लॉकडाउन से प्रभावित हुए शोधकार्य, जानिए कैसे निपटा जा रहा है नई चुनौतियों से

लॉकडाउन से प्रभावित हुए शोधकार्य, जानिए कैसे निपटा जा रहा है नई चुनौतियों से
लॉकडाउन केकारण दुनिाया में तमाम तरह के शोधकार्य में दिक्कतें आ रही हैं. (प्रतीकात्मक फोटो)

कोरोना वायरस (Corona) के कारण चल रहे लॉकडाउन (lockdown) के कारण शोधकर्ताओं के प्रोजक्ट समय पर पूरे न हो पाने के कारण उनका अनुदान रुकने का खतरा है. दुनिया में शोध करने वाले संस्थान इससे निपटने के लिए खास कदम उठा रहे हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 19, 2020, 2:03 PM IST
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नई दिल्ली: कोरोना वायरस (Corona virus) के इलाज के लिए पूरी दुनिया में शोधकर्ता जी जान लगा रहे हैं. उनके लिए भी नए हालातों में काम करना आसान नहीं है. बहुत से शोधकर्ता घर से काम कर रहे हैं जहां उनके पास लैब जैसी सुविधाएं नहीं हैं. इतना ही नहीं कोरोना वायरस की महामारी के चलते जो आर्थिक सहायता मिली है वह भी इन शोधकर्ताओं तक न पहुंच पाना एक बहुत बड़ी चिंता का कारण बन गई है.

क्या आ रही है शोधकर्ताओं को समस्या
अभी लाइलाज चल रही कोविड-19 महामारी के प्रसार को रोकने के लिए लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग जैसे उपाय अपनाए जा रहे हैं. इसकी वजह से दुनिया में बहुत सी यूनिवर्सिटी और लैब जहां शोधकार्य होने हैं बंद हो गए हैं. इसकी वजह से शोधकर्ता अपने प्रोजेक्ट समय पर पूरे नहीं कर पा रहे हैं जिससे उन्हें आगे के शोध के लिए मिलने वाली अनुदान राशि मिलने में दिक्कत होने की खतरा पैदा हो गया है.

क्या इस आपातकाल में अपनाई जा रही है कोई अलग नीति



हाल ही में नेचर में प्रकाशित लेख में इस बात का अध्ययन किया गया कि दुनिया भर में तमाम शोध संस्थान किस तरह से इस मामले को देख रहे हैं और इस महामारी के आपातकालीन समय में आर्थिक सहायता के मुद्दे को सुलझाने के लिए क्या नीति अपना रहे हैं.



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कोरोना वायरस के कारण चल रहे लॉकडाउन से दुनिया भर में हर तरह की आर्थिक गतिविधि प्रभीवित हुई


ऐसा ही चलता रहा तो  प्रोजक्ट ही पूरे नहीं होंगे
स्टॉकहोम के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट के बायोकेमिस्ट जुआन एस्टोर्गा वेल्स कहते हैं कि अगल हालात दो-तीन महीने तक ऐसे ही रहे तो समय पर अपने प्रोजेक्ट पूरा कर पाना नामुमिकन हो जाएगा. क्योंकि ज्यादातर वेतन और सामान आर्थिक अनुदानों से हमें मिलते हैं” वेल्स दो ऐसे प्रोजेक्ट में शामिल हैं जिन्हें यूरोपीय यूनियन के होरोइजन 2020 रिसर्च प्रोग्राम से आर्थिक सहायता मिलती है. इसमें चार यूरोपीय देश शामिल हैं.

रुक सकती है आर्थिक सहायता
 इंडोनेशिया में इकोलॉजिकल रिसर्च करने वाले मार्क हैरिसन का मानना है कि  लंबे समय तक यह रहने से  साइंस फंडिंग पर दीर्घकालिक असर होना तय है. इससे सरकारी सहायता और अन्य अनुदान से मिलने वाले पैसे में खासी कमी आ जाएगी.

.यूरोपीय यूनियन समर्थित शोधकार्यों में हुए ये बदलाव
यूरोपीयन यूनियन तहत होने वाले शोध कार्यों को “अधिकतम लचीलेपन” की  सुविधा मिलेगी. पिछले महीने जारी दिशा निर्दशों में ऐसा कहा गया है. होराइजन 2020 समर्थित प्रोजेक्ट को शोधकर्ता छह महीने के लिए बढ़ा सकते हैं. घर से काम करने के कारण वे अपने अनुदान से मिले पैसे को अलग तरह से खर्च भी कर सकते हैं. यहां तक कि प्रजोक्ट में कोविड-19 के लिए बदलाव भी जाए जा सकते हैं. इसके अलावा महामारी से संबंधित अनेक नए प्रोजेक्ट भी शुरू किए गए हैं.

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कोरोना संक्रमण ने पूरी दुनिया को थाम दिया है.


कैसे निपट रहा है नासा इस चुनौती से
नासा जैसे संस्थानों में महामारी के हालातों में अनुदान बढ़ाने की पहले से ही खुली संभावना रखी गई है.  नासा के साइंस मिशन निदेशालय के एसोसिएट प्रशासक थॉमस जुरबुचैन का कहना है कि शोधकार्य धीमा होने की संभावना होती है. कुछ मामलों में तो वह रुक तक जाता है. इसके लिए नासा रीशेड्यूलिंग भी कर रहा है. कुछ मामलों में तारीखें बढ़ाई गई हैं. कई आखिरी तारीखें भी बढ़ा दी गई हैं.

क्या है यूके रिसर्च एंड इनोवेशन की नीति
 यूके रिसर्च एंड इनोवेशन (UKRI) के मुख्य कार्यकारी मार्ट वालपोर्ट का कहना है कि उनकी दो प्राथमिकता है, पहले उनके कर्मचारियों शोधकर्ताओं की सुरक्षा और दूसरी, जहा तक मुमकिन हो काम जारी रखा जाए. संस्थान महामारी के प्रभावों को कम करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है.

ऐसा ही कुछ हो रहा है पूरी दुनिया में
इसी तरह के कई एतिहातन और आपातकलीन कदम दुनिया के अन्य संस्थान उठा रहे हैं. अंतिम तारीखें बढ़ाई जा रही हैं तो वहीं पैसा रोका नहीं जा रहा है. यातायात रुकने से जो कॉन्फ्रेंस और अन्य गतिविधियां रुकी हैं उन्हें हालात के मुताबिक दोबारा नियोजित किया जा रहा है.

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