अगर बचपन में आपके साथ हुआ है ऐसा हादसा, तो डरने के बजाए ऐसे करें दुनिया का सामना

बुलींग का शिकार बच्चा अपने दोस्तों, घर वालों से भी खुलकर बात नहीं कर पाता. धमकी व धौंस जमाने का असर जिंदगी पर इतना गहरा होता है

News18Hindi
Updated: February 20, 2019, 7:24 PM IST
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दादागिरी, धौंस, बेइज्जती, आलोचना, ये सारी वो चीजे हैं जिन्हें झेलने के बाद किसी में भी आत्मविश्वास में कमी आ जाए. उसके भीतर डर बैठ जाए. इसी को अंग्रेजी में Bullying कहा जाता है. बुलींग का शिकार होना उम्र के हर मोड़ पर खतरनाक होता है, सबसे खतरनाक होता है बचपन में इसका शिकार होना. बचपन में कोई बुलींग का शिकार हो तो उससे निकलना बेहद मुश्किल है.

बुलींग का शिकार बच्चा अपने दोस्तों, घर वालों से भी खुलकर बात नहीं कर पाता. धमकी व धौंस जमाने का असर जिंदगी पर इतना गहरा होता है. आत्मविश्वास में कमी होती है. बचपन में अकसर बच्चे स्कूल या प्लेग्राउंड में बुलींग झेलते हैं. बच्चे अकसर पेरेंट्स को भी नहीं बताते. लेकिन बड़े/मैच्योर होने पर इससे उबरा जा सकता है. आइए जानते हैं कैसे.

जो अनुभव किया उसे स्वीकारें- बुलींग का शिकार हुए लोग सालों तक खुद को ये समझाते हैं कि उनके साथ वैसा कुछ हुआ ही नहीं. वे उसे स्वीकार करने, लोगों को बतानें में शर्म महसूस करते हैं. इससे उबरने का सबसे बेहतर तरीका ये है कि वे सबसे पहले इसे स्वीकार करें और ये मानें जो हुआ, उसमें उनकी कोई गलती नहीं थी.



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स्वास्थ्य को प्राथमिकता बनाएं- बुलींग के शिकार लोग सेहत से जुड़ी अलग-अलग तरह की परेशानियों से जूझते हैं. जिसमें इंसोमनिया, स्ट्रेस, सिरदर्द, ट्रोमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर, घबराहट, समय पर खाना न खाने जैसी परेशानियां शामिल हैं. ध्यान रखें बुलींग का प्रभाव आपके मूड पर असर डालने से बहुत गहरा होता है. अपनी सेहत की ओर क़दम बढ़ाते हुए डॉक्टर से खुलकर बात करें.


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अपनी पकड़ को फिर से मज़बूत करें- आत्मविश्वास खोना, बेसहारा महसूस करने जैसी चीज़ें सिर्फ बचपन तक सीमित नहीं रहती, ये एडल्ट होने तक आपके साथ चलती है. इसमें व्यक्ति बड़े होने तक, खुद को पीड़ित मानता है. जब आप ये यकीन करने लगेंगे कि आपको साथ जो हुआ वो आपके बस में नहीं था, जो आप रिएक्शन कंट्रोल कर पाएंगे. अपनी पकड़ सबसे पहले अपनी सोच पर मज़बूत करें.

खुद को अलग करने से बचें- बचपन में हुए हादसों की वजह से खुद को सबसे अलग-थलग रखना बंद करें. ऐसे में परिवार, रिश्तेदारों में बने दोस्तों के साथ से आत्मविश्वास पाएं. उनसे बातें करें, उनके साथ घूमने जाए. जो हुआ उसे भुलाकर आगे बढ़ें. ज़िंदगी आपका इंतज़ार कर रही है.

व्यक्तिगत विकास पर ध्यान दें- आपमें कहां कमियां हैं. किन कामों को करते हुए आपमें आत्मविश्वास की कमी रहती है. अपने भीतर की कमियों को ढूंढकर उसपर काम करें. याद रखें दुनिया आपका साथ छोड़ देगी, लेकिन आइने में आपके सामने खड़ा शख्स ही आपके साथ रहेगा. और वो शख्स आप खुद हैं. अपनी कमियों के बारे में लिस्ट बनाकर, फैमिली मेंबर के उस बारें में खुद के लिए राय भी ले सकते हैं.



सोचने का तरीका बदलें- बचपन में बुलींग का शिकार हुए लोगों की पीड़ा कभी भी उभर जाती है. वे इससे उबरने के लिए चीज़ों को लेकर अपने सोचने के तरीके को बदलें. ज़िंदगी में वे लक्ष्य निर्धारित करें, जो आपको खुशियां और आत्मविश्वास से भर दें.

मन के डर का अंत ढूंढे- रिकवरी का सबसे बेहतर हिस्सा है, जो हुआ उससे दूर होना. जब आप यह जान लेंगे कि बुलींग ने आपको कैसे प्रभावित किया, तब आपको उससे दूरी बनाने की सबसे ज्यादा ज़रूरत है. वो आपके साथ हुआ, सिर्फ वही आपके किरदार को बयां नहीं करता. आप उसके अलावा भी बहुत कुछ हैं. हमेशा इसे याद रखें.

सब्र से काम लें- वो कहावत तो आपने भी सुनी होगी, 'सब्र का फल मीठा होता है.' बेशक! बचपन के हादसों के निशां बेहद गहरे होते हैं. इनका परिणाम बड़े होने पर आपके किरदार में बहुत सी खामियों के रूप में दिखाई देता है. इसके लिए सबसे बेहतर हर छोटी-बड़ी कामयाबी का जश्न मनाएं. बेशक बदलाव छोटे होंगे, पर ये तो आपको भी मालूम है सागर भी बूंद-बूंद से ही बनता है.

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