स्पैनिश फ्लू यानी जब मौत के तांडव ने दिया हिन्दी के महान कवि को जन्म

युवावस्था में सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला.

युवावस्था में सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला.

Nirala Jayanti : बसंत पंचमी (Basant Panchami) पर निराला का जन्मदिन मनाने की परंपरा 1930 के आसपास से शुरू हुई, लेकिन अंग्रेज़ी कैलेंडर के हिसाब से 21 फरवरी उनका ​जन्मदिन था. 122वीं निराला जयंती पर जानिए कैसे लाशों ने महाप्राण को रचा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 21, 2021, 8:15 AM IST
  • Share this:
निराशा के बाद आशा का समय होता है. जीवन की गति यही है कि मृत्यु के बाद फिर सृजन है. पहले विश्व युद्ध के उतार के समय स्पैनिश फ्लू (Spanish Flu 1918) ने दुनिया भर में मौत का तांडव किया. भारत में ही एक अनुमान के हिसाब से 1 करोड़ 80 लाख लोग मारे गए. इतिहास की सबसे घातक महामारी (Most Lethal Pandemic) ने दुनिया भर में 5 करोड़ जानें ली थीं, जिनमें भारत ही सबसे बड़ा शिकार था. काल के चंंगुल में फंसे एक युवा का पूरा कुनबा तबाह हुआ, जो तब एक मुलाज़िम था, लेकिन समय की गति ने उसे हिन्दी के सबसे बड़े कवियों (Best Poets of Hindi) की पंक्ति में खड़ा किया.

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला. निराला की छवि आपने देखी है, जो रबींद्रनाथ ठाकुर (Rabindranath Thakur) से मेल खाती दाढ़ी वाले कोई पहुंचे हुए साधु की भांति दिखते हैं. आंखों का तेज और चेहरे की गंभीरता भरपूर संकेत देती है कि आप किसी महाप्राण के दर्शन कर रहे हैं. लेकिन, महाप्राण होना सबके बस की बात नहीं. अपने हाथों से अपने दर्जन भर प्राण प्यारों को आग और मिट्टी देने के बाद जो उखड़ता नहीं, दुख उसे महाप्राण कहने की माया रचता है.

ये भी पढ़ें:- कृष्णा सोबती बनाम अमृता प्रीतम : ऐतिहासिक कानूनी जंग और यादगार तेवर

best hindi book, best hindi writer, best hindi poet, bestseller hindi book, बेस्ट हिंदी बुक, हिंदी के महान कवि, निराला जयंती, बेस्टसेलर हिंदी किताब
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की लोकप्रिय छवि.

21 फरवरी 1899 को जन्मे निराला महामारी शुरू होने के वक्त उम्र के 20वें साल में प्रवेश कर रहे थे. 21 से 22 साल की उम्र में महामारी का मार्मिक बयान पेश करते हुए निराला ने कलेजा चीरकर रखा, लेकिन उन शब्दों में एक ग़ज़ब की दृढ़ता भी साफ दिखती है कि कैसे मुसीबत का सामना किया जा सकता है.

ये भी पढ़ें:- कौन हैं प्रिया रमानी और वो केस, जो पूर्व मंत्री एमजे अकबर को पड़ा महंगा

बंगाल को हमेशा अपनी जन्मभूमि कहकर उस पर जान छिड़कने वाले निराला वहीं उन दिनों एक एस्टेट में मामूली नौकर हुए थे. साल भर पहले पिता के गुज़र जाने के बाद नौकरी मजबूरी थी. उन्हें भाषा और कलाओं से तब भी प्यार था, लेकिन काम उस वक्त हिसाब किताब और चिट्ठी पत्री का करना पड़ा. राजा साहब के शौकिया थिएटर से निराला की लोकप्रियता जब बढ़ना शुरू हुई थी, तभी इन्फ्लुएंज़ा का प्रकोप अखबारों के काले अक्षरों से गाढ़ा धुआं छोड़ने लगा.



ये भी पढ़ें:- कश्मीर का वो मंदिर, जहां से गांधी, नेहरू, गफ्फार खान ने दिए पैगाम

निराला लिखते हैं, 'तार आया - तुम्हारी स्त्री सख्त बीमार है, अंतिम मुलाकात के लिए चले आओ.' अखबार बता चुके थे कि महामारी कितनी जानलेवा थी. तार से पहले निराला को भयंकरता का पता तो था, लेकिन यह नहीं कि यह कहर उन पर किस तरह टूटने वाला था. ससुराल पहुंचे तो पता चला कि पत्नी गुज़र चुकी. यही नहीं, जाते हुए रास्ते में निराला ने अपने दादाज़ाद भाईसाहब की लाश जाती हुई भी देखी.

best hindi book, best hindi writer, best hindi poet, bestseller hindi book, बेस्ट हिंदी बुक, हिंदी के महान कवि, निराला जयंती, बेस्टसेलर हिंदी किताब
डलमऊ में ही निराला ने मौत का भयानक मंज़र देखा था.


कुछ ​ही दिनों के भीतर काल की घात का अभूतपूर्व अनुभव ऐसा हुआ कि किसी को भी जीवन भर के लिए तोड़ दे. जब परिवार के लोग मर रहे थे, तब निराला के पहुंचने पर चाचाजी ने कहा 'तू यहां क्यों आया?' एक ही वाक्य में प्रेम और भय महसूस करने की बात है. निराला आगे लिखते हैं :

देखते देखते घर साफ हो गया. जितने उपार्जन और काम करने वाले आदमी थे, साफ हो गए. चार बड़के दादा के, दो मेरे. दादा के सबसे बड़े लड़के की उम्र 15 साल, मेरी सबसे छोटी लड़की साल भर की. चारों ओर अंधेरा नज़र आता था... इतने दुख और वेदना के भीतर भी मन की विजय रही. रोज़ गंगा देखने जाया करता था. एक ऊंचे टीले पर बैठकर लाशों का दृश्य देखता था...


यह डलमऊ का अवधूत टीला था, जिसे निराला के दुख ने हिन्दी जगत में स्मारक बनाया. यहां निराला गंगा में बहती, किनारे आतीं लाशें देखा करते थे. कभी अवधूत को याद करते तो कभी संसार की नश्वरता को. इतनी लाशें निराला के मन में इस तरह उतर गईं कि उन्हें महाप्राण होना ही पड़ा. जीवनीनुमा किताब 'कुल्ली भाट' में निराला को यहां कुल्ली के शब्दों में एक शांति मिली :

मृत्यु के बाद मन शांति चाहता है. जो मर गए हैं, वे भी शांति प्राप्त कर चुके हैं. यह अवधूत टीला है, बहुत पहले यहां एक अवधूत रहते थे. बस्ती से यह जग​ह कितनी दूर है और मरघट से भी दूर, यानी अवधूत मृत्यु के बाद जैसे पहुंचे हों. यहां जैसे शांति ही शांति हो.


best hindi book, best hindi writer, best hindi poet, bestseller hindi book, बेस्ट हिंदी बुक, हिंदी के महान कवि, निराला जयंती, बेस्टसेलर हिंदी किताब
निराला लिखित पुस्तक कुल्ली भाट का कवर पेज.


यहां से निराला मठ में चले जाते हैं और अध्यात्म के साथ ही साहित्य उन्हें अपना लेता है. निराला पर सबसे प्रामाणिक लेखन करने वाले डॉ. रामविलास शर्मा कहते हैं कि 'जुही की कली' को अगर निराला की पहली रचना मान भी लिया जाए, तो भी साफ दिखता है कि यह कविता इसी वेदना के अनुभवों से उपजी. शर्मा के मुताबिक इस रचना का समय 1921 से 1922 के आसपास माना जाना चाहिए.

ये भी पढ़ें:- शबनम को तो फांसी हो जाएगी पर उसके इकलौते बच्चे का क्या होगा?

इस कविता ने कवि को स्थापित करने वाली रचना का गौरव हासिल किया, जो मृत्यु के तांडव देखने के बाद भी सृजन का राग सुनाती है. इसके बाद तो निराला की साहित्यिक यात्रा यशस्वी व कालजयी पड़ावों से गुज़रती है और मूर्त अमूर्त से होती हुई मुक्ति पा लेती है.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज