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तब भारी विरोध के बावजूद नेहरू और अंबेडकर ने हिंदू स्त्रियों को दिलाए संपत्ति के अधिकार

50 के दशक में जब अंबेडकर ने कानून मंत्री के तौर पर हिंदू कोड बिल को संसद में पेश किया तो इसका भारी विरोध हुआ. इस पर बहुत कार्टून बनाए गए.

50 के दशक में जब अंबेडकर ने कानून मंत्री के तौर पर हिंदू कोड बिल को संसद में पेश किया तो इसका भारी विरोध हुआ. इस पर बहुत कार्टून बनाए गए.

सुप्रीम कोर्ट ने पैतृक संपत्ति में महिलाओं को अधिकार देने के मामले को ना केवल फिर से मजबूत किया है बल्कि ये भी कहा है क ...अधिक पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि हिंदू महिलाएं 1956 के पहले के मामलों में पिता की संपत्ति पर अपना दावा जता सकती हैं. साथ ही इस मामले में अदालत ने कहा कि अगर पिता की मौत बगैर वसीयत के हो जाए तो भी बेटियां संपत्ति में अधिकार पाएंगी. क्या आप सोच सकते हैं कि एक जमाना ऐसा भी था जब हिंदू धर्म में महिलाओं के पास न संपत्ति का अधिकार था और न ही तलाक का. हिंदू विधवाएं न तो कानूनी तौर पर फिर विवाह कर सकती थीं और ना ही पति या पिता की संपत्ति पर दावा जता सकती थीं.

हिंदू स्त्रियों की स्थिति में अहम बदलाव 1950 के दशक में आए उस कानून से शुरू हुए, जिसका तब देशभर में प्रबल विरोध हुआ था. किताबें औऱ पुराने दस्तावेज बताते हैं कि जब हिंदू कोड बिल को संसद में चर्चा के लिए लाया गया तो भूचाल ही आ गया.

तब हिंदू महिलाओं को अधिकार देने के बिल के खिलाफ होते थे विरोध प्रदर्शन
वर्ष 1948 से 1951 के बीच देश में महिलाओं की स्थिति सुधारने वाले हिंदू कोड बिल के विरोध में लगातार जलसे, धरने और विरोध प्रदर्शन होते थे. पूरे देश में हिंदू नेता और हिंदू संगठन एक ही बात कहते थे कि इस बिल के जरिए उनके धर्म को भ्रष्ट किया जा रहा है, ये बहुत बड़ी साजिश है.

कौन से संगठन और नेता कर रहे थे विरोध
विरोध का झंडा उठाने वालों में सबसे आगे थे वही संगठन थे, जो खुद को हिंदू धर्म का पैरोकार कहते थे. मार्च 1949 से ऑल इंडिया एंटी हिंदू कोड बिल कमेटी ऐसे किसी कानून के खिलाफ सक्रिय हो गई. इस विरोध में सबसे आगे थे स्वामी करपात्री महाराज.

करपात्री महाराज देशभर में इसे बताते हिंदू परंपराओं के खिलाफ
करपात्री महाराज देशभर में घूम-धूमकर हिंदू कोड बिल के खिलाफ भाषण दे रहे थे. उन्होंने इसके लिए एक संगठन बनाया, जिसका नाम था अखिल भारतीय राम राज्य परिषद, जिसने फिर कई राज्यों में चुनाव भी लड़ा. कुछ जगहों पर जीत भी हासिल की. स्वामी करपात्री के अनुसार हिंदू कोड बिल हिंदू रीति-रिवाजों, परंपराओं और धर्मशास्त्रों के विरुद्ध था.

1950 के दशक में महिलाओं को संपत्ति में अधिकार और बराबरी का दर्जा देने वाले बिल के पक्ष में अखबारों में कई कार्टून लगातार प्रकाशित हुए.

विरोध प्रदर्शन के निशाने पर थे नेहरू और अंबेडकर
तब कई संगठनों ने अकेले दिल्ली में दर्जनों विरोध-रैलियां आयोजित कीं. देश के कोने-कोने में प्रदर्शन किए. इन प्रदर्शनों में महिलाओं को पिता और पति की संपत्ति के अलावा तलाक के अधिकार को हिंदू विरोधी कहा जाता था. इन सबके निशाने पर दो नेता थे. एक डॉक्टर भीमराव रामजी अंबेडकर और दूसरे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू.

1948 में संविधान सभा में बिल पेश हुआ
1948 में ये बिल संविधान सभा में पहली बार पेश किया गया. अंबेडकर कई सालों से हिंदू बिल कोड में संशोधन पर काम कर ऱहे थे. इस बिल को नेहरू का समर्थन हासिल था लेकिन विरोध करने वाले इसका जमकर विरोध तो कर ही रहे थे.

हिंदू कोड बिल पर एक अखबार में 1950 के दशक में प्रकाशित एक कार्टून.

फिर 1951 में संसद में पेश हुआ
कानून मंत्री अंबेडकर ने 5 फरवरी 1951 को हिंदू कोड बिल को संसद में दोबारा पेश किया. संसद में तीन दिन तक बहस चली. हिंदू कोड बिल के विरोधियों का सबसे बड़ा तर्क था कि संसद के सदस्य जनता के चुने हुए नहीं है इसलिए इतने बड़े विधेयक को पास करने का नैतिक अधिकार उनके पास नहीं है. दूसरा तर्क था कि सिर्फ हिंदुओं के लिए कानून क्यों लाया जाए, इसे दूसरे धर्मों पर भी लागू किया जाए.

राजेंद्र प्रसाद भी इसके पक्ष में नहीं थे
तब राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद भी इस बिल के पक्ष में नहीं थे. उन्होंने विरोध में कई पत्र नेहरू को लिखे. 1950 में राष्ट्रपति बनने के बाद भी इस बिल को लेकर उन्होंने नेहरू को चेताया.

नेहरू ने इसे जब चुनाव तक टाला तो अंबेडकर ने दिया इस्तीफा
17 सितंबर 1951 को चर्चा के लिए इस बिल को फिर संसद के पटल पर रखा. संसद में विरोध और बहस को देखते हुए प्रधानमंत्री नेहरू ने हिंदू कोड बिल को चार हिस्सों में बांटने का ऐलान किया. डॉक्टर अंबेडकर नेहरू के इस प्रस्ताव के खिलाफ थे. उन्हें ऐसा लगा कि नेहरू भी हालात से समझौता कर रहे हैं या फिर इसे टालना चाहते हैं. आहत अंबेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया.

1948 में डॉक्टर अंबेडकर ने संविधान सभा में हिंदू महिलाओं की हालत को सुधारने वाले हिंदू कोड बिल की रूपरेखा जब प्रस्तुत की तो इसका बहुत विरोध हुआ. इसके बाद 1951 में जब ये संसद में पेश हुआ तो संसद के अंदर और बाहर इसका बहुत विरोध हुआ. तब इस मुद्दे पर बहुत तीखे कार्टून समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए.

नेहरू चाहते थे कि जनादेश के बाद ही इस पर कानून बनाएं
इस बिल का विरोध इतना ज्यादा था कि नेहरू को अहसास हो गया था कि बिना जनादेश के इस कानून को पास कराना आसान नहीं होगा. इसी वजह से उन्होंने चुनाव तक इस बिल को टालने का मन बना लिया. 1951-52 में भारत के पहले आम चुनाव होने वाले थे. नेहरू की अगुआई में कांग्रेस ने हिंदू कोड बिल के मुद्दे पर चुनाव लड़ा. कांग्रेस बहुमत से जीती.

1955 में हिंदू मैरिज एक्ट आया, जिससे हिंदू स्त्रियों को तलाक का अधिकार
चुनाव के बाद नेहरू ने हिंदू कोड बिल को कई हिस्सों में तोड़ दिया. जिसके बाद 1955 में हिंदू मैरिज एक्ट बनाया गया. जिसके तहत तलाक को कानूनी दर्जा, अलग-अलग जातियों के स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे से विवाह का अधिकार और एक बार में एक से ज्यादा शादी को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया.

1956 में क्रांतिकारी उत्तराधिकार कानून बना
1956 में ही हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, हिंदू दत्तक ग्रहण और पोषण अधिनियम और हिंदू अवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम लागू हुए. ये सभी कानून महिलाओं को समाज में बराबरी का दर्जा देने के लिए लाए गये थे. इसके तहत पहली बार महिलाओं को संपत्ति में अधिकार दिया गया. लड़कियों को गोद लेने पर जोर दिया गया.

तब लड़कियों को स्कूल भेजने वाले परिवारों का होता था बॉयकाट
आज बेशक हिंदू समाज महिलाओं को लेकर जितना लोकतांत्रिक और उदार नजर आता है, वो कुछ दशकों पहले तक वैसा नहीं था. हालत ये थी कि 1910 और 20 के दशक में जब पहली बार लड़कियों की शिक्षा और उनके स्कूल जाने के लिए अभियान शुरू किया गया, तब उन परिवारों का धार्मिक तौर पर बहिष्कार करने की भी कई घटनाएं हुईं, जिन्होंने अपने घरों की लड़कियों को स्कूल-कॉलेज भेजा.

Tags: Dr. Bhim Rao Ambedkar, Hindu women, Jawahar Lal Nehru, Property

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