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जानें विमान में कैसे काम करता है वाई फाई, क्या इससे महंगी हो जाएगी हवाई यात्रा

जानिए किस तरह प्लेन में पहुंचती हैं इंटरनेट की तरंगें

जानिए किस तरह प्लेन में पहुंचती हैं इंटरनेट की तरंगें

केंद्र सरकार ने भारत में हवाई उड़ानों के दौरान वाईफाई के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी है. जानते हैं प्लेन में इटंरनेट कैसे पहुंचता है और कैसे काम करता है. क्या इससे यात्रा महंगी हो जाएगी

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    सरकार ने अब उड़ान के दौरान यात्रियों को वाई-फाई उपलब्ध कराने को मंजूरी दे दी है. यानी आप भारतीय एयरस्पेस में इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकेंगे. ट्राई यानी टेलीकॉम रेगुलेटरी अथारिटी ऑफ इंडिया (Telecom Regulatory Authority of India) ने हवाई यात्रा के दौरान डाटा कनेक्टिविटी की सुविधा को पहले ही हरी झंडी दिखा दी थी. अब एयरलाइंस में ये सुविधा शुरू हो जाएगी. आप प्लेन में यात्रा करने के दौरान इंटरनेट के जरिए आराम से सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर सकेंगे, इंटरनेट पर कोई जानकारी सर्च कर सकेंगे या चाहें तो उस पर मूवीज भी देख सकेंगे.

    ट्राई की सिफारिशों के अनुसार, यात्री हवा में 3000 मीटर (करीब 10 हजार फीट) ऊपर पहुंचने के बाद इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकते हैं. प्लेन को आमतौर पर 3000 मीटर तक पहुंचने में टेक ऑफ के बाद 05 मिनट का समय लगता है.

    अब सवाल यही है कि हवा में जब आप 10,000 फीट या ऊपर होंगे तो इंटरनेट आपके फोन या लैपटॉप तक कैसे पहुंचेगा. आमतौर पर जब प्लेन पूरी तरह से हवा में ऊपर आ जाता है तो आप करीब 35 हजार फीट की ऊंचाई पर यात्रा करने लगते हैं. ऐसे में हवाई जहाज में वाई-फाई कैसे चलेगा. इंटरनेट की तरंगे इतनी ऊंचाई पर कैसे पहुंचेंगी.

    वाईफाई जहाज में दो तरीके से चलता है
    वाईफाई जहाज में दो तरीके से चलेगा. पहला – जमीन पर मौजूद मोबाइल ब्रॉडबैंड टावर एयरक्राफ्ट के एंटीना तक सिग्नल भेजते हैं. एंटीना जहाज की बॉडी के निचले हिस्से पर होता है.
    प्लेन जब उड़ान भरता है तो वो लगातार नज़दीकी टावर से सिग्नल रिसीव करता रहता है. इसी सिग्नल से जहाज में वाई-फाई या इंटरनेट आता है. अगर आप समुद्र या सुदूर पहाड़ से गुज़र रहे हैं तो आमतौर पर इंटरनेट की तरंगे मिलने की गुंजाइश कम होती है.

    प्लेन में इंटरनेट दो तरीके से चलता है. एक तो जमीनी टॉवर से सिगनल लेता है और दूसरे तरीके में सीधे स्पेस में घूमते सैटेलाइट से इंटरनेट के सिग्नल रिसीव करता है


    दूसरा तरीका है- सैटेलाइट तकनीक. प्लेन का संपर्क उन सैटेलाइट से होता है जो अंतरिक्ष में चक्कर लगा रहे हैं. यही सैटेलाइट, रिसीवर और ट्रांसमीटर के ज़रिए धरती से सिग्नल लेते-देते हैं. साधारण शब्दों में कहें तो ये वही सैटेलाइट है जिसके ज़रिए मौसम का हाल या टीवी का सिग्नल मिल पाता है. सबसे करीबी सैटेलाइट सिग्नल को एयरक्राफ्ट के ऊपर लगा एंटीना रिसीव करता है. ग्राउंड और प्लेन के बीच जानकारी की अदला बदली इसी सैटेलाइट के जरिए होती है. इसी के जरिए जहाज में इंटरनेट आता है और यात्रियों को वाई फाई सुविधा मिल पाती है.

    लेकिन इसकी रफ्तार धीमी रहती है
    वैसे हवाई यात्रा में इंटरनेट इस्तेमाल की अनुमति के बाद भी एयरस्पेस में वाई फाई की धीमी रफ्तार हमेशा से परेशानी का कारण रही है. पहली बार फ्लाइट में ब्राडबैंड सुविधा गोगो नाम की कंपनी ने उपलब्ध करायी थी. उस कंपनी को उस वक्त एयरसेल के नाम से जाना जाता था. उसने वर्जिन अमेरिका प्लेन में पहली वाई फाई सेवा की शुरुआत की थी.

    तब 03 एमबीपीएस कनेक्शन हुआ करता था क्योंकि लैपटॉप का इस्तेमाल करने वाले यात्री भी कम थे. लेकिन अब हालत बदल गई है. विमान में यात्रा करने वाले हर शख्स के पास स्मार्ट फोन और लैपटॉप होता है. जिसमें तमाम एप्स भी होते हैं. ऐसे में वाईफाई की रफ्तार पर काम करने की जरूरत है.

    यूरोप और अमेरिका के ज्यादातर विमानों में वाईफाई की सुविधा रहती है लेकिन उनकी रफ्तार का धीमा होना अब भी एक बड़ी समस्या है


    अब विमानों में इंटरनेट की रफ्तार क्या होती है
    इन दिनों विमान में सैटेलाइट कनेक्शन के जरिए इंटरनेट की रफ्तार 12एमबीपीएस के करीब पहुंच चुकी है. लेकिन ये सेवा महंगी है लिहाजा ये देखने वाली बात होगी कि विमान कंपनियां हवाई यात्रा के दौरान वाई फाई सुविधा देने पर क्या अतिरिक्त और महंगा शुल्क तो नहीं लेंगी. या फिर उनकी स्पीड पहले की तरह धीमी ही रहने वाली है.

    इसके इस्तेमाल से यात्रा का दाम बढ़ जाता है
    अमेरिका में इन-फ्लाइट वाई फाई के बेहतर और सस्ते विकल्प मौजूद हैं. वहीं यूरोप की हवाई सुरक्षा एजेंसी EASA ने 2014 में फ्लाइट के दौरान मोबाइल फोन इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी थी. हालांकि यूरोप में भी वाई फाई सुविधा को लेकर यात्रियों के बीच संतुष्टि नहीं है. इन फ्लाइट इंटरनेट की तकनीक सस्ती नहीं है. इस काम के लिए इस्तेमाल होने वाले एंटीना, एयरलाइन की रफ्तार पर असर डालता है जिसकी वजह से ईंधन का खर्चा बढ़ता है. इसके अलावा रख रखाव का खर्चा भी आमतौर पर ग्राहकों की तरफ बढ़े हुए दाम के रूप में पेश किया जाता है.

    बेशक भारत के विमानों में भी आप को अब वाईफाई सुविधा पाएगी लेकिन ये स्पष्ट नहीं है कि इसका असर आपके हवाई किराए पर पड़ेगा या नहीं


    अगले छह सालों में ज्यादा विमानों में होगा इंटरनेट
    विशेषज्ञ बताते हैं कि दुनिया के आधे से ज्यादा एयरक्राफ्ट में अगले छह सालों में इन फ्लाइट वाई फाई की सुविधा होगी. यानी कई करोड़ डॉलर की कमाई का उद्योग तैयार हो रहा है. अमेरिका में गोगो कंपनी का फिलहाल हवाई यात्रा में वाई फाई पर एकछत्र राज है. गोगो कंपनी ही भारत में भी एयरलाइंस में ये सुविधा उपलब्ध कराएगी. हालांकि उसकी धीमी रफ्तार की आलोचना विदेशी हवाई यात्राओं में हमेशा से होती रही है.

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