चाय बनाते वक्त कहीं आप भी तो नहीं करते ये गलती? यूं मिलेगा परफेक्ट स्वाद

दुनिया में चाय के उत्पादन और निर्यात में भारत दूसरे नंबर पर है. इन सिंपल ट्रिक्स को अपनाकर आप भी बना सकते हैं परफेक्ट चाय.

Mahima Bharti | News18Hindi
Updated: October 16, 2018, 3:21 PM IST
Mahima Bharti | News18Hindi
Updated: October 16, 2018, 3:21 PM IST
भारत के लोगों के लिए चाय किसी जड़ी-बूटी से कम नहीं है. सिर दर्द है तो कड़क चाय, सर्दी खांसी है तो अदरक की चाय, बुखार है तो मसाला चाय, सुस्ती दूर करनी है तो चाय. चाय हमारी रोज़मर्रा की ज़रूरत का अहम हिस्सा बन चुकी है. आपकी जान-पहचान में इक्का-दुक्का लोग ही होंगे जो चाय न पीते हों. लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि आप बड़े मन से चाय बनाने के लिए किचन में जाएं और वह आपके टेस्ट के हिसाब की न बने.

हमेशा चाय एकदम परफेक्ट बने, ऐसा नहीं होता. कुछ न कुछ उन्नीस-बीस हमेशा हो ही जाता है. ऐसे में हम बता रहे हैं वो तरीका जिसे अपनाएंगे तो चाय हमेशा एकदम परफेक्ट टेस्ट देगी-

इसके लिए पहले दूध को सही तरह से उबाल लें. दूध उबालते समय उसे धीरे-धीरे चम्मच से चलाते रहें. अब आप दूसरी तरफ एक बर्तन में 100 मिलीग्राम पानी में करीब एक चम्मच चायपत्ती मिलाकर इसे गर्म करें. हमेशा याद रखें कि चाय बनाने में लगने वाले समय का ध्यान रखना बड़ा ज़रूरी होता है.

जब आप चायपत्ती को उबाल रहे हों तो ध्यान दें, 6 मिनट से ज्यादा देर तक उसे न उबालें. इतने समय में चायपत्ती में से परफेक्ट मात्रा में उसका रस निकल जाता है. फिर आप इसमें सही मात्रा में दूध और चीनी मिला दें. आपकी चाय तैयार है.

चाय के परफेक्ट स्वाद के लिए चाय पत्ती की किस्म भी पता होनी ज़रूरी है. अगर आप लाइट चाय पसंद करते हैं, तो पत्तीदार चाय का इस्तेमाल करना चाहिए. कड़क चाय बनाने के लिए बारीक चाय का इस्तेमाल करें. गुलाबी चाय यानी की न बहुत कड़क न ही लाइट के लिए दानेदार चाय काम में लें.

तो इसलिए चीन को कहते हैं 'चाइना'
अच्छी चाय तो बना ली, लेकिन क्या आपको पता है कि चाय के बारे में सबसे पहले किसको मालूम पड़ा. 4700 साल पहले यानी 2700 ईसा पूर्व चाइना के दूसरे राजा शेन नूंग ने गलती से चाय की खोज की थी. हुआ यूं कि चीन के इस राजा को गर्म पानी पीने की आदत थी. एक बार इनके सेवक इनके लिए पानी गर्म कर रहे थे जिसमें गलती से चाय की पत्तियां गिर गईं. इससे पानी का रंग तो बदला ही साथ ही टेस्ट भी बदल गया. जब राजा ने इसे पिया तो उसे एक अलग सी ताज़गी महसूस हुई. तभी से वह चाय का पानी पीने लगा. क्या आपको पता है कि चाय ताज़गी के साथ साथ आपको एनर्जी भी देती है. इसीलिए चीन ने नौंवी शताब्दी तक चाय के बारे में पूरी दुनिया को पता ही नहीं लगने दिया.
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चीनियों के इस राज़ से पर्दा उठाया एक बौद्ध भिक्षु ने जिसने जापान में जाकर चाय के बारे में बता दिया. फिर क्या था बात पूरी दुनिया में फैल गई. पहले जापान को चाय की आदत लगी फिर यूरोप को. एक वक्त चीन की चाय दुनिया भर में इतनी पसंद की जाती थी कि लंदन के अखबार में चीन से आई चाय का विज्ञापन भी छपा.

बरसों बाद भारतीयों के पास पहुंची चाय
उस वक्त तक अंग्रेज भारत की सत्ता अपने हाथों में ले चुके थे. ऐसे ही एक बार असम में घूमते हुए एक अंग्रेज को पता चला कि वहां के लोग पानी में वहां के लोकल पौधे की पत्तियां डाल के पीते हैं. एक बार ईस्ट इंडिया कंपनी के मेजर जनरल अरुणाचल में थे, जहां उनकी तबीयत खराब हो गई. वहां के लोगों ने उनको दवा के तौर पर चाय पेश की. तब ये बात खुलकर सामने आई. फिर क्या था? उन्होंने 1831 में चाय की पत्तियों को पहले कोलकाता के बॉटेनिकल गार्डन भेजा, फिर कृषि और बागवानी विकास बोर्ड. लेकिन दोनों ही जगह इन पत्तियों को चाय मानने से इनकार कर दिया गया. 1834 में एक बार फिर ये सैंपल बॉटेनिकल गार्डन भेजा गया, तब इसे पहचान कर 'असम टी' नाम दिया गया.

ऐसे शुरू हुआ चाय का व्यापार
इत्तेफाक से उसी साल ईस्ट इंडिया कंपनी की चीन के साथ बिज़नेस मोनॉपली (एकाधिकार) खत्म हुई. अब बिज़नेस में माहिर अंग्रेजों को भारत में व्यापार के लिए एक और चीज़ मिल गई. भारत में चाय के उत्पादन की जगह चुनने के लिए एक बोर्ड बनाया गया, जिसमें असम पहले से तय था बाद में पश्चिम बंगाल में भी चाय का प्रोडक्शन शुरू हो गया.

साल 1838 में सबसे पहले 12 डिब्बे चाय लंदन भेजी गई, वहां इस चाय की नीलामी की गई. नीलामी इतनी फायदेमंद रही कि अंग्रेजों को असम चाय के लिए अलग कंपनी बनानी पड़ी. कंपनी का नाम था 'द असम कंपनी लिमिटेड'. इस कंपनी का इतना फायदा हुआ कि चाय का मुनाफा 1855 तक पांच लाख पाउंड का हो गया.

व्यापार के साथ मजदूरों पर अत्याचार भी हुआ
अब तक ये बिज़नेस भी ईस्ट इंडिया कंपनी के पास था, लेकिन 1858 में ब्रिटिश सरकार ने इसे टेकओवर कर लिया. इससे अंग्रेजों को तो फायदा हुआ, लेकिन भारतीयों के लिए बड़ी मुसीबत बन गई. हुआ यूं कि ब्रिटिशर्स ने चाय की खेती में 10 हज़ार भारतीय मजदूरों को लगा दिया. इससे उन्हें रोज़गार तो मिला लेकिन शोषण भी हुआ.

अंग्रेजों ने फ्यूजिटिव स्लेव लॉ लगा दिया. इसके बाद कोई मजदूर नौकरी छोड़ता, तो उसे पकड़ा जा सकता था और बड़ी से बड़ी सज़ा भी दी जा सकती थी. इसका नतीजा ये हुआ कि मजदूरों ने ज्यादा काम करके चीन को चाय की निर्यात में पीछे छोड़ दिया. अंग्रेजों के भारत में फैले पूरे कारोबार में एक तिहाई हिस्सा सिर्फ चाय से आता था.

भारत के 16 राज्य करते हैं चाय का उत्पादन
बाद में चाय के बिज़नेस का आधुनिकीकरण हुआ, जिसमें हर बागान की अपनी एक फैक्ट्री हो गई. इससे व्यापार और निर्यात पहले से और भी आसान हो गया. इसके बाद चाय के व्यापार में चीन पीछे छूटता गया. आज भारत के करीब 16 राज्यों में चाय का उत्पादन होता है. इसमें असम, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, नगालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम, मेघालय, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, बिहार, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और ओडिशा शामिल हैं. दुनिया में चाय के उत्पादन और निर्यात में भारत दूसरे नंबर पर है. भारत में लगभग 35 लाख लोग चाय की इंडस्ट्री में काम करते हैं.

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