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#Nehru@130: क्या रिश्‍ता था सरदार भगत सिंह और पंडित नेहरू के बीच

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Updated: November 11, 2019, 5:21 PM IST
#Nehru@130: क्या रिश्‍ता था सरदार भगत सिंह और पंडित नेहरू के बीच
नेहरू ने स्वतंत्रता की लड़ाई में दो ही लोगों की सबसे ज्यादा तारीफ की. एक गांधी थे और दूसरे भगत सिंह

भगत सिंह के जीवन से ज्यादा उनकी मृत्यु इस देश के युवाओं की कई पीढ़ियों को प्रभावित करती रही है और आगे भी करेगी. कैसे थे नेहरू के साथ भगत सिंह के संबंध. इस बारे में पीयूष बबेले की किताब "नेहरू मिथक और सत्‍य" में काफी विस्तार से चर्चा की गई है. इसी किताब के अंश

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आजादी की लड़ाई में अगर कांग्रेस से बाहर सबसे महत्वपूर्ण कोई किरदार है तो वह हैं, सरदार भगत सिंह (Sardar Bhagat Singh). वह उस समय भारत के सार्वजनिक जीवन में छा गए, जिस समय नेहरू (Jawaharlal Nehru) को कांग्रेस (Congress) की कमान मिलने वाली थी. इस तरह से देखा जाए तो 1929 से 1931 एक ऐसा दौर था जब भारतीय राजनीति के क्षितिज पर महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi)के अलावा तीन सितारे उभर रहे थे. ये थे नेहरू, सुभाष और भगत सिंह.

नेहरू देश के उन चुनिंदा बड़े नेताओं में थे, जो जेल में जाकर भगत सिंह और उनके साथियों से मिले. नेहरू ने भगत सिंह के हिंसा के रास्ते की कभी तारीफ नहीं की, लेकिन उनकी बहादुरी और देश प्रेम की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की. उन्होंने भगत सिंह की बहादुरी को भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बताया. महात्मा गांधी के अलावा भगत सिंह ही ऐसे शख्स रहे, जिसकी नेहरू ने इतनी ज्यादा प्रशंसा की.

जब भगत सिंह और उनके साथी लाहौर जेल में भारतीय और यूरोपीय कैदियों के साथ समान बर्ताव की मांग को लेकर लंबे उपवास पर बैठे थे. तब 5 जुलाई 1929 को नेहरू ने दिल्ली में दिए एक बयान में कहा:

‘‘भगत सिंह और बीके दत्त की भूख हड़ताल की खबर मैंने बड़ी गहरी तकलीफ के साथ सुनी है. बीस या और भी ज्यादा दिनों से उन्होंने कुछ भी नहीं खाया है. मुझे बताया गया है कि उन्हें जबरदस्ती खाना खिलाया जा रहा है. इन दोनों नौजवानों ने गलती भले ही की हो, लेकिन कोई भी हिंदुस्तानी उनकी दिलेरी की तारीफ किए बिना नहीं रह सकता. और अब तो उनके अपनी इच्छा से बड़ी तकलीफ सहने में हमारे दिल पूरी तरह उनके साथ होंगे. यह लोग अपने किसी स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि सभी सियासी कैदियों की हालत में सुधार कराने की गरज से उपवास कर रहे हैं. जैसे-जैसे दिन बीतते जाएंगे, उनके इस कठोर इम्तिहान की तरफ हमारी आंखें लगी रहेंगी और अपने दिलों को थामे हम यही उम्मीद करते रहेंगे कि हमारे यह दोनों बहादुर भाई इस इम्तिहान में कामयाब हों.’’

8 अगस्त 1929 को जवाहरलाल जेल में बंद भगत सिंह और उनके साथियों से मिले. मुलाकात के बाद 9 अगस्त को उन्होंने लाहौर में वक्तव्य दिया:

‘कल मैंने सेंट्रल जेल और बोर्स्टल जेल में सरदार भगत सिंह, श्री बटुकेश्वर दत्त, श्री जतींद्रनाथ दास और लाहौर षड्यंत्र केस के और भी उन सभी कैदियों से मुलाकात की जो भूख हड़ताल कर रहे हैं. इन सभी लोगों को कई दिन से जबरदस्ती खाना खिलाने की कोशिश की जाती रही है. जोर जबरदस्ती का असर इनमें से कुछ के लिए तो इस कदर नुकसानदेह साबित हुआ कि किसी और बड़े खतरे से बचने के लिए आखिर इस तरह जबरदस्ती खिलाना छोड़ दिया गया.

सरदार भगत सिंह ने जैसा मुझे समझाया. स्थिति यह थी कि जरूरत होने पर सिर्फ एक को छोड़कर बाकी सभी सियासी कैदियों के साथ खास तरह का बर्ताव किया जाना चाहिए. इसका अपवाद एक ऐसा कैदी है, जिसने सचमुच खून किया है. मैं तो यह उम्मीद ही कर सकता हूं कि नौजवान जो बलिदान दे रहे हैं, वह कुछ कर दिखाएगा.’’
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8 अगस्त 1929 को जवाहरलाल जेल में बंद भगत सिंह और उनके साथियों से मिले. इसके बाद उन्होंने भगत सिंह की खूब तारीफ की


नेहरू ने की तारीफ 
इसी दिन नेहरू ने लाहौर में एक भाषण दिया,

‘‘लाहौर जेल में भूख हड़ताल करने वाले लोग अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरे कैदियों को लिए शानदार कष्ट और तकलीफ झेल रहे हैं, जिसे झेलना बिरले लोगों के ही बस की बात है. जिस प्रचंड और लंबी यात्रा के दौर से वह खुशी-खुशी गुजर रहे हैं, उसके बदले थोड़ा बहुत जो भी आराम पाने की उम्मीद कर सकते हैं, वह इसके मुकाबले कुछ भी नहीं है.

इन बहादुरों की, अपने अंतरराष्ट्रीय शूरवीरों की, हम किस तरह मदद कर सकते हैं. सार्वजनिक सभा या लाहौर की सड़कों पर आवाजें बुलंद करके नहीं, बल्कि आजादी की राष्ट्रीय फौज में शामिल होकर. आइए अपने देश की गुलामी की जंजीरों को तोड़ डालें. तब सियासी कैदी रहेंगे ही नहीं. कांग्रेस के संगठन को हम और भी दूर-दूर तक ले जाएं. उसे और भी पक्का करें.

इन नौजवानों ने नई तमन्ना जगा दी है 
नेहरू ने इसी भाषण में आगे कहा, "इलाहाबाद में मुझे सुनने को मिला था कि पंजाब के लोगों की नींद टूटने लगी है और देश की आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने के लिए वे तैयारी कर रहे हैं. यहां आने के बाद से मैं इंकलाब जिंदाबाद के नारे बुलंद होते सुन रहा हूं, लेकिन साथ ही मैंने दिलों के अंदर षड्यंत्र केस वाली भूख हड़ताल की एक दूसरी आवाज भी सुनी है, जो धीमी होते हुए भी उतनी ही जबरदस्त है.

इन नौजवानों की कुर्बानी ने हमारे अंदर जिंदगी की एक नई चेतना और अपने देश को आजाद करने की नई तमन्ना जगा दी है. हमें यह बात समझनी होगी कि इन बहादुर नौजवानों ने दिलों के अंदर जो जंग छेड़ दी है, उसकी अहमियत कितनी ज्यादा है. यह लोग इसलिए नहीं लड़ रहे हैं कि कुर्बानी के बदले उन्हें जनता की वाहवाही मिले या बड़ी-बड़ी भीड़ उनके गले में हार डाले.

नेहरू ने ये भी कहा, कितने अफसोस की बात है कि कहां यह लोग इतनी बड़ी कुर्बानी दे रहे हैं, और दूसरी ओर कांग्रेस और स्वागत समिति के अंदर जगह पाने के लिए कांग्रेसजनों के बीच तू-तू, मैं-मैं चल रही है.


कितने अफसोस की बात है कि कहां यह लोग इतनी बड़ी कुर्बानी दे रहे हैं, और दूसरी ओर कांग्रेस और स्वागत समिति के अंदर जगह पाने के लिए कांग्रेसजनों के बीच तू-तू, मैं-मैं चल रही है. कांग्रेसजनों के बीच चलने वाले इन आपसी झगड़ों की बात सुनकर मेरा सिर शर्म से नीचा हो गया है, पर साथ ही मेरे दिल में उतनी ही खुशी, इन नौजवानों की कुर्बानी को देखकर हुई है, जो देश की खातिर अपनी जान देने पर तुले हुए हैं.

इन नौजवानों ने खासतौर से इनमें से दो ने, जो पिछले 57 दिन से भगत सिंह, दत्त और दास अपनी एक-एक दिन की तकलीफ से हमें यह दिखाते चल रहे हैं कि हमें किस रास्ते पर बढ़ना चाहिए. इनमें से कुछ तो, चंद दिनों में ही अपनी जिंदगी की बेचैनी से छुटकारा पा सकते हैं. लेकिन हमारी स्वाधीनता और आजादी का सवाल इससे फिर भी हल नहीं होगा. उनकी कुर्बानी हमें कम से कम एक सबक तो दे ही जाएगी, वह यह है कि जनता अब निकम्मी न बैठी रहे और आजादी की लड़ाई में कूद पड़े. यह लोग तो मर मिटने पर आमादा हैं ही, लेकिन सवाल यह है कि हममें से बाकी लोग क्या करेंगे. क्या हम भी उन्हीं के कदमों के पीछे नहीं चल देंगे और उनकी जैसी ही कुर्बानियां दे कर विदेशियों की गुलामी से देश को आजाद करेंगे.’’

23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर षड्यंत्र केस में शामिल रहने के लिए लाहौर में फांसी दे दी गई. 24 मार्च को नई दिल्ली में नेहरू ने बयान दिया.

नेहरू ने कहा, वो क्यों चुप रहे
‘‘उनके आखिरी दिनों के बीच मैं बिल्कुल चुप ही रहा, ताकि मेरा एक भी शब्द सजा को घटाने के आसार को नुकसान न पहुंचा सके. मैं चुप रहा, हालांकि मेरा दिल खौलता रहा. और अब सब कुछ खत्म हो गया है. हम सब भी उसे, जो हमें इतना प्यारा था और जिसकी शानदार दिलेरी और कुर्बानी हिंदुस्तान के नौजवानों के लिए प्रेरणा बन कर रही है, आख़िर नहीं बचा सके. आज हिंदुस्तान अपने बहुत प्यारे बच्चों को फांसी तक से नहीं बचा सकता.

सभी जगह हड़ताल होंगी और मातमी जुलूस निकलेंगे. हमारी निपट बेबसी पर मुल्क भर में गम मनाया जाएगा, लेकिन उसके लिए जो अब हमारे बीच नहीं हैं, फख्र भी होगा. और इंग्लैंड जब हमसे बात करेगा और किसी निपटारे की बात कहेगा, तब भगत सिंह की लाश हमारे बीच होगी, कि कहीं हम उसे भूल तो नहीं गए.’’

नेहरू ने अपने भाषण में कहा कि भगत सिंह आज सबके प्यारे हो गए हैं. गांव-गांव का बच्चा उनका नाम जानता है. आज घर-घर में उनके नाम की चर्चा है. उसकी कोई वजह तो जरूर होगी.


नेहरू ने कहा - भगत सिंह अंधेरी रात में रोशनी की तरह
भगत सिंह की फांसी के तुरंत बाद कराची में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ. यहां महात्मा गांधी ने खुद भगत सिंह की शहादत पर एक प्रस्ताव पेश किया. इस प्रस्ताव को कांग्रेस में रखने की जिम्मेदारी नेहरू ने निभाई. गांधी का प्रस्ताव रखते समय भगत सिंह के बारे में नेहरू ने 29 मार्च 1931 को जो कहा, वह तारीखी है,

‘‘जनाबे सदर, भाइयो और बहनो,

भगत सिंह की फांसी से मुल्क में एक अजीब लहर फैल गई है. क्या वजह है कि आज भगत सिंह का नाम सबकी जुबान पर चढ़ा हुआ है. भगत सिंह का नाम क्या कीमत हमारे लिए रखता है. आज भगत सिंह सबका सबका प्यारा हो रहा है. गांव-गांव का बच्चा इसका नाम जानता है. आज घर-घर में इसके नाम की चर्चा है. इसकी कोई वजह जरूर है. भगत सिंह क्या था. वह एक नौजवान लड़का था. उसके अंदर मुल्क के लिए आग भरी थी. वह शोला था. चंद महीनों के अंदर वह आग की एक चिंगारी बन गया, जो मुल्क में एक कोने से दूसरे कोने तक आग फैल गई. मुल्क में अंधेरा था, चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा नजर आता था, वहां अंधेरी रात में एक रोशनी दिखाई देने लगी. हमारा यानी कांग्रेस का प्रोग्राम साफ है. हम कहते हैं कि शांति से हम काम करेंगे. हम शांति कायम रखने की हर एक कोशिश करते हैं. हम चाहे कितनी ही कोशिश क्यों न करें. हमारे रास्ते में अड़चनें लगाई जा रही हैं. क्या भगत सिंह की फांसी से मुल्क में अशांति नहीं फैलेगी.

हमने शांति के तरीकों को छोड़कर दूसरे तरीकों की हमेशा बुराई की है. आज भी हम वही कार्यवाही करेंगे. आज हम फिर शांति के सामने सिर झुकाते हैं. इस रेजूलेशन में हमने यह लिखा है कि हम भगत सिंह इत्यादि के तरीकों से अलहदा हैं, लेकिन हम उनकी बहादुरी के सामने सिर झुकाते हैं. हम अजहद बहादुरी के सामने सिर झुकाना चाहते हैं. हम जानते हैं कि भगत सिंह के मुकदमे में कानूनी ज्यादती हुई है. वायसराय का ऑर्डिनेंस निकला कि स्पेशल अदालत इस मुकदमे को सुनेगी. मामूली अदालत से उनके मुकदमे की सुनवाई नहीं होने दी. क्या यही कानून के अंदर फैसला कहलाता है.

आज हम देखते हैं कि भगत सिंह की तस्वीर घर-घर लगी है. लोग उनकी तस्वीर पोशाक में पहनते हैं. बटनों में उनकी तस्वीर लगी हैं.

फिर कांग्रेस की सभा में नेहरू ने भगत सिंह की शहादत पर प्रस्ताव भी पेश किया


मतलब यह है कि आज भगत सिंह की सब जगत में पूजा हो रही है. बच्चा-बच्चा उसका उसका नाम पुकारते हैं. यह रेजूलेशन यही कहता है कि हम उसके बहादुराना कामों की तारीफ करें. हां, जरूर यह हमारे लिए गौरतलब बात है कि वह किस राह पर चलता था. क्या वह रास्ता हमारे लिए ठीक था या नहीं. हम इस प्रस्ताव में यही कहते हैं: उसकी बहादुरी बड़ी भारी थी, जिसकी हम दिल से तारीफ करते हैं, लेकिन जिस रास्ते को यह लोग ठीक समझते थे, कांग्रेस उस रास्ते को ठीक नहीं समझती.

कांग्रेस ने सजा माफ करने की भरपूर कोशिश की
जवाहरलाल नेहरू ने इसी भाषण में आगे कहा, जहां तक यह सवाल है कि भगत सिंह के लिए कांग्रेस ने क्या किया और हम भगत सिंह की कितनी इज्जत करते हैं तो आपको मालूम ही होगा कि इसकी अजहद कोशिश की गई कि यह लोग सजा से माफ कर दिए जाएं, चाहे जन्म कैद रखी जाए. लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. मेरे दिल में भगत सिंह के लिए जो इज्जत है, वह आपसे किसी से कम नहीं है.

मेरी आदत कुछ छुपाने की नहीं है. मैं तो साफ-साफ कहता हूं कि गांधीजी की राह से ही हमें आजादी मिलेगी. हमने अगर शांति के रास्ते को छोड़ा तो हम बरसों तक भी आजाद नहीं हो सकते. शांति के रास्ते को छोड़कर चलने से ज्यादा कोई बुराई की बात नहीं है.

मैंने यह रेजूलेशन इसलिए पेश करना ठीक समझा कि मैं असहयोग की लड़ाई को बहुत ऊंचे दर्जे की लड़ाई समझता हूं. मैं इसी वजह से यह रेजुलेशन पेश कर रहा हूं. इसमें साफ-साफ लिखा है कि हम हिंसा से कतई अलग हैं. इस प्रस्ताव का एक ही मतलब है कि अगर आप उसे मंजूर करते हैं तो आप असहयोग के रास्ते को ठीक समझते हैं, इसलिए आप कोई दूसरा रास्ता अख्तियार न करें.​

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First published: November 11, 2019, 3:10 PM IST
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