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मानव का इतिहास: ज्यादा मांस खाने से नहीं पनपे थे इंसानों में विशेष गुण

मानव का इतिहास: ज्यादा मांस खाने से नहीं पनपे थे इंसानों में विशेष गुण

शोधकर्ताओं का कहना है कि मांस खाने की प्रवृत्ति के बढ़ने के कारण मानवीय गुणों (Human traints) का विकास हुआ, गलत है.  (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

शोधकर्ताओं का कहना है कि मांस खाने की प्रवृत्ति के बढ़ने के कारण मानवीय गुणों (Human traints) का विकास हुआ, गलत है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

मानव इतिहास (Human History) के बारे में अब तक यह माना जाता रहा है कि आधुनिक मानव (Modern Humans) के गुणों के विकास में जो कारक शामिल थे उनमें मांसाहार (Meat Eating) की खपत बढ़ना एक प्रमुख कारक था. लेकिन नए अध्ययन ने इस धारणा पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि जिन बहुत सारे प्रमाणों के आधार पर इसे बनाया गया है तुलनात्मक रूप से उनके नमूनों की संख्या ही ज्यादा थी. शोधकर्ताओं ने 20 लाख साल पहले के इस दौर के प्रमाण ही ज्यादा संख्या में जुटाए थे.

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    पृथ्वी (Earth) पर जीवन में मानवों (Humans) का विकास कैसे हुआ यह अलग से अध्ययन का विषय है. बहुत लंबे समय से यह माना जाता  रहा है कि मानव विकास में एक बड़ा अहम मोड़ तब आया था जब इंसान ने ज्यादा मांस खाना (Meat Eating) शुरू किया था. आधुनिक मानव के मस्तिष्क का बड़ा आकार जैसे बड़े प्रमुख गुणों का विकास भी 20 लाख साल पहले इसी समय के दौरान हुआ था. इससे यह धारणा बनी थी की आधुनिक मानव जाति के विकास में खुराक के इस मांसाहार संबंधी बदलाव ने मानवीय गुणों के विकासित होने में प्रमुख भूमिका निभाई थी.नए अध्ययन ने इस धारणा पर ही सवाल उठाए हैं

    धारणा में दम नहीं
    प्रोसिडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस में प्रकाशित इस नए अध्ययन ने इस बात पर सवाल उठाए हैं कि शुरुआती मानव विकास में मांसाहार की खुराक का बढ़ने का एक प्रमुख कारक के रूप में योगदान था. पुरातत्वीय प्रमाण बढ़ते मांसाहार के पक्ष में नाटकीय रूप से बढ़े जब होमो इलेक्टस प्रजाति परिदृष्य में आई.

    एक दौर का ज्यादा अध्ययन
     लेकिन इस अध्ययन के शोधकर्ताओं ने यह दावा किया कि यह शोध तेजी से मांसाहार की प्रवृत्ति का बढ़ने की व्याख्या इससे दी जा सकती है कि  इस दौर पर किए जा रहे अध्ययन पर ज्यादा ध्यान दिया गया. इससे इस धारणा पर ‘ज्यादा प्रमाण मिले’ कि ‘मानव को मांस ने बनाया’.
    इस अध्ययन के प्रमुख लेखक और जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में मानव विज्ञान के एसिस्टेंट प्रोफेसर डब्ल्यू एंड्रयू बार का कहना है कि पुरातन मानवशास्त्री पीढ़ियों तक अच्छे से संरक्षित साइट्स वाली जैसे ओल्डुवाई जॉर्ज जगहों पर जाते रहे जहां उन्होंने मानवों के मांसाहारी खुराक के बढ़ने के संकेत या प्रमाण पाए.

    मांसाहार में विस्फोट की सच्चाई
    इससे इस धारणा को बहुत बल मिला कि 20 लाख साल पहले मांसाहार में विस्फोट हुआ था. लेकिन जब आप इस धारणा का परीक्षण करने के लिए पूर्वी अफ्रीका के बहुत सारे इलाकों में मिले आंकड़ों का मात्रात्मक रूप से संश्लेषण करते हैं, जैसा की हमने यहां किया, तो पता चलता है की ‘मांसाहार ने हमें बनाया’ दावा खोखला साबित होने लगता है.

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    माना जाता था कि 20 लाख साल पहले का मानव (Humans) अचानक मांस ज्यादा खाने लगा था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    कैसे किया अध्ययन
    बार और उनके साथियों ने 26 से 12 लाख साल के बीच, पूर्वी अफ्रीका के 59 स्थानों सहित नौ बड़े शोध क्षेत्रों के प्रकाशित आंकड़ों की जोड़ा. उन्होंने होमिनिन मांसभक्षिता के बहुत सारे संकेतों का उपयोग किया. होमिनिन (Hominin) का मांसभक्षिता (carnivory) में उन पुरातत्व स्थलों में संख्या का पता लगाया जाता है जहां जानवरों की हड्डियों में पत्थरों के औजार के काटने के निशान थे. इसके अलावा काटने के निशान वाली हड्डियों की संख्या भी देखी जाती है.

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    नमूनों की तीव्रता में भी इजाफा
    अपने अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि जब समय के साथ नमूनों में विविधता का शामिल किया गया होमो इरेक्टस के सामने आने के बाद मांसभक्षिता के प्रमाणों की तुलनात्मक मात्रा में लगातार इजाफा देखने को नहीं मिला. उन्होंने पाया कि कटी  हुई हड्डियों और पुरातत्व स्थलों की संख्या में इजाफा तो हुआ, लकिन इसके साथ ही नमूनों की तीव्रता में भी इजाफा हुआ जिससे  पता चलता है कि ज्यादा तेजी से नमूने लेने के कारण भी यह बदलाव होता दिखाई दिया होगा.

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    इस अध्ययन से प्रागैतिहासिक (Prehistory) पड़तालों की प्रक्रियों के प्रति हमारा नजरिया बेहतर हो सकेगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    हमारी समझ को बदलने वाला
    इस अध्ययन की सहलेखिका और स्मिथसनियन में शोधकर्ता वैज्ञानिक ब्रियाना बोबिनर ने बताया कि उन्होंन पिछले 20 सालो तल कटे हुए जीवाश्वमों का उत्खनन और अध्ययन किया है और टीम की पड़ताल ने उन्हें कतई नहीं चौंकाया. उन्होंने बताया,”यह अध्ययन प्रागैतिहासिक मांसाहार के बारे में पुरातत्व रिकॉर्ड क्या बताते हैं, इसको लेकर हमारी समझ को बदलता है. यह दर्शाता है कि नए प्रमाण मिलते रहने के दौरान हमें अपने विकास पर बड़े सवाल क्यों उठाते रहना चाहिए.

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    आधुनिक मानवों के विकास से कुछ शरीरशास्त्रीय और व्यवहारिक गुण कैसे जुड़ गए यह एक प्रमुख सवाल है. शोधकर्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भविष्य में इसकी वैकल्पिक व्याख्याओं की जरूरत पड़ेगी. इन गुणों के विकास की व्याख्या के कई सिद्धांत थे. इसमें पौधों से हासिल हुआ  पोषण भरा पका हुआ भोजन शामिल होना भी एक है. शोधकर्ताओं ने चेताया कि इनमें से किसी भी मत के पक्ष में ठोस पुरातत्व रिकॉर्ड नहीं है. इसलिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है.

    Tags: Environment, History, Research, Science

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