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30 हजार साल पहले भी इंश्योरेंश पॉलिसी का सहारा लेते थे इंसान!

शुतुरमुर्ग के अंडों से बने मनकों का इस्तेमाल इंसान हजारों सालों से कर रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

शुतुरमुर्ग के अंडों से बने मनकों का इस्तेमाल इंसान हजारों सालों से कर रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

मनुष्य (Humans) अपनी जरूरतों के हिसाब से सोशल नेटवर्किंग (Social Networking) का इस्तेमाल कई हजार सालों से कर रहा है. एक नई आर्कियोलॉजिकल रिसर्च (archeological Research ) के मुताबिक दक्षिण अफ्रीका के कालाहारी में घुमंतू प्रजातियों में विशेष तरह की पार्टनरशिप (जो एक इंश्योरेंश की तरह काम करती है) पिछले करीब 30 हजार सालों से चली आ रही है.

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    दक्षिण अफ्रीका के मरुस्थल कालाहारी में घुमंतू और खाना तलाशने वाली प्रजातियों के लिए कोई भी वर्ष अस्तित्व का संकट बन सकता है. इसका कारण ये है कि यहां पर किसी साल बहुत बारिश होती है तो कभी बिल्कुल सूखा पड़ जाता है. यही वजह है कि इन लोगों ने संकट से उबरने का एक विशेष तरीका बनाया हुआ है. दरअसल इन प्रजातियां आस-पास में रहने वाले अपने नजदीकियों या रिश्तेदारों से समझौता कर रखा है. ये समझौता एक तरह का इंश्योरेंश होता है. जिस साल बिल्कुल सूखे जैसे हालात होते हैं, ये प्रजातियां अपने नजदीकियों या रिश्तेदारों के इलाके में चले जाते हैं जिससे खाने-पानी की समस्या न हो.

    मिशिगन युनिवर्सिटी के आर्कियोलॉजिस्ट Brian Stewart के मुताबिक कालाहारी जैसे मरुस्थल वाले वातावरण में इसी तरीके ने इन घुमंतू लोगों को जिंदा रखा हुआ है. Stewart द्वारा की गई एक नई आर्कियोलॉजिकल रिसर्च के मुताबिक इस तरह की पार्टनरशिप, जो एक इंश्योरेंश की तरह काम करती है, यहां पर पिछले करीब 30 हजार सालों से चली आ रही है.

    प्रतीकात्मक तस्वीर


    Stewart और उनके सहयोगियों द्वारा की गई ये स्टडी अमेरिका के Proceedings of the National Academy of Sciences जर्नल में प्रकाशित हुई है. स्टीवर्ट और उनके साथियों ने दक्षिण अफ्रीका के इस इलाके से खुदाई में मिले शुतुरमुर्ग के अंडों से मनकों पर स्टडी की है. स्टीवर्ट का कहना है कि इन इलाकों में 1970 और 1980 के दशक से ही कई आर्कियोलॉजिस्ट शुतुरमुर्ग के अंडों से बने इन मनकों की तलाश में खुदाई कर रहे हैं.

    हालांकि अब इस इलाके से शुतुरमुर्ग बिल्कुल गायब हो चुके हैं. इस फैक्ट को ध्यान में रखते हुए की गई स्टडी में इन आर्कियोलॉजिट्स ने पाया कि शुतुरमुर्ग से अंडों से बने इन मनकों का इस्तेमाल घुमंतु जातियां कई हजार सालों से कर रही हैं. उस समय बेहद मूल्यवान रहे मनकों को ये प्रजातियां अपने नजदीकियों या रिश्तेदारों के पास  इंश्योरेंश के तौर जमा कर देती थीं. ये बुरे वक्त में अपने करीबियों के इलाके में जाकर खाना-पानी तलाशने का टोकन हुआ करता था.

    रिसर्च के दौरान आर्कियोलॉजिस्ट्स को एक 30 हजार साल पुराने मनके भी मिले हैं. स्टीवर्ट कहते हैं कि ग्लोबलाइजेशन की वजह से अब तकरीबन हर तरह का खाना आपको दुनिया के किसी भी कोने में मिल सकता है. लेकिन मनुष्यों के लिए शुरुआत से खाना-पानी ऐसी चीजें रही हैं जिनके लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता था. आर्कियोलॉजिस्ट ने पाया है कि कालाहारी में इस तरह के मनके और सजावटी पत्थर कई बार दूर तक ले जाए गए. स्टीवर्ट का कहना है कि जरूर इन पत्थरों को किसी एक प्रजाति ने अपनी परिचित दूसरी प्रजाति को दिया होगा.

    प्रतीकात्मक तस्वीर


    एक और आर्कियोलॉजिस्ट Polly Wiessner के मुताबिक ये सिस्टम हमें ये भी बताता है कि दुनिया में सोशल नेटवर्किंग कितने पहले से प्रभावी है. मनुष्य अपनी जरूरतों के हिसाब से सोशल नेटवर्किंग का इस्तेमाल कई हजार सालों से कर रहा है. साथ ही हमें ये समाज के भरोसे के बारे में भी बताता है. क्योंकि अगर मनके रखने के बाद भी कोई प्रजाति दूसरी प्रजाति की मदद न करती तो ऐसे इलाकों में सर्वाइव कर पाना आसान नहीं है.

    शायद यही वजह है कि इन इलाकों में ये प्रजातियां हजारों सालों से टिकी हुई हैं. क्योंकि इनको एक-दूसरे पर भरोसा है. साथ ही ये दुनिया के सबसे पुराने इंश्योरेंश सिस्टम का प्रतीक भी है. जो भले ही आधिकारिक रूप से नहीं चलता था. लेकिन एक-दूसरे के बीच सामाजिक रूप से इसे वैधता मिली हुई थी.

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