हवा में कैसे फैलता है कोरोना वायरस, Fluid Dynamics से इसे समझिए

हवा में कैसे फैलता है कोरोना वायरस, Fluid Dynamics से इसे समझिए
कोरना वायरस ड्रापलेट्स के जरिए फैलता है लेकिन इसक एक प्रक्रिया है.

फ्ल्यूड डायनामिक्स (Fluid Dynamics) के मुताबिक कोरोना वायरस हमारे श्वसन तंत्र में हवा के ड्रॉपलेट्स से चिपकता है और फिर उनके जरिए हवा में फैलता है.

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नई दिल्ली: कोरोना वायरस (Corona virus) दुनिया में तेजी से फैलने के साथ शोधकर्ताओं के लिए भी सरदर्द बना हुआ है. तमाम कोशिशों के बाद भी संक्रमण में कमी होती नहीं दिख रही है. इसी बीच शोधकर्तों ने हवा में ड्रॉपलेट्स (Droplets) के जरिए इस संक्रमण (Infection) के फैलने का फ्ल्यूड डायनामिक्स  Fluid Dynamics) अध्ययन किया है.

क्या है फ्ल्यूड डायनामिक्स
फ्ल्यूड डायनामिक्स विज्ञान की वह शाखा है जो द्रव्यों की गतिविधियों और उनके कारणों का अध्ययन करती है. यह हवाई जहाज के उड़ने से लेकर बिजली पैदा करने वाले विशाल टर्बाइन तक के काम करने में मदद करती है.  शोधकर्ता काफी समयसे इस बात का अध्ययन  कर रहे हैं कि कैसे इंसान के सांस लेने, बात करने या फिर छींकने और खांसने से ड्रॉपलेट्स हवा में रहते हैं और हवा में ही कैसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंच पाते हैं.





कोरोना ही नहीं और भी संक्रमण फैलते हैं ड्रॉपलेट्स से


आज कोरोना संकट के दौरान ऐसे सवाल और भी अहम हो चले हैं. यह जानना अब और जरूरी हो गया है कि कोरोना वायरस वास्तव में हवा से कैसे फैलता है. हवा में होने वाला हर संक्रमण और कोविड19 भी सूक्ष्म स्तर पर फैलता है. वायरस के कण या वायरोन्स छोटे-छोटे पानी के कणों पर जमा हो जाते हैं जिससे वे एक इंसान से दूसरे इंसान तक पहुंच पाते हैं.

कैसे बनते हैं छोटे छोटे कण
ये छोट-छोटे पानी के कण जिन्हें ड्रापलेट्स कहा जाता है इंसान की सांस की नली से बाहर आते जाते हैं.  इस नली में म्यूकस की नर्म परत होती है. नली में हवा के आने जाने से यह परत टूटती है और अलग अलग आकार के कण बाहर निकलते हैं  यदि व्यक्ति पहले ही से ही कोरोना वायरस से संक्रमित है तो इन कणों में वायरोन्स भी चिपक कर बाहर आ जाते हैं.

बड़े ड्रॉपलेट्स ज्यादा खतरनाक
ये पानी के कण या ड्रॉपलेट्स जितने बड़े होंगे उसमें वायरोन्स उतने ही ज्यादा होंगे. ये बड़े कण छोटे कणों से ज्यादा खतरनाक भी होते हैं. इसकी वजह यह है कि बड़े कणों पर आसपास के बलों (Forces) का असर ज्यादा होता है और ये जल्दी ही किसी सतह पर जम जाते हैं और उसे संक्रमित कर देते हैं.

कोरोना वायरस का संक्रमण अभी तक रोका नहीं जा सका है.


छोटे कण होते हैं कमजोर
वहीं दूसरी ओर छोटे कण हवा में वाष्पीकृत होने की कोशिश करते हैं और ज्यादा छोटे होते जाते हैं. और इतने हलके हो जाते हैं कि वे हवा में ही बने रहते हैं. ये छोटे कण सूखे रहते हैं इन्हें एरोसोल्स कहा जाता है. ये कम खतरनाक होते हैं क्योकि इनका वायरस की संख्या कम होती है और इनके वायरस कमजोर भी हो जाते हैं. इन कणों का यह वर्गीकरण टीबी की बीमारी के एक अध्ययन के दौरान किया गया था. इसमें  बड़े कणों के साथ सीधे हवा से या अप्रत्यक्ष (सतहों से) रूप से वायरस का संक्रमण फैलता है.

ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग होती है अहम
यदि वायरस संक्रमण इस तरह से फैलता है तो शोधकर्ता सलाह देते हैं कि ऐसे हालातों में सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल रखा जाए और छह फुट की दूरी बनाई रखी जाए. छह फुट की दूरी ही वह दूरी है जहां तक वायरस हवा में बना रह सकता है.

और भी कारक हैं जो मामले को बनाते हैं जटिल
हमारे श्वसन तंत्र में ड्रॉपलेट्स का बनना हवा के प्रवाह के प्रकार और गति के प्रति संवेदनशील होता है. मिसाल केतौर पर एक छींक में खांसी के मुकाबले ज्यादा कण बनते हैं और उसमें ज्यादा तेजी से हवा में फैलते हैं. छींकने और खांसी जैसे असामान्य हालातों में  गर्म हवा की वजह से ड्रॉपलेट्स कई बार कई मीटर तक सफर कर लेते हैं. हवा की नमी भी इन कणों के वाष्पीकरण को प्रभावित करती है.

एरोसोल्स भी संक्रमण फैला सकते हैं
एरोसोल में वैसे तो वायरस कम होते हैं और कमजोर होते हैं, लेकिन यदि ये लंबे समय तक हवा में रहे तो संक्रमण फैला भी सकते हैं. फिर हाल कोरोना वायरस के हवा के द्वारा फैलने वाला संक्रमण नहीं माना गया है. लेकिन कई परिस्थितियों में यह हवा से फैलता है जिसमें ऊपर बताई गई स्थितियां शामिल हैं. डब्ल्यूएचओ ने भी कोरोना संक्रमण को खास परिस्थितियों से हवा में फैलना वाला संक्रमण माना है.

हवा में कोरोना वायरस और किसी अन्य वायरस का भी फैलना एक जलिट प्रक्रिया है और बहुत से कारकों से प्रभावित हो सकती है. ऐसे में सावधानी ही बेहतर इलाज होगी.

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