क्या डोनाल्ड ट्रंप का दोबारा राष्ट्रपति बनना पर्यावरण को बर्बाद कर देगा?

पर्यावरणविद डोनाल्ड ट्रंप को पर्यावरण के लिए लापरवाह मान रहे हैं (file photo)
पर्यावरणविद डोनाल्ड ट्रंप को पर्यावरण के लिए लापरवाह मान रहे हैं (file photo)

बहुत से अमेरिकी पर्यावरणविद (environmentalists in America) डोनाल्ड ट्रंप को पर्यावरण के लिए लापरवाह मान रहे हैं. खुद ट्रंप ने अपने कार्यकाल में कई ऐसे फैसले लिए, जो यही संकेत देते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 1, 2020, 2:37 PM IST
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अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव (presidential election in America) का माहौल चल रहा है. दोनों ही पार्टियों के उम्मीदवार अपनी जीत के दावे कर रहे हैं. डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के साथ एक बड़ा खेमा है तो डेमोक्रेट्स के जो बिडेन लोकप्रियता में ट्रंप से भी आगे दिख रहे हैं. अलग-अलग पेशों से जुड़े लोग अपने मुताबिक उम्मीदवार के आने की उम्मीद हैं. वहीं पर्यावरण से जुड़े एक बड़े खेमे का मानना है कि ट्रंप का दोबारा आना पर्यावरण के लिए अच्छा नहीं होगा.

ट्रिलियन ट्री प्रोग्राम के बारे में कहा
पहली चुनावी डिबेट में ट्रंप ने पर्यावरण के मुद्दे पर कहा कि वे पर्यावरण से बहुत लगाव रखते हैं. जब इस लगाव के सबूत मांगे गए तो उन्होंने अपने कार्यकाल में चले ट्रिलियन ट्री प्रोग्राम का जिक्र किया. यहां ये जानते चलें कि असल में ये कैंपेन वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम का है, जिसका मकसद दशकभर में पूरी दुनिया में एक ट्रिलियन पेड़ लगाना है. वैसे ये अफ्रीका के बिलियन ट्री कैंपेन से प्रेरित है. यानी कुल मिलाकर इसमें ट्रंप का कोई योगदान नहीं.

डिबेट में ट्रंप ने पर्यावरण के मुद्दे पर कहा कि वे पर्यावरण से बहुत लगाव रखते हैं

नहीं गिना सके सरकारी मुहिम 


पर्यावरण से जुड़ी दूसरी योजनाओं के बारे में पूछने पर ट्रंप ने गोलमोल जवाब देते हुए बात खत्म कर दी लेकिन किसी सरकारी मुहिम का जिक्र नहीं कर सके. इसके बाद से पर्यावरण पर काम करने वाले लोगों के बीच चर्चा चल रही है कि ट्रंप का दोबारा सत्ता में आना आर्थिक तौर पर भले जो हो लेकिन पर्यावरण के लिए खतरनाक हो सकता है.

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क्या कहते हैं एक्सपर्ट
वॉक्स में छपी एक रिपोर्ट में इस बारे में विस्तार से बात की गई है. साथ ही इस बात का जिक्र है कि ट्रंप का ग्लोबल वॉर्मिंग और क्लाइमेंट चेंज पर कैसा रवैया रहा है. एक अमेरिकन थिंक टैंक थर्ड वे के कार्यकर्ता जोश फ्रीड कहते हैं कि हालात पहले से खराब हैं और ट्रंप की नीतियां इसे बदतर बना देंगी.

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दूसरे देश पर लगाए आरोप
ट्रंप ने साल 2019 में आधिकारिक तौर पर पेरिस समझौता तोड़ दिया. ये समझौता ग्लोबल पर्यावरण से जुड़ा हुआ था. इतना ही नहीं, समझौता तोड़ते हुए ट्रंप ने दूसरे देशों को आरोपों के घेरे में भी खड़ा कर दिया. उनका कहना है कि भारत, रूस और चीन तीनों समझौते के तहत काम नहीं कर रहे हैं और अमेरिका इनपर अपना समय और धन लगा रहा है. बता दें कि दूसरे देशों को क्लाइमेट चेंज रोकने के लिए काम करने को अमेरिका ने काफी सारी फंडिंग की थी लेकिन अपने मुताबिक काम न दिखने पर ट्रंप को गुस्सा आ गया.

डोनाल्ड ट्रंप का ग्लोबल वॉर्मिंग और क्लाइमेंट चेंज पर लापरवाह रवैया रहा है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


क्यों तोड़ा ट्रंप ने समझौता
ट्रंप के समझौते से बाहर होने की एक और वजह भी रही. दरअसल ट्रंप का कहना था कि अमेरिका अकेला ही जलवायु परिवर्तन को कंट्रोल करने की कोशिश करता रहा, जिसके कारण उद्योग घाटे में जाने के कारण बंद हो गए, लोग बेरोजगार हो गए.इसके उलट समझौते से जुड़े ज्यादातर देश कोयले से अपने उद्योग चलाते रहे, इससे उनके धन की बचत भी हुई और वे आगे भी निकले. ट्रंप ने आरोप लगाया कि चीन और भारत तक अरबों डॉलर मदद लेकर समझौते में आए और वैसे रिजल्ट नहीं दे रहे. दोनों देशों में कोयले से बिजली कारखाने चल रहे हैं और इसी तरह से वे अमेरिका से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं.

क्या है पेरिस समझौता
क्लाइमेट चेंज पर लगातार बढ़ती चिंता के बीच साल 2015 के नवंबर-दिसंबर में पेरिस में 195 देश जमा हुए. वहां ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के मकसद से ग्लोबल समझौता हुआ. इसे ही पेरिस समझौते के नाम से जाना जाता है. इसके तहत तय हुआ कि ग्लोबल तापमान में बढ़ोत्तरी 2 डिग्री सेल्सियस के भीतर सीमित रहे. जमा हुए ज्यादातर देशों ने इसके लिए लिखित अनुमति दे दी. बता दें कि पेरिस संधि पर शुरुआत में ही 177 सदस्यों ने हस्ताक्षर कर दिए थे.

पर्यावरण पर काम करने वाली संस्थाओं पर ताला
पेरिस समझौते से हटने के अलावा ट्रंप ने एक और काम किया, जो पर्यावरणविदों को खटक रहा है. अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने 100 से ज्यादा ऐसी संस्थाओं को बंद करवा दिया, या कमजोर कर दिया, जो पर्यावरण पर काम कर रही थीं. इसके बाद से पर्यावरण पर सीधी नजर रखना या आंकड़े निकालने जैसे काम घट गए.

ट्रंप के कार्यकाल में पर्यावरण पर काम कर रही कई संस्थाएं बंद हो गईं- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


पानी की बर्बादी के आरोप भी ट्रंप पर लगे
असल में अमेरिका में बाथरूम में शावर प्रेशर फिक्शचर लगाया गया है. फिक्शचर का ये नियम साल 1992 में लाया गया. तब जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश राष्ट्रपति थे. उनकी सरकार ने नहाने के दौरान पानी की बर्बादी को रोकने के लिए शावर फिक्शचर का नियम बनाया. इसके तहत प्रति मिनट लगभग 2.5 गैलन (9.5 लीटर) पानी की सीमा तय हुई. मकसद था पानी की धार को सीमित करके उसकी बर्बादी रोकना. ट्रंप को ये रास नहीं आया. वे लगातार शिकायत करते रहे कि इससे उन्हें बाल धोने में परेशानी होती है. अब डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी शावर नियमों में बदलाव करने वाला है.

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ट्रंप की क्यों हो रही आलोचना
ऊर्जा बचाने की मुहिम से जुड़े लोगों का मानना है कि आज तक आम लोगों को नल की धार कम होने जैसी कोई शिकायत नहीं थी. साल 2016 में Consumer Reports ने शावरहेड पर लोगों की प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की और पाया कि लोगों को इससे कोई भी समस्या नहीं है. यानी शावर में पानी की कमी केवल ट्रंप की शिकायत है, जिसके कारण पानी की बर्बादी हो सकती है.
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