वर्क फ्रॉम होम 'क्रांति' का सबसे ज्यादा फायदा महिलाओं को क्यों मिलेगा?

वर्क फ्रॉम होम 'क्रांति' का सबसे ज्यादा फायदा महिलाओं को क्यों मिलेगा?
एक्सपर्ट्स का कहना है कि भविष्य में वर्क फ्रॉम होम का सबसे ज्यादा फायदा महिलाओं को हागा.

कामकाजी महिलाओं (Professional Women) के लिए कोरोना वायरस (Corona Virus) त्रासदी के साथ एक उम्मीद बनकर भी आया है. आइए जानते हैं कि कैसे वर्क फ्रॉम होम (Work From Home) कोरोना काल के बाद कामकाजी महिलाओं के लिए फायदेमंद साबित होगा.

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हीथर रेनटॉन ने कभी यह नहीं सोचा था कि वे अपनी संस्था बनाकर घर से ही काम करेंगी. लेकिन उनकी कंपनी ने उनके पास कोई विकल्प नहीं छोड़ा था. दरअसल, रेंटन की बेटी रेबेका 'स्पेशल चाइल्ड' थी. लिहाजा स्कूल के बाद रेंटन को ही रेबेका की देखभाल करनी थी. रेंटन बताती हैं कि वो जिस कंपनी में काम करती थीं. वहां पर आफ्टर स्कूल केयर के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी. कंपनी उन्हें काम के लचीले घंटे भी देने के लिए तैयार नहीं थी. ऐसे में रेंटन के पास सिवाय इस्तीफे के कोई विकल्प नहीं था. हालांकि रेंटन के लिए इस्तीफा देना आसान नहीं था.

रेंटन ने इस मजूबरी को मौका बनाकर रेअर जेनेटिक्स डिसॉर्डर वाले बच्चों के लिए एक संस्था शुरू की. रेंटन ने अपने घर में रेबेका के प्ले रूम के बिल्कुल बगल में इस संस्था का दफ्तर बनाया. अब वे अपनी बेटी की देखभाल और काम दोनों साथ-साथ ही कर पातीं.

कोरोना महामारी की वजह से ऑस्ट्रेलिया में अचानक लाखों लोगों का दफ्तर घर में ही शिफ्ट हो गया है. लोग घर से ही काम कर रहे हैं. ऐसे में रेंटन जैसी दूसरी कई और औरतों के लिए कोरोना संकट त्रासदी के साथ एक उम्मीद बनकर भी आया है. रेंटन कहती हैं, 'जब कंपनियों के अधिकारी यह महसूस करेंगे कि घर से काम करने में प्रोडक्टिविटी कम नहीं हो रही बल्कि कई मामलों में तो लोग ज्यादा काम कर रहे हैं. तो उम्मीद है कि आने वाले समय में कंपनियों का रवैया वर्क फ्रॉम होम को लेकर बदलेगा. लोग भी घर में काम करने के लिए खुद को तैयार करेंगे. वैसे भी इंसानी रवैया यही है कि वह समय की मांग के हिसाब से खुद को तैयार करता है.'







कैसे वर्ल्ड वॉर सेंकेंड के बाद वर्क फोर्स में आए थी तब्दीली
इकोनोमिस्ट टिम हारकोर्ट (Harcourt) कहते हैं, 'महामारी के दौरान काम करने के तरीकों और रवैए में क्रांतिकारी बदलाव आया है. इससे पहले ऑस्ट्रेलिया के पेशेवर जगत में इतनी बड़ी तब्दीली वर्ल्ड वॉर सेंकेंड के दौरान ही आई थी, जब सरकार ने ऐसी जगहों पर औरतों की नियुक्ति करने शुरू की थीं जहां युद्ध से पहले केवल पुरुषों को ही काम करने की अनुमति थी. सरकार को एहसास हुआ कि औरतें इन कामों को बेहतर तरह से अंजाम दे सकती हैं. उस वक्त औरतों की नियुक्तियों ने स्थायी तौर पर बदलाव की नींव रखी. आज उस बदलाव को देखा जा सकता है.'

हारकोर्ट कहते हैं कि कोरोना संकट के वक्त यह आसानी से देखा जा सकता है मर्दों के मुकाबले ज्यादा औरतें घरों से ही काम कर रही हैं. संभवतः वर्ल्ड वॉर सेंकेंड की तरह ही यह बदलाव भी स्थायी होगा. अगर ऐसा होता है तो औरतों के लिए यह बेहद फायदेमंद साबित होगा. ऑस्ट्रेलिया में 10 में से 7 घरों में औरतें पर ही बच्चों की प्रमुख देखभाल का जिम्मा होता है. यह जिम्मेदारी नई मांओं के हिस्से में और ज्यादा आती है. सार्वजनिक क्षेत्रों में काम करने वाली 95 फीसद औरतें प्राथमिक पैरेंटल लीव लेती हैं. केवल 42 फीसद औरतें ही दो साल के भीतर वापस अपने कार्यक्षेत्र में लौटती हैं, लेकिन नई जिम्मेदारी के साथ. यह नई जिम्मेदारी पुरुष-महिलाओं के जेंडर वेज (सैलरी) गैप को और बढ़ा देती है. दरअसल, औरतों के करियर में सबसे बड़ा बैरियर दफ्तर में तय किए गए घंटों में उपस्थित रहना है. लेकिन अब वह परंपरा खत्म होने की कगार में दिख रही है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर


क्या कंपनियां इस बदलाव के लिए तैयार हैं?
सेंटर ऑफ पेरिनेटल एक्सीलेंस की एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर निकोल हाइट (Nicole Highet) कहती हैं कि कुछ कंपनियों में इस नए बदलाव को लेकर अब भी संदेह हैं. निकोल बताती हैं, 'मेरी एक दोस्त एक कंपनी में लंबे समय से काम करती है, वहां इस महामारी के बीच उनसे पूछा गया कि क्या वे दफ्तर आना पसंद करेंगी?'

इस बीच मिस हाइट और उनका स्टाफ, जिसमें कई नए अभिभावक भी शामिल हैं, सभी इन दिनों वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं. वे पूरे भरोसे के साथ कहती हैं कि कम से कम हमारी टीम में तो यह नया बदलाव फायदेमंद साबित हो रहा है. वह या उनके कर्मचारियों को काम और घर में से किसी एक को चुनने की मजबूर नहीं हैं.

हाइट याद करती हैं, 'कैसे जब वह मैटरनिटी लीव के बाद अपने दफ्तर वापस लौटीं थीं तो कॉफी रूम में सहयोगियों के साथ गप्पे लड़ाते हुए वीकेंड की प्लानिंग के बारे में बात करना उन्हें समय की बर्बादी लगता था. मुझे लगता था कि मेरे पास इस तरह की बातों के लिए समय नहीं है. मैं बस यही सोचती थी कि जल्दी से अपना काम पूरा कर घर पहुंच जाऊं. लेकिन दफ्तर के दोस्तों से घरेलू प्रतिबद्धताएं बताने का मतलब था कि वे आपको पिछड़ा घोषित कर देंगे. दरअसल, कामकाजी औरतों के लिए खासतौर पर बच्चा होने के बाद दुनिया दो हिस्सों में बंट जाती है.

हीदर रेंटन कहती हैं, मुझे लगता है कि संकट खत्म होने के बाद यकीनन लोगों के लिए दफ्तर लौटना आसान नहीं होगा. लोग ज्यादा लचीले घंटों या वर्क फ्रॉम होम की मांग करेंगे. औरतें देश की तरक्की में अपना योगदान देना चाहती हैं, लेकिन वह दफ्तर में तय घंटों या दफ्तर से ही काम करने के बैरियर से छुटकारा भी चाहती हैं. वे कहती हैं,' ज्यादातर औरतें काम करना चाहती हैं, यह उनकी जिंदगी और पॉकेट दोनों के लिए अच्छा है. और मुझे लगता है कि दफ्तरों में काम के तरीकों में जितना लचीलापन होगा वह न केवल औरतों बल्कि कंपनी और देश की आर्थिकी के लिए सकारात्मक साबित होगा.



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First published: May 27, 2020, 10:44 PM IST
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