बेहद खतरनाक है ये बीमारी, इलाज के लिए लगता है दो करोड़ का इंजेक्शन

News18Hindi
Updated: July 29, 2019, 7:24 AM IST
बेहद खतरनाक है ये बीमारी, इलाज के लिए लगता है दो करोड़ का इंजेक्शन
इस एंजाइम की कमी या अनुपस्थिति से शर्करा का टूटना कम हो जाता है (प्रतीकात्मक फोटो)

हंटर सिंड्रोम एक जेनेटिक बीमारी है जो सिर्फ लड़कों को प्रभावित करती है. लड़कियां इस बीमारी के वाहक का काम करती हैं यानी एक से दूसरी पीढ़ी में ले जाती हैं.

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उत्तर प्रदेश के इटावा में 6 साल का एक बच्चा हंटर सिंड्रोम से पीड़ित है. 2 लाख में 1 बच्चे में होने वाली इस बीमारी का इलाज केवल एंजाइम रिप्लेसमेंट थैरेपी है, जिसका खर्च करोड़ों में आता है. जानिए, क्या है हंटर सिंड्रोम और इसकी वजह से शरीर में क्या बदलाव आते हैं.

हंटर सिंड्रोम एक रेयर बीमारी है. इस आनुवंशिक बीमारी में किसी एक क्रोमोजोम में विकृति के कारण शर्करा को तोड़ने के लिए जरूरी एंजाइम बहुत कम मात्रा में बनता है. Iduronate 2-sulfatase नाम के इस एंजाइम की कमी या अनुपस्थिति से शर्करा का टूटना कम हो जाता है और इसके कॉम्प्लेक्स मॉलिक्यूल कोशिकाओं, खून और ऊतकों में इकट्ठा हो जाते हैं. इसी वजह से बच्चे की शारीरिक और मानसिक बढ़त पर असर दिखता है.

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प्रभावित होता है बौद्धिक और शारीरिक विकास

इसकी वजह से शरीर में कई असामान्य बदलाव होते हैं. खासकर इसमें मरीज का बौद्धिक और शारीरिक विकास प्रभावित होता है. इसके लक्षण धीरे-धीरे सामने आते हैं, जब बच्चे की सोचने-समझने की क्षमता, शारीरिक बढ़त और ऑर्गन फंक्शन अपनी उम्र के दूसरे बच्चों की अपेक्षा सुस्त होने लगते हैं. फिर एक वक्त के बाद बच्चे का बढ़ना एकदम बंद हो जाता है.

ये एक दुर्लभ जेनेटिक बीमारी है (प्रतीकात्मक फोटो)


लड़कियों पर इसका कोई खतरा नहीं
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इसे ट्राइसोमी 21, एमपीएसएस और डाउन सिंड्रोम के नाम से भी जाना जाता है. ये सिंड्रोम मां से बच्चे में जाता है. लड़कियों पर इसका कोई खतरा नहीं. इसकी वजह ये है कि उनमें दो X क्रोमोजोम होते हैं. और अगर मां से मिला एक क्रोमोजोम बीमार है तो उनका खुद का दूसरा क्रोमोजोम सामान्य है. ये जटिल शर्करा को तोड़ने के लिए जरूरी एंजाइम बनाने का काम कर पाता है. वहीं लड़कों में एक X और एक Y क्रोमोजोम होता है. ऐसे में एकमात्र X क्रोमोजोम में खराबी हो तो इस बीमारी का खतरा बढ़ जाता है.

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नहीं मालूम चली है बीमारी की वजह
लड़कियां इस बीमारी का करियर यानी बीमारी के वाहक का काम करती हैं. अगर मां में कोई बीमार क्रोमोजोम है तो वो संतान में पहुंच जाता है. अब तक यह पता नहीं लग सका है कि इस बीमारी की वजह क्या है. वैज्ञानिक इस पर लगातार शोध कर रहे हैं. हंटर सिंड्रोम दुर्लभ बीमारी है, जिसके लक्षण भी कई तरह के हो सकते हैं. बीमारी कितनी गंभीर है, ये इस पर भी निर्भर है कि बच्चे की मां की पिछली कितनी पीढ़ियां इस बीमारी की वाहक रही हैं.

शारीरिक लक्षणों के अलावा कई व्यवहारगत लक्षण भी हैं (प्रतीकात्मक फोटो)


 2 से 4 साल की उम्र तक  दिखते हैं संकेत
इसके लक्षण जन्म के साथ दिखाई नहीं देते हैं लेकिन 2 से 4 साल की उम्र तक संकेत दिखने लगते हैं. ये लक्षण हैं- सिर का आकार सामान्य से काफी बड़ा होना, होंठों का मोटा हो जाना, फैली हुई नाक, जिसके छेद भी सामान्य से काफी बड़े लगें, मोटी आवाज. हंटर सिंड्रोम में पेट काफी फूला हुआ दिखता है क्योंकि पेट के भीतर के सभी ऑर्गन फूल जाते हैं. बच्चे को बार-बार डायरिया होता है. जोड़ों में कड़ापन होने की वजह से बच्चा ठीक से चल-फिर नहीं पाता. इसके अलावा कई व्यवहारगत लक्षण भी हैं, जैसे बीमारी से प्रभावित बच्चा बहुत गुस्सैल हो जाता है, बोल नहीं पाता या बातें समझ नहीं पाता है. ऐसे बच्चे गुस्से में रिएक्ट करना न समझ पाने की वजह से एक जगह बैठे रह जाते हैं.

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उम्र बढ़ने के साथ गंभीर हो जाता है रोग
इस बीमारी में जीभ और मसूड़े मोटे हो जाते हैं, साथ ही मेजल पैसेज और विंडपाइप (trachea) में भी सूजन रहने लगती है. ऐसे में बीमार बच्चे को सांस लेने में परेशानी होने लगती है. ऐसे बच्चे अक्सर निमोनिया, साइनस इंफेक्शन और सांस की दूसरी बीमारियों से घिरे रहते हैं. इसमें हार्ट टिश्यू में भी सूजन रहने लगती है, इस वजह से हार्ट के वॉल्व बंद होने लगते हैं और शरीर को पर्याप्त खून नहीं मिल पाता है. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, बीमारी और गंभीर होने लगती है. इस बीमारी के मरीज की अक्सर दिल का दौरा पड़ने से कम उम्र में ही मौत हो जाती है.

एंजाइम रिप्लेसमेंट थैरेपी (ERT) के जरिए इसका इलाज हो सकता है (प्रतीकात्मक फोटो)


हंटर बीमारी चूंकि आम बीमारी नहीं इसलिए डॉक्टर इसकी जांच के लिए कई तरीके अपनाते हैं. इसमें ब्लड टेस्ट से लेकर, यूरिन व शुगर टेस्ट भी शामिल है. इसके अलावा व्यवहारगत लक्षणों की भी जांच होती है क्योंकि इसके लक्षण कई दूसरी बीमारियों से मिलते-जुलते हैं. गर्भ में भी इस जीन की जांच हो सकती है अगर मां को लगता है कि उसकी फैमिली हिस्ट्री में ये बीमारी भी है.

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कोई स्थायी इलाज नहीं
एंजाइम रिप्लेसमेंट थैरेपी (ERT) के जरिये इसका इलाज हो सकता है लेकिन ये भी स्थायी नहीं है. एंजाइम केवल शर्करा के टूटने में मदद करता है, जिससे बीमारी के लक्षण कुछ हद तक माइल्ड हो जाते हैं. या फिर ये मान सकते हैं कि बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है. इलाज से बच्चे के कसे हुए जोड़ खुल जाते हैं और वो आसानी से चलने-फिरने लगता है. उसका शारीरिक विकास होने लगता है. हालांकि ये थैरेपी बच्चे के बौद्धिक विकास में कोई मदद नहीं करती. बोन मैरो ट्रांसप्लांट भी एक विकल्प है, जिससे हो सकता है कि बच्चे में मिसिंग या डैमेज्ड क्रोमोजोम की भरपाई हो सके. हालांकि इसमें काफी खतरे हैं और अब भी रिसर्च चल रही है.

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First published: July 29, 2019, 6:10 AM IST
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