कल्याणजी भगत के सामने कैसे रतन खत्री ने कैसे जमाया था 'मटके का धंधा'

कल्याणजी भगत के सामने कैसे रतन खत्री ने कैसे जमाया था 'मटके का धंधा'
रतन खत्री ने शुरुआती सालों में कल्याणजी (दाएं) के साथ काम किया था.

मटका कारोबार के गैरकानूनी धंधे में 1960 के दशक में बस दो नाम थे एक कल्याणजी भगत (Kalyanji Bhagat) और दूसरा रतन खत्री (Ratan Khatri). माना जाता है कि 1950 के दशक के अंत में कल्याणजी भगत ने इस धंधे को शुरू किया लेकिन इस पेशे का नेटवर्क फैलाया रतन खत्री ने.

  • Share this:
मटका किंग के नाम से मशहूर रहे रतन खत्री का मुंबई में निधन हो गया. वो 88 साल के थे. मटके का धंधा और रतन खत्री कई दशक तक एक-दूसरे के हमनाम बने रहे. मूल रूप से पाकिस्तान के कराची से ताल्लुक रखने वाले रतन खत्री भारत-पाकिस्तान बंटवारे के समय में भारत आए थे. मुंबई आने के बाद युवा रतन खत्री ने कई धंधों में हाथ आजमाया. लेकिन उनकी जिंदगी के रास्ते तब बदले जब उनकी मुलाकात भारत के सही मायनों में पहले मटका किंग कल्याण जी भगत से हुई.

कौन थे कल्याण जी भगत
गुजरात के कच्छ इलाके से ताल्लुक रखने वाले कल्याण जी भगत भी 1941 में मुंबई आए थे. भगत ने भी तकरीबन 15 सालों तक कई पेशों में हाथ आजमाया लेकिन कुछ खास सफलता नहीं मिली. इस बीच उन्होंने किराना स्टोर मैनेजर से मसाले बेचने तक का काम किया. लेकिन फिर उन्होंने न्यूयॉर्क और बॉम्बे कॉटन मार्केट के खुलने और बंद होने पर बेटिंग बुकी का धंधा शुरू किया. एक समय ऐसा भी आया जब भगत को ये लगने लगा कि अब इस मार्केट के बारे में उन्हें काफी कुछ पता चल गया है. कॉटन के दाम का अनुमान लगाना उनके लिए आसान हो गया था. यहीं से शुरू हुआ असली मटके का खेल.

प्रतीकात्मक तस्वीर




कल्याण जी के बेटे विनोद भगत ने एक अखबार को दिए इंटरव्यू में बताया था कि मटका नाम कल्याण जी ने इसलिए रखा था क्योंकि इस धंधे का खयाल जब लोग सड़क पर किसी जगह पर लोगों को मटका से चिट निकाल कर बेटिंग करते देखा था. लेकिन इस खेल में वास्तविकता में कभी मटके का इस्तेमाल नहीं हुआ.



कल्याण जी और रतन साथ
कल्याण जी ने बॉम्बे में जब इस मटका बेटिंग को स्टार्ट किया था तब कहा जाता है कि शुरुआती धंधा रतन खत्री ही मैनेज किया करते थे. इस वर्ली मटका कहा जाता था. रतन खत्री एक तरीके से कल्याण जी के मैनेजर थे. मटका में न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज (New York Cotton Exchange) में सूत के खुलने और बंद होने के दामों पर सट्टेबाजी की जाती थी. 1960 के दशक में ये मुंबई के समाज के हर वर्ग के बीच लोकप्रिय था. लेकिन फिर 1962 में न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज ने ये प्रक्रिया बंद कर दी. अब मटके का धंधा तकरीबन बंद होने वाला था.

रतन खत्री ने फिर शुरू किया धंधा
कहते हैं इसके बाद रतन खत्री ने सिर्फ कॉटन एक्सचेंज से हटकर अन्य चीजों पर भी बोलियां लगवानी शुरू की थीं. कहा जाता है कि इसे बाद मटके के धंधे ने तेजी पकड़ी और रतन खत्री भी कल्याण जी से अलग हो गए. अब मटका बिजनेस में रतन खत्री का भी नाम चमकने लगा था.

प्रतीकात्मक तस्वीर


रतन मटका
कल्याण जी से अलग हटकर रतन मटका की शुरुआत हुई. भारत में जुए के गैरकानूनी होने के बावजूद मुंबई में मटका कोरोबार पनपता ही गया. ये कारोबार होता भले ही मुंबई में था लेकिन इस पर बोलियां देश के कई कोनों से लगती थीं. एक तरफ जहां कल्याण जी अपने मटका कारोबार को छुपाकर रखना चाहते थे वहीं रतन खत्री के बारे कहते हैं कि उन्होंने इसका प्रचार किया. मुंबई मिरर अखबार में प्रकाशित एक रिपोर्ट कहती है कि 1974 में इस मटके के धंधे का डेली का टर्नओवर एक करोड़ रुपए तक पहुंच गया था.

इमरजेंसी में गिरफ्तारी
जब 1975 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी घोषित की थी तब रतन खत्री को भी पकड़कर जेल में डाल दिया गया था. 19 महीने तक जेल में रहने के दौरान तब खत्री का धंधा का काफी हद तक छिन्न-भिन्न हो गया था. लेकिन फिर कहते हैं कि जेल से छूट कर आने के बाद उन्होंने फिर इस धंधे को उसी तरह जमा लिया.

1975 में आई धर्मात्मा मूवी सुपरहिट रही थी.


फिरोज खान की फिल्म धर्मात्मा
कल्याण जी के विपरीत रतन खत्री में फिल्मों और ग्लैमर का शौक था. द हिंदू अखबार की एक रिपोर्ट बताती है कि फिरोज खान की फिल्म धर्मात्मा में मुख्य किरदार (यानी प्रेम नाथ का रोल) रतन खत्री पर ही केंद्रित था. कहते हैं कि जब ये रोल लिखा जा रहा था तब रतन खत्री ने अपने बारे में काफी कुछ बताया था.

ये भी पढ़ें :-

बापू के प्रिय और कांग्रेस अध्यक्ष रहे अंसारी कैसे रहे आज़ादी के 'अनसंग हीरो'

'वो बदसूरत है, उसका रेप क्यों करता!' कौन हैं विवादों में रहे 'कोरोना विलेन' बोलसोनारो?
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज

corona virus btn
corona virus btn
Loading