरेशन और कलाकृति के तौर पर बेचे भी जाते हैं.

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कैसे ऊर्जा देता है कठिन मौसम?
एक तरह से यह दौर कश्मीरियों को उनकी जड़ों से जोड़ता है. चूंकि लगभग पूरी आबादी घरों में ही कैद हो जाती है तो हैंडलूम, कशीदाकारी, बुनाई और हैंडीक्राफ्ट के लिए सबके पास वक्त होता है. तरह तरह की कलाकृतियां और ज़रूरत के सामान बनाए जाते हैं. ठंड से बचने के लिए घरों में प्लास्टिक से बंद की गई खिड़कियों के पीछे कलाओं का एक कारखाना चल रहा होता है.

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कश्मीर में बर्फबारी की एक तस्वीर.


घरों में कश्मीरी सिगड़ियां सुलगती रहती हैं और मोटी रजाइयों के भीतर बच्चे दुबके रहते हैं. ज़्यादातर कश्मीरियों के लिए कांगड़ी जीवन बन जाती है तो कुछ अमीरों के जीवन में गर्म हमाम यानी गर्म पानी से नहाने का इंतज़ाम भी दिखता है. बिजली सप्लाई ठीक न होने से ज़्यादातर कश्मीरियों को पानी गर्म करने के लिए खासी मशक्कत करना पड़ती है, लेकिन कोयला, लकड़ियां और कबाड़ इस वक्त काम आता है.

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जमा देने वाली ठंड में कला एक और छोर से पिघलती है. एमएफ हुसैन ने जिनकी कविताओं पर तस्वीरें बनाईं, कश्मीर के प्रमुख कवि आगा शाहिद अली के शब्दों में कश्मीर का नज़ारा कुछ इस तरह का होता है :

बर्फ इस तरह रोशनी बनकर गिरती है जैसे किसी प्रेेमी की नज़र टकटकी लगाए हो. कितनी दूधिया रुत है ये! सदाबहार हरियाली पर जैसे नमक छिड़क दिया गया हो... सिर्फ प्यार ही प्यार पहाड़ों की रिदा पर बिछा रहता है.


एक तरफ कश्मीर में बागीचे लहलहाते हैं तो सर्दियों के मौसम में नदियों में बर्फ से पानी की भरपाई हो जाती है. एक रिपोर्ट के मुताबिक कश्मीरी कलाकार मसूद हुसैन ने कहा था कि ठंड यहां ​क्रिएटिविटी पैदा करती है. 'लोग समझते हैं कि ऐसे मौसम से डिप्रेशन होता है, लेकिन कलाकारों का नज़रिया कुछ और है.' हुसैन के शब्दों को ज़रा गंभीरता से समझिए :

हम जमे हुए पानी में उभरते और तैरते पैटर्न और रंग देख सकते हैं... 1989 के बाद से कश्मीर में जो हालात रहे हैं और यहां के लोगों के मन जिस तरह से बने हैं, उनका वास्तविक प्रति​बिंब आप जाड़े के इस ठहराव से बेहतर समझ सकते हैं.


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डल झील में जमी बर्फ.


अब वो जाड़ा कहां!
एक फैक्ट यह भी है कि 1980 के दशक में कश्मीर में चिल्लई कलां के दौर में न्यूनतम तापमान -9 और अधिकतम -6.6 डिग्री के आसपास दर्ज किया जाता था. 1960 के दशक में तो चिल्लई कलां कई जानें लेकर जाती थी, तो 1980 के दशक में पूर्व सीएम फारुक अब्दुल्ला ने बर्फ से जमी डल झील में जीप तक चला दी थी. और अब, पिछले करीब 10 सालों के दौरान यहां ग्लोबल वॉर्मिंग और प्रदूषण का असर बढ़ा है इसलिए झील जमने की नौबत मुहाल है और ठंडक पहले के मुकाबले हल्की ही सही, कम हुई है.
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